NCERT की किताब में मोहेंजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल' का मेकओवर? तस्वीर में बदलाव को लेकर उठे सवाल
NCERT Textbook Dancing Girl controversy: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की नई कक्षा 9 की कला शिक्षा की टेक्सटबुक 'मधुरिमा' को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। विवाद की वजह सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा 'डांसिंग गर्ल' (नृत्य करती युवती) की वह तस्वीर है, जिसे किताब में प्रकाशित करने से पहले डिजिटल रूप से पब्लिश किया गया है।
इस बदलाव के बाद इतिहास, कला, अभिव्यक्ति और शैक्षिक सामग्री में सेंसरशिप को लेकर बहस शुरू हो गई है।इस नई तस्वीर में 4,500 साल पुरानी इस मूर्ति के नग्न धड़ (Bare Torso) को डिजिटल शेडिंग के जरिए इस तरह से ढक दिया गया है, जिससे भ्रम पैदा हो रहा है कि मूर्ति ने कपड़े पहने हुए हैं।

इतिहास और कला के इस 'डिजिटल मॉडिफिकेशन' के सामने आते ही इतिहासकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच 'इतिहास की सेंसरशिप' और अति-शालीनता (Prudishness) को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है।
क्या है पूरा विवाद और नई किताब में क्या बदला?
ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत पहली बार कक्षा 1 से 10 तक के लिए एक समर्पित कला शिक्षा श्रृंखला शुरू की है। इसी श्रृंखला के तहत कक्षा 9 के लिए जारी की गई नई पुस्तक 'मधुरिमा' (Madhurima) के पहले अध्याय 'कला का इतिहास' (History of Arts) में यह बदलाव देखने को मिला है।
मूल कांस्य प्रतिमा पूरी तरह से नग्न (Nude) है, जिसके एक हाथ में ढेर सारी चूड़ियां, गले में हार और कमर पर हाथ रखे एक बेहद आत्मविश्वास वाली मुद्रा है। 'मधुरिमा' पाठ्यपुस्तक में प्रकाशित तस्वीर में मूर्ति के धड़ वाले हिस्से को कंधों से लेकर नीचे तक काफी गहरा कर दिया गया है। इससे मूर्ति के वे शारीरिक छिप गए हैं जो मूल रूप से दिखाई देते हैं। पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे मूर्ति को कोई कपड़े पहना दी गई हो
आलोचकों का कहना है कि पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से को डिजिटल शेडिंग के जरिए इस तरह संपादित किया गया है कि वह वस्त्र पहने हुए प्रतीत होती है। जबकि मूल कांस्य प्रतिमा में शरीर की संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसी बदलाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या ऐतिहासिक धरोहर की मूल छवि को बदलना उचित है।
इतिहासकार क्यों उठा रहे हैं सवाल?
जानकारों का कहना है कि 'डांसिंग गर्ल' की तस्वीर पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से NCERT की विभिन्न पुस्तकों में प्रकाशित होती रही है। खास बात यह है कि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में भी इसे बिना किसी बदलाव के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाता रहा है।
आउट लुक की रिपोर्टों के अनुसार, पहले भी प्रतिमा को लेकर कुछ सदस्यों ने इसकी नग्न प्रस्तुति पर आपत्ति जताई थी, लेकिन एक सरकारी विशेषज्ञ ने इसे ऐतिहासिक और कलात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए शामिल किए जाने का समर्थन किया था। ऐसे में अब तस्वीर में बदलाव किए जाने को लेकर आलोचक इसे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और सेंसरशिप का मामला बता रहे हैं।
25 साल के इतिहास में पहली बार 'सेंसरशिप' का आरोप
इतिहासकारों का कहना है कि यह पहली बार है जब भारत की इस सबसे प्रतिष्ठित ऐतिहासिक कलाकृति के साथ इस तरह की छेड़छाड़ की गई है। बिना किसी बदलाव के छपती रही है मूर्ति: पिछले 25 से अधिक सालों से 'डांसिंग गर्ल' की मूल तस्वीर बिना किसी काट-छांट या बदलाव के NCERT की अलग-अलग इतिहास की किताबों में छपती आ रही है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान भी, जब मुरली मनोहर जोशी शिक्षा मंत्री थे, इस मूर्ति को कभी ढका नहीं गया था।
दिलचस्प बात यह है कि NCERT द्वारा इसी सत्र में जारी की गई कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की नई किताब में यही 'डांसिंग गर्ल' अपने मूल और वास्तविक स्वरूप में छपी हुई है। ऐसे में कला की किताब में इसे ढकने के फैसले पर विशेषज्ञ हैरान हैं।
नई शिक्षा नीति के तहत आई है 'मधुरिमा'
'मधुरिमा' NCERT की न्यू आर्ट एजुकेशन सीरिज का हिस्सा है, जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत तैयार किया गया है। इस का उद्देश्य कला शिक्षा को मुख्यधारा की पढ़ाई से जोड़ना है। कक्षा 1 से 10 तक के विद्यार्थियों के लिए तैयार की जा रही इन पुस्तकों में अब तक कक्षा 9 तक की सामग्री जारी की जा चुकी है।
NCERT का कहना है कि नई पुस्तकों के माध्यम से छात्रों को भारतीय कला, संस्कृति और विरासत से परिचित कराया जाएगा। हालांकि, 'डांसिंग गर्ल' की संशोधित तस्वीर ने इस पहल के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
क्या है 'डांसिंग गर्ल' का इतिहास?
'डांसिंग गर्ल' सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कलाकृतियों में से एक मानी जाती है। यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान मिली थी और इसकी ऊंचाई लगभग चार इंच है। कांस्य धातु से बनी यह प्रतिमा उस समय की उन्नत धातु-कला और शिल्प कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण है। प्रतिमा में एक युवती को आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा में खड़े हुए दिखाया गया है। उसकी कलाईयों में कई चूड़ियां हैं और उसकी मुद्रा को लेकर सालों से कला इतिहासकार अध्ययन करते रहे हैं।
पुरातत्वविदों के अनुसार, यह छोटी सी मूर्ति उस समय के कलाकारों के उन्नत कलात्मक कौशल, आत्मविश्वास और 'लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग' (धातु पिघलाकर मूर्ति बनाने की तकनीक) के गहरे ज्ञान को दर्शाती है। शिक्षाविदों का मानना है कि इतिहास को आधुनिक चश्मे से देखने और उसमें बदलाव करने से छात्रों को भारत की वास्तविक प्राचीन विरासत को समझने में बाधा आएगी।
'डांसिंग गर्ल' की मूल कांस्य प्रतिमा वर्तमान में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) में सुरक्षित रखी गई है। इसे भारत की सबसे प्रतिष्ठित पुरातात्विक खोजों में गिना जाता है और दुनिया भर के इतिहासकारों तथा कला विशेषज्ञों के लिए यह विशेष महत्व रखती है।
इतिहास बनाम नई छेड़छाड़ पर छिड़ी बहस
इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली ऐतिहासिक और कलात्मक सामग्री को मूल रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए या फिर सामाजिक संवेदनशीलताओं के अनुसार उसमें बदलाव किया जा सकता है।
जहां एक पक्ष का मानना है कि छात्रों के लिए सामग्री को उपयुक्त बनाने के प्रयास किए गए हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि किसी ऐतिहासिक कलाकृति की मूल पहचान बदलना इतिहास के साथ न्याय नहीं है। फिलहाल NCERT की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।














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