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अरूणाचल प्रदेश में नाम बदलता जा रहा चीन, क्या तिब्बत पॉलिसी साबित हो रही भारत के लिए हानिकारक?

कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अगर भारत तिब्बत नीति को बदलता है, तो चीन सिक्किम नीति को बदल देगा, जो भारत के लिए एक और सिरदर्द साबित होगा। और LAC पर जो भी सफलता मिली है, वो खराब हो जाएगी।

India Tibet Policy

India Tibet Policy: अरूणाचल प्रदेश के 11 जगहों के नाम बदलकर चीन ने साबित कर दिया है, कि भारत को लेकर उसकी नीति में एक पैसे का परिवर्तन नहीं आया है और अरूणाचल प्रदेश में वो भारत के लिए सिरदर्द पैदा करता रहेगा। इसके साथ ही, एक्सपर्ट्स अब सवाल उठाने लगे हैं, कि आखिर कब तक भारत अरूणाचल प्रदेश पर चीन की एकतरफा कार्रवाई को खामोश होकर देखता रहेगा और आखिर भारत, तिब्बत पर फैसला कर, चीन को उसी की भाषा में जवाब क्यों नहीं दे रहा है। आईये समझते हैं, कि आखिर तिब्बत को लेकर भारत की अभी तक की नीति क्या रही है और क्या भारत को अब अपनी तिब्बत नीति में आक्रामक परिवर्तन करना चाहिए?

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अरूणाचल पर नया विवाद क्या है?

चीन ने अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा दोहराते हुए 11 स्थानों के नामों का मानकीकरण किया है, जिसे वह "तिब्बत का दक्षिणी भाग ज़ंगनान" कहता है। चीन ने अरूणाचल प्रदेश में 11 जगहों के नाम उस वक्त बदले हैं, जब पिछले हफ्ते ही भारत ने अरूणाचल प्रदेश में जी20 की एक बैठक का आयोजन किया था, जिसमें चीन ने हिस्सा नहीं लिया था। वहीं, इन 11 जगहों के नये नामकरण के साथ ही अब तक चीन अरूणाचल प्रदेश के 32 जगहों के नाम परिवर्तन कर चुका है। इसके साथ ही, चीन अरूणाचल प्रदेश के लोगों को चीन के साथ कनेक्ट करने के लिए स्टेपल वीजा की सुविधा भी शुरू कर चुका है। चीन कहता है, कि अरूणाचल प्रदेश के लोगों को 'अपने देश' यानि चीन की यात्रा करने के लिए वीजा की जरूरत नहीं है, लेकिन चूंकी अरूणाचल प्रदेश भारत के 'कब्जे' में आता है, इसीलिए स्टेपल वीजा जारी किया जाता है। भारत इसको लेकर भी कड़ा रूख अपना चुका है, लेकिन चीनी नजरिए में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लिहाजा, अब एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत को अपनी तिब्बत नहीं में परिवर्तन करना चाहिए, क्योंकि अब ये भारत के लिए ही हानिकारक साबित हो रहा है।

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भारत की तिब्बत नीति क्या है?

वास्तविक तौर पर सदियों से तिब्बत ही भारत का पड़ोसी था और असल में भारत और चीन की सीमा कहीं मिलती ही नहीं थी। भारत और तिब्बत करीब 3500 किलोमीटर की सीमा रेखा साझा करते हैं, ना कि बाकी चीन के साथ। लेकिन, साल 1914 में पहली बार अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ तिब्बती प्रतिनिधियों ने चीनियों के साथ मिलकर ब्रिटिश भारत के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए और सीमाओं का निर्धारण किया। उस वक्त तक तिब्बत पर चीन का कब्जा नहीं था, लेकिन 1950 में तिब्बत पर चीन के पूर्ण अधिकार के बाद, चीन ने दोनों देशों को विभाजित करने वाले सम्मेलन और मैकमोहन रेखा को खारिज कर दिया। इसके बाद तत्कालीन नेहरू सरकार के दौरान साल 1954 में भारत ने तिब्बत को "चीन के तिब्बत क्षेत्र" के रूप में मान्यता देने के लिए चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। 1959 में, तिब्बती विद्रोह के बाद, दलाई लामा (तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक नेता) और उनके कई अनुयायी भारत भागकर आ गये। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दलाई लामा और तिब्बती शरणार्थियों को आश्रय दिया, और निर्वासन में तिब्बती सरकार की स्थापना में मदद की। आधिकारिक भारतीय नीति यह है, कि दलाई लामा एक आध्यात्मिक नेता हैं, और भारत में एक लाख से अधिक निर्वासन वाले तिब्बती समुदाय को भारत में कोई भी राजनीतिक गतिविधि करने की अनुमति नहीं है।

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भारत की तिब्बत नीति में बदलाव

