Bihar: मंत्री पद से बर्खास्त होंगे उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश? सुप्रीम कोर्ट से सम्राट सरकार को नोटिस
Deepak Prakash Bihar Minister Case: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति अब कानूनी जांच के दायरे में आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका में कहा गया है कि दीपक प्रकाश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, फिर भी उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया।
याचिकाकर्ता का दावा है कि संविधान गैर-विधायक को मंत्री बनने के लिए केवल छह महीने की छूट देता है और इस अवधि को नई सरकार बनाकर दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता। अब सुप्रीम कोर्ट इस संवैधानिक सवाल पर सभी पक्षों से जवाब मांगेगा।

Supreme Court Notice Bihar Government: मामला क्या है और विवाद क्यों खड़ा हुआ?
पूरा विवाद दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर दोबारा नियुक्ति को लेकर है। याचिका के अनुसार, जब उन्हें पहली बार मंत्री बनाया गया था तब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। संविधान ऐसे व्यक्ति को सीमित समय के लिए मंत्री बनने की अनुमति देता है। लेकिन तय अवधि के भीतर सदस्यता हासिल नहीं होने के बाद भी उन्हें नई सरकार में फिर मंत्री बनाया गया। इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला दिया है। इसके मुताबिक कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य न होने पर भी मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। याचिका में कहा गया है कि यह छूट एक बार के लिए होती है और इसे बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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दीपक प्रकाश की नियुक्ति का पूरा टाइमलाइन
याचिका के मुताबिक दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनाया गया था। बाद में 15 अप्रैल 2026 को सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद खत्म हो गई। इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार बनी, जिसमें दीपक प्रकाश को फिर मंत्री बना दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि छह महीने की मूल अवधि 20 मई 2026 को पूरी हो रही थी।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह का कहना है कि दोबारा नियुक्ति के जरिए संविधान की भावना को दरकिनार करने की कोशिश की गई है। उनका तर्क है कि अगर किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाया जाता है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं होगा। इससे जनता के प्रति जवाबदेही कमजोर होगी और चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका भी प्रभावित हो सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कदम उठाया?
सोमवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम Court ने मामले को गंभीर संवैधानिक मुद्दा मानते हुए नोटिस जारी कर दिए। कोर्ट ने बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अब सभी पक्षों को अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि गैर-विधायक मंत्री की दोबारा नियुक्ति संविधान के अनुरूप है या नहीं। इस फैसले का असर भविष्य में ऐसे मामलों पर भी पड़ सकता है।












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