नेपाल चुनाव में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है चीन, क्या खतरे में है भारत का पड़ोसी लोकतंत्र ?
नेपाल में इसी महीने करीब डेढ़ दशक पुराने लोकतंत्र की 11वीं सरकार चुनने के लिए मतदान होने जा रहा है। यानि नेपाल का लोकतंत्र पहले से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऊपर से चