जलवायु शिखर सम्मेलन: कार्बन टैक्स को लेकर भारत, चीन और ब्राजील सहित इन देशों ने जताया विरोध

मिस्त्र के शर्म अल-शेख में 27 कॉप जलवायु शिखर सम्मेलन चल रहा है। यूरोपीय संघ की तरफ से जलवायु परिवर्तन को लेकर चर्चा की जा रही है। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन ने कार्बन उत्सर्जन टैक्स को लेकर विरोध जताया है। भारत सहित देशों के एक संघ ने संयुक्त रूप से कहा है कि कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाए जाने की वजह से बाजार में विकृति आती है और पार्टियों के बीच विश्वास की कमी बढ़ती है। ऐसे में हमें इससे बचा जाना चाहिए।

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क्या है कार्बन बॉर्डर टैक्स
यूरोपीय संघ की तरफ से जलवायु परिवर्तन को लेकर एक नीति बनाई गई है, जिसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट टैक्स कहते है। इस नीति के तहत सीमेंट, स्टील सहित कई अन्य वस्तुओं पर ज्यादा टैक्स लगाए जाने की बात कही है। क्योंकि इनसे ज्यादा मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। यह नियम 2026 से प्रभाव में आएगा।

आपको बता दें कि बेसिक चार विकासशील देशों (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) का समूह है। ये देश ऊर्जा के लिए कोयले पर मुख्य रूप से निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन में जीवाश्म ईंधन का नष्ट होना भी एक बड़ा कारण माना जाता है। ऐसे में यूरोपीय देशों की तरफ से इसके इस्तेमाल को भी कम करने के लिए चिन्हित किया गया है। हालांकि, बेसिक के देश इसके खिलाफ हैं। बेसिक देशों की तरफ से इसे एकतरफा फैसला बताया जाता है।

बेसिक समूह के देशों ने बुधवार को एक संयुक्त बयान जारी करते हुए "गंभीर चिंता" व्यक्त की। बेसिक समूह के देशों ने कहा कि विकसित देश अभी भी नेतृत्व नहीं दिखा रहे हैं। विकसित देश "वित्त व शमन प्रतिबद्धताओं और वादों से पीछे हट गए"। जबकि विकसित देशों द्वारा पिछले एक साल में जीवाश्म ईंधन की खपत और उत्पादन में "महत्वपूर्ण वृद्धि" हुई है। बेसिक समूह के देशों ने यह भी कहा कि भले ही वे विकासशील देशों पर दबाव डालना जारी रखते हैं, लेकिन उन्हें भी जीवाश्म ईंधन के उपयोग से दूरी बनानी चाहिए। अगर जीवाश्म के प्रयोग को लेकर विकासशील देशों पर कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाया जा रहा है तो कम लगाया जाए। क्योंकि इससे विकासशील देशों पर प्रभाव पड़ेगा।

बेसिक देशों के समूहों की तरफ से कहा गया कि "नुकसान और क्षति" के अवसरों और संबंधों के बावजूद संयुक्त राष्ट्र की जलवायु ढांचे की प्रक्रिया में अनुकूलन को अभी भी संतुलित और वास्तविक ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वहीं, विकासशील देशों द्वारा पहले से ही हुई पर्यावरणीय क्षति के लिए जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को वित्तपोषित करने के लिए एक संस्थागत प्रणाली की मांग को संदर्भित करता है।

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