China UNSC Presidency: यूएनएसी अध्यक्ष बनते ही चीन ने छेड़ी जंग, पहले ही दिन भारत की टेंशन बढ़ाई
China UNSC Presidency: मई माह के लिए UNSC की कमान संभालते ही चीन ने अपनी कूटनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। चीनी प्रतिनिधि फू छोंग ने स्पष्ट किया कि उनका ध्यान संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रतिष्ठा बहाल करने और मध्य-पूर्व (खासकर गाजा और लेबनान) में शांति स्थापित करने पर रहेगा।
चीन खुद को बहुपक्षवाद के चैंपियन के रूप में पेश कर रहा है, ताकि वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों, विशेषकर अफ्रीकी राष्ट्रों के बीच अपनी पैठ मजबूत कर सके और अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती दे सके।

भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो का पेंच
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती UNSC में स्थायी सदस्यता की राह में चीन का 'वीटो' है। हालांकि चीन ने भारत की सदस्यता का सीधे तौर पर कड़ा विरोध न करने के धुंधले संकेत दिए हैं, लेकिन उसने एक नई शर्त रखी है। चीन का सुझाव है कि नए सदस्यों को पुराने सदस्यों की तरह वीटो पावर नहीं मिलनी चाहिए। भारत ने इस "दोयम दर्जे" की सदस्यता के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है, जिससे टकराव बढ़ना तय है।
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लेबनान संकट और शांति सैनिकों का मुद्दा
चीन ने लेबनान से संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों (UNIFIL) की वापसी के विचार का कड़ा विरोध किया है। फू छोंग का तर्क है कि लेबनान में स्थिति अभी भी अस्थिर है और वहां पूर्ण युद्धविराम का अभाव है। चीन इसे एक "नाजुक मोड़" मान रहा है और शांति मिशन के जनादेश को समाप्त करने के निर्णय पर पुनर्विचार की मांग कर रहा है। यह रुख दर्शाता है कि चीन संघर्ष क्षेत्रों में अपनी सक्रिय उपस्थिति और प्रभाव को बनाए रखना चाहता है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर और सुधारों की राजनीति
चीन का दूसरा बड़ा लक्ष्य यूएन की भूमिका का 'पुनरोत्थान' करना है। वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था और चार्टर के मूल सिद्धांतों की दुहाई दे रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह केवल एक रणनीतिक चाल है ताकि वह अंतरराष्ट्रीय कानून की आड़ में अपने भू-राजनीतिक हितों को सुरक्षित कर सके। चीन चाहता है कि भविष्य की बहुपक्षीय व्यवस्था उसके 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव' के इर्द-गिर्द घूमे, जो पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय है।
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चीन की सुपरपावर रणनीति और भारत की चिंता
अध्यक्ष के रूप में चीन की सक्रियता भारत के लिए कूटनीतिक सिरदर्द बढ़ा सकती है। चीन अपनी इस शक्ति का उपयोग पाकिस्तान स्थित आतंकियों को ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया रोकने या सीमा विवादों पर वैश्विक नैरेटिव मोड़ने में कर सकता है। भारत को अब न केवल अपनी सदस्यता के लिए संघर्ष करना होगा, बल्कि चीन द्वारा पेश किए जा रहे "कमजोर सदस्यता" के फॉर्मूले को भी विफल करना होगा, ताकि विश्व मंच पर भारत का कद प्रभावित न हो।












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