भारत की तिब्बत नीति में बढ़ते तनाव के बीच बदलाव भी आया है और पिछले कुछ सालों में भारत सरकार के अलग अलग मंत्री तिब्बत के निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के साथ नजर आने लगे हैं। उदाहरण के लिए, साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारत में निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रमुख लोबसांग सांगे को आमंत्रित किया था। हालांकि, पीएम मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान तिब्बत के निर्वासित नेता को दूसरी बार आमंत्रित नहीं किया, ताकि उनके और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच, एक दूसरे अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के रास्ते में कोई बाधा नहीं आए। लेकिन, 2021 में भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने दलाई लामा को 2013 के बाद से इस तरह की पहली सार्वजनिक पावती में बतौर प्रधानमंत्री पहली बार बधाई दी। लेकिन, भारत की तिब्बत नीति में ये बदलाव सिर्फ और सिर्फ प्रतीकात्मक हैं और असल तिब्बत नीति में भारत ने कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसे में सवाल ये उठते हैं, क्या भारत के लिए तिब्बत नीति में बदलाव नहीं करना, क्या कोई मजबूरी है?

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तिब्बत नीति क्यों नहीं बदलती भारत सरकार?

पिछले कुछ दशकों में, चीन ने अपने मुख्य भूमि से भारी संख्या में लोगों को तिब्बत में बसाया है और उन्हें हर तरह के अधिकार दे दिए हैं। जिसकी वजह से चीनी मुख्य भूमि के लोग अब तिब्बती बनकर चीन के पक्ष में माहौल बनाने का काम करते हैं। इसके अलावाा, चीन दलाई लामा के साथ तिब्बती आबादी के संबंधों को बुरी तरह से कुचल रहा है और लोगों को लुभाने के लिए इस क्षेत्र में निवेश, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। वहीं, जैसे-जैसे भारत-चीन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है और गलवान घाटी में झड़प के बाद हिंसक हो रहा है, चीन ने तिब्बती मिलिशिया समूहों को खड़ा करना शुरू कर दिया है, जो भारत के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर चीनी होते हैं, जो खुद के तिब्बती होने का दावा करते हैं। इसके अलावा, भारतीय सेना तिब्बती स्पेशल फ्रंटियर फोर्स को भी ट्रेनिंग देती है, जिससे भविष्य में तिब्बती आपस में लड़ सकते हैं। वहीं, भारत सरकार ने 1987 के कट-ऑफ वर्ष के बाद भारत में पैदा हुए तिब्बतियों को नागरिकता देना बंद कर दिया है। इससे तिब्बती समुदाय के युवाओं में असंतोष की भावना पैदा होने लगी है और भारत से दिल टूटने लगा है। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका ने भी तिब्बती शरणार्थियों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है, जिससे तिब्बत में अमेरिका खुद को नये खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जो तिब्बत में भारत की इकलौती भूमिका को प्रभावित करता है। वहीं, कुछ एक्स्पर्ट्स ये भी कहते हैं, कि अगर भारत तिब्बत पर अपना रूख बदलता है, तो चीन भी सिक्किम को लेकर अपना रूख बदल लेगा, जिससे ये विवाद और बढ़ेगा।

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भारत के पास तिब्बत को लेकर कानून नहीं

एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, कि "चीन ने भारत के विशाल अरुणाचल राज्य, जिसे वह "दक्षिण तिब्बत" कहता है, वहां स्थानों के नामों को चीनीकृत करने के अपने अभियान को तेज कर दिया है। फिर भी भारत अभी भी इस रुख पर कायम है, कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग है। क्या इससे ज्यादा आत्म-हानिकारक स्थिति हो सकती है? आपको बता दें, कि वर्तमान में भारत में तिब्बतियों पर एक कार्यकारी नीति (कानून नहीं) है। जबकि, वर्तमान नीति भारत में तिब्बतियों के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण विकास थी, लेकिन भारत तिब्बती मुद्दों का कानूनी समर्थन नहीं करता है, जो चीन के लिए बहुत पॉजिटिव बात रही है, क्योंकि उसका कोई पड़ोसी तिब्बत के लिए आवाज नहीं उठाता है और चीन ने बेरहमी से तिब्बतियों की स्वतंत्रता की मांग को कुचल दिया है। इसलिए, अब समय आ गया है, कि भारत को भी चीन से निपटने के लिए तिब्बत मुद्दे पर आक्रामक नीति अपनाना चाहिए, जिसकी मांग लंबे अर्से से एक्सपर्ट्स कर रहे हैं। इसके अलावा, भारत को अभी इसलिए भी तिब्बत को लेकर आक्रामक रूख अपनाने की जरूरत है, क्योंकि भारत में रहने वाले हजारों युवा तिब्बती, जो फिलहाल दलाई लामा के जिंदा रहने तक शांत हैं, वो दलाई लाना के गुजरने के बाद भारत के बाहर अपना नेतृत्व खोज सकते हैं और उनका भारत से दिल टूट सकता है। लिहाजा, ये स्थिति भारत के लिए और भी ज्यादा हानिकारक हो सकती है।

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