कैसे चीन की विस्तारवादी नीति को ISIS-K ने लगाया पलीता ? अफगानिस्तान में चारों खाने चित हो रहे जिनपिंग
अफगानिस्तान में चीन के भविष्य के प्रोजेक्ट खटाई में पड़ते नजर आ रहे हैं। ISIS-K लगातार चीनी नागरिकों और प्रोजेक्ट को निशाना बना रहा है। इससे शी जिनपिंग की विस्तारवादी नीति को धक्का लग रहा है।

चीन अब अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसने लगा है। अफगानिस्तान में उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम होने लगी है। शी जिनपिंग की हलक सुखाने वाले आतंकवादी संगठन का नाम है आईएसआईएस खुरासान, जिसकी दहशत के आगे तालिबानियों का आतंक भी फीका पड़ने लगा है। ISIS-K चीन को मुसलमानों और मुस्लिम संसाधनों का भी दुश्मन मानता है। जबकि, अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने सबसे पहले चीन को ही अपना मित्र बना लिया था। लेकिन, अब तालिबान भी अपनी जमीन पर चीन के हितों और उसके नागरिकों की रक्षा करने में फेल हो चुका है।

ISIS-K के कहर से कांपा चीन!
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विस्तारवादी नीति को अफगानिस्तान में तगड़ा झटका लग रहा है। तालिबानी शासन वाले अफगानिस्तान में एक और आतंकी संगठन आईएसआईएस खुरासान (ISIS-K) की वजह से चीन के लिए वहां भविष्य के सारे निवेश खटाई में पड़ते नजर आ रहे हैं। जहां एक ओर तालिबान और चीन में साठगांठ है, वहीं दूसरी ओर आईएसआईएस-के शी जिनपिंग की सरकार को मुस्लिम मुल्क और मुसलमानों के लिए खतरा मान रहा है। पिछले कुछ समय से इस खूंखार आतंकी संगठन ने जिस तरह से चीनी प्रोजेक्ट और चीनी नागरिकों पर वहां कहर बरपाया है, चीन का कम्युनिस्ट साम्राज्य भी थर्र-थर्र कांपने लगा है।

चीनी प्रोजेक्ट और नागरिक बन रहे हैं टारगेट
आईएसआईएस-के के बढ़ते खतरे को देखते हुए अफगानिस्तान में चीन के भविष्य के सारे प्रोजेक्ट मंझधार में फंसते नजर आ रहे हैं। अफगानिस्तान में जितने भी चीन के बड़े निवेश हैं, सब इस संगठन के टारगेट पर आ चुके हैं। तालिबानी शासकों की ओर से शी जिनपिंग की सरकार को लाख भरोसा दिया जा चुका है, लेकिन चीनी नागरिक और प्रोजेक्ट पर हमले लगातार जारी हैं। दरअसल इस तरह के हमलों की शुरुआत तभी से हो गई थी, जबसे तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया। पिछले दिसंबर में ही काबुल में उस होटल पर हमला किया गया था, जहां चीनी बिजनेसमैन का आना-जाना लगा रहता है। ISIS-K ने ही उस हमले की भी जिम्मेदारी ली थी।

चीन को मुसलमानों का दुश्मन मानता है ISIS-K
आईएसआईएस-खुरासान चीन पर किस कदर बौखलाया हुआ है, इसकी झलक पिछले साल उसके एक मैगजीन के संपादकीय में दिखी थी। उस संपादकीय का टाइटल था- 'चीन के साम्राज्यवाद का दिवास्वप्न' (China's Daydream of imperialism)। NIKKEI एशिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह एक मुस्लिम देश के संसाधनों को हड़पने की उसकी कथित कोशिश और शिंजियांग प्रांत के उइगर मुसलमानों का कथित अमानवीय उत्पीड़न के खिलाफ एक चेतावनी है।

तालिबान ने सबसे पहले चीन के साथ ही किया समझौता
रिपोर्ट के मुताबिक चीन की शिंजियांग सेंट्रल एशिया पेट्रोलियम एंड गैस (CAPEIC) ने 25 साल के लिए तालिबान के साथ तेल खनन kr डील पर हस्ताक्षर किए हैं। डील अफगानिस्तान के उत्तर-पश्चिमी आमू दरिया ऑयल फील्ड के लिए हुई है। एक और डील के तहत चीन तालिबान के साथ अफगानिस्तान के मशहूर मेस अयनक रिजर्व से तांबे के उत्खनन के लिए बात कर रहा है, जो कि काबुल से 40 किलोमीटर दक्षिणी पूर्व में है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी का लक्ष्य पहले साल में 15 करोड़ डॉलर और अगले तीन वर्षों में 54 करोड़ डॉलर निवेश का था। यह डील 2021 में हुई थी, जो कि मौजूदा तालिबान शासन का पहला अंतरराष्टरीय समझौता था।
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अफगानिस्तान में चारों खाने चित हो रहे जिनपिंग
लेकिन, चीनी नागरिकों और प्रोजेक्ट पर आतंकी हमलों ने अफगानिस्तान में चीन के हितों को हिला कर रख दिया है। कथित रूप से अब ऐसे आतंकियों से निपटने के लिए चीन की ओर से तालिबानियों को ज्यादा बेहतर और अत्याधुनिक हथियार भी उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में उपलब्ध अकूत प्राकृतिक संसाधन चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के लिए एक बहुत ही आसान और सस्ता जुगाड़ है। लेकिन, अफगानिस्तान के बिगड़ते हालात ने इस क्षेत्र में चीन के सपनों में पलीता लगा दिया लगता है।
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