अफगानिस्तान में अमेरिका के 'ग्रेट गेम' में फंसे चीन-पाकिस्तान! साउथ एशिया में आग लगाने की तैयारी
इस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की पूरी दुनिया में आलोचना की जा रही है कि अमेरिका ने कट्टरपंथियों के हाथ में पूरे अफगानिस्तान को छोड़ दिया है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका का गेम कुछ और ही है।
वॉशिंगटन, अगस्त 24: अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा अमेरिकी सेना के लिए हार माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का अफगानिस्तान से बाहर निकलना काफी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है और उसके निशाने पर अब तालिबान नहीं, चीन और पाकिस्तान है। जिस दिन काबुल पर तालिबान का कब्जा हुआ, उसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने उसे 'गुलामी की बेड़ी' को तोड़ना बताया और इमरान खान ने सुन्नी पश्तूनों की प्रशंसा थी और इमरान खान के साथ साथ चीन, रूस, ईरान और तुर्की भी तालिबान पर नरम आ रहा है तो दूसरी तरफ अमेरिका से जो संकेत मिल रहे हैं, वो कुछ और ही इशारा कर रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका ने अफगानिस्तान से 'ग्रेट गेम' का आगाज कर दिया है, जिसकी आग में पाकिस्तान बुरी तरह झुलसेगा तो चीन के लिए उस आग को बुझाना काफी भारी पड़ने वाला है।

चीन को लेकर बाइडेन का प्लान
इस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की पूरी दुनिया में आलोचना की जा रही है कि अमेरिका ने कट्टरपंथियों के हाथ में पूरे अफगानिस्तान को छोड़ दिया है और अफगानिस्तान का भविष्य इस्लामाबाद में कतई नहीं बनाया जा सकता है, लेकिन तमाम आलोचनाओं के बाद भी जो बाइडेन प्रशासन ने अफगानिस्तान में फैली अराजकता पर कदम पीछे नहीं खींचे। अफगानिस्तान से वापसी के बाद अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता को नुकसान भले ही पहुंचा हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वाशिंगटन को इस नुकसान की भरपाई चीन की बढ़ती चुनौती के खिलाफ कदम उठाकर करनी होगी, अगर उसका एकमात्र वैश्विक महाशक्ति का दर्जा बनाए रखने का कोई इरादा है। शायद यह उप राष्ट्रपति कमला हैरिस के सिंगापुर दौरे के बाद बड़ा संकेत दे दिया गया है। अमेरिका से जो रिपोर्ट मिल रही, उसमें कहा गया है कि अमेरिका अब चीन को अफगानिस्तान में ऐसा उलझाना चाहता है, जिससे चीन को ना सिर्फ आर्थिक नुकसान हो, बल्कि वो भी उसी तरह से पिस जाए, जैसे अमेरिका और रूस पिसा है। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि चीन इस जाल में फंस भी गया है, क्योंकि उसका बीआरई प्रोजेक्ट अफगानिस्तान से ही होकर गुजरता है।

अफगानिस्तान से अलग हुआ अमेरिका
31 अगस्त के बाद अमेरिका और ब्रिटेन अफगानिस्तान से पूरी तरह से अलग हो जाएगा और अफगानिस्तान में अमेरिका की कोई सैन्य प्रतिबद्धता नहीं रह जाएगी। इसके साथ ही यूरोपीय संघ भी भौतिक तौर पर काबुल से अलग हो जाएगा, जिससे अरबों डॉलर अमेरिका और यूरोपीय संघ के बचेंगे। वहीं, पाकिस्तान को अब तक जो भी आर्थिक मदद मिल रही थी, वो भी मिलनी बंद हो जाएगी। पाकिस्तान ने प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर हमेशा से तालिबान की मदद की है और एक जनवरी 2018 को अपने ट्वीट पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि ''पाकिस्तान अमेरिका के साथ धोखा करता आया है और वो आतंकियों को शरण दे रहा है''। उसके साथ ही ट्रंप ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सुरक्षा सहायता पर भी प्रतिबंध लगा दिया। पाकिस्तान लगातार झूठ बोलता रहा कि तालिबान के साथ उसका कोई संबंध नहीं है, लेकिन अमेरिका की खुफिया एजेंसी को समझते समय नहीं लगा कि तमाम तालिबानी नेता इस्लामाबाद में ही छिपे हुए हैं।

