अरिहा शाह को जर्मनी क्यों नहीं सौंप रहा वापस, अब सिर्फ 2 महीने बाकी, महाराष्ट्र CM ने एस जयशंकर को लिखी चिट्ठी

अरिहा के पिता वर्क वीजा पर जर्मनी में बतौर इंजीनियर काम करते थे। जर्मन अधिकारियों ने बच्ची के डायपर पर खून मिलने के बाद उसे कस्टडी में ले लिया था। इस घटना के 20 महीने बीत चुके हैं।

Baby Ariha Shah Case

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने विदेश मंत्री का ध्यान बेबी अरिहा शाह के मामले की ओर आकर्षित किया है। अरिहा शाह पिछले 20 महीनों से जर्मनी में फॉस्टर होम में फंसी हुई है।

भावेश और धारा शाह की बेटी अरिहा शाह जब 7 महीने की थी तभी उसे जर्मनी के चाइल्ड केयर संस्था के लोग अपने साथ लेकर चले गए थे। उसके बाद से अब तक 20 महीने गुजर चुके हैं, लेकिन अब तक उसे वापस नहीं लाया जा सका है।

फॉस्टर होम में उन बच्चों को रखा जाता है जिनके माता-पिता या तो इस दुनिया में नहीं हैं या फिर वह बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ हैं। अरिहा के माता-पिता महीने में एक बार ही उससे मिल पाते हैं।

जानकारी के मुताबिक अरिहा जब खेल रही थी तब उसके प्राइवेट पार्ट में चोट लग गई। इसके बाद धरा और भावेश अपनी बच्ची अरिहा को लेकर अस्पताल गए। अस्पताल में डॉक्टरों ने आरोप लगा कि बच्ची का यौन शोषण हुआ है। इसके बाद जर्मन अधिकारियों ने बच्ची को कस्टडी में ले लिया।

बच्ची के माता-पिता का कहना था कि एक मामूली दुर्घटना में बच्ची को चोट लग गई थी, जिसकी वजह से उसके प्राइवेट पार्ट से खून बहने लगा था। लेकिन वहां के अधिकारियों ने अरिहा के माता-पिता की एक न सुनी। अरिहा को फॉस्टर होम भेज दिया गया।

भावेश पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उन्होंने इस बात की रिपोर्ट पुलिस में कराई, जिसके बाद अस्पताल और पुलिस रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि अरिहा के साथ कोई यौन उत्पीड़न नहीं हुआ, लेकिन फिर भी अरिहा को चाइल्ड केयर संस्था ने नहीं दिया।

फॉस्टर होम में अरिहा को यह कहकर रखा है कि उसके सॉफ्टवेयर इंजीनियर पिता भावेश और मां धरा बच्चे की अच्छी देखभाल नहीं कर पाए तभी बच्ची को इतनी गंभीर चोट लग गई। इसी के बाद से अरिहा के माता-पिता उसे वापस पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

अगस्त में अरिहा को फॉस्टर केयर में दो साल पूरे हो जाएंगे। जर्मनी में नियमों के मुताबिक, किसी बच्चे को 2 सालों तक फॉस्टर होम में रह जाने के बाद उसे उसके माता-पिता को वापस नहीं सौंपा जाता। ऐसा माना जाता है कि बच्चे को नई स्थितियों और कल्चरल शॉक का सामना करने में दिक्कतें आएंगी।

इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दिसंबर में भी अपनी जर्मन समकक्ष एनालीना बेयरबॉक के सामने अरिहा का मुद्दा उठाया था। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि बच्ची अपने भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक माहौल में रहना चाहिए।

इसके जवाब में जर्मन विदेश मंत्री बेयरबॉक ने कहा कि अरिहा की भलाई उनके लिए बहुत अहम है। उन्होंने मामला अदालत में लंबित होने का भी हवाला दिया था।

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