आतंकियों को पाकिस्तान का समर्थन
अमेरिका ये भी जान गया कि अफगानिस्तान में तालिबान ने जब अमेरिकी सेना पर हमला किया, उसमें भी पाकिस्तान का हाथ रहा है। वहीं, अमेरिका ने आईएसआई और तालिबान के बीच का पूरा सम्पर्क भी जान लिया। लिहाजा, अब रिपोर्ट है कि 31 अगस्त के बाद अमेरिका का रूख वैश्विक राजनीति को लेकर पूरी तरह से बदलने वाला है। पाकिस्तान को अमेरिकी फंड के साथ साथ यूरोपीय संघ से फंड मिलना पूरी तरह से बंद हो जाएगा। वहीं, आतंकियों को समर्थन देने के लिए यूरोपीयन यूनियन पाकिस्तान से व्यापार में दी गई स्पेशल छूट भी खत्म करने वाला है। जो बाइडेन ने अभी तक इमरान खान से बात नहीं की है। अमेरिका ने 2001 से पाकिस्तान को 35 बिलियन अमरीकी डॉलर से ज्यादा की आर्थिक सहायता दी है और यूरोपीय संघ ने इस्लामाबाद को चीन द्वारा दिए गए कर्ज की तुलना में अधिक अनुदान दिया है। लेकिन, अब रिपोर्ट है कि 31 अगस्त के बाद पाकिस्तान को तमाम मदद मिलनी बंद हो जाएगी।

अमेरिका का कैसा होगा 'अफगान प्लान'
इसमें कोई शक नहीं कि 31 अगस्त के बाद अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में 'राजनीतिक अंधेरा' हो सकता है और अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के लिए भी अफगानिस्तान में रहना संभव नहीं होगा। लेकिन, एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अमेरिकी सैटेलाइट अफगानिस्तान के चप्पे-चप्पे पर नजर रखने के लिए पर्याप्त है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका के लिए ये पता लगाना मुश्किल नहीं होगा कि तालिबान, अलकायदा और आईएसआईस कितना मजबूत हो रहा है। इसके साथ ही एक्सपर्ट्स का कहना है कि 2016 में पाकिस्तान के पॉश इलाके में छिपे तालिबान के बड़े नेता मुल्ला मंसूर अख्तर को अमेरिका ने ड्रोन से उड़ा दिया था और पाकिस्तान को आज तक नहीं पता लग पाया कि वो ड्रोन कहां से आया था, लिहाजा एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन इमरान खान सरकार और पाकिस्तान से काफी ज्यादा नाराज है और कई अमेरिकन नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहना शुरू कर दिया है कि तालिबान को पाकिस्तान ने ही समर्थन किया है। लिहाजा अब माना जा रहा है कि अमेरिकी प्रकोप का सामना पाकिस्तान को बहुत जल्द बनना पड़ेगा।

तालिबान का कंधा, अमेरिका का हथियार?
15 अगस्त को जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया तो इस देवबंदी-इस्लामी सुन्नी संगठन की जमकर तारीफ की, जबकि इस जेहादी संगठन का ना चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी में कोई स्थान है और नाही रूस की कम्यूनिस्ट पार्टी में। चीन मुसलमानों के साथ क्या सलूक करता है, ये तालिबान भी जानता है। वहीं, तालिबान ईरान की सुन्नी सरकार को काफिर मानता है। ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि क्या अमेरिका ने अरबों रुपये के अत्याधुनिक हथियार जान बुझकर तो अफगानिस्तान में नहीं छोड़े हैं। ताकि, तालिबान अपने पड़ोसी देशों में हिंसा को बढ़ा सके? हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कुछ एक्सपर्ट्स ने शक जताया है कि तालिबान के हाथ इतने ज्यादा अमेरिकी अत्याधुनिक हथियार लगे हैं कि वो अब काफी ज्यादा खतरनाक और शक्तिशाली हो गया है और अब वो रूस, चीन और खुद पाकिस्तान के खिलाफ भी खतरनाक हो सकता है।

चीन-रूस-पाकिस्तान पर भारी
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब और ज्यादा खतरनाक हो चुके तालिबान से चीन को शिनजियांग में भारी तबाही मचने का डर है कि कहीं उइगर आतंकियों को तालिबान का साथ नहीं मिल जाए और वो शिनजियांग को अलग देश बनाने की मांग को और ज्यादा तेज नहीं कर दे। वहीं, रूस को भी आतंकवाद का डर है, जबकि तालिबान ने काबुल पर कब्जा करने के बाद ही पाकिस्तान तालिबान के 2300 आतंकियों को रिहा कर दिया है, जिसने पाकिस्तान के लिए मुसीबत बढ़ा दी है। वहीं, अब माना जा रहा है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों का तेजी से विस्तार होगा और ये देश अब और ज्यादा कट्टरपंथियों के हाथ में जाएगा। वहीं, माना जा रहा है कि सरकार बनाने के बाद ही तालिबान डूरंड लाइन को लेकर पाकिस्तान पर प्रेशर बनाना शुरू कर देगा। माना जा रहा है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान से बहुत सोच समझकर कदम पीछे खींचे है और उसका पूरा ध्यान चीन को उलझाना है, जबकि पाकिस्तान को सबक सिखाना है।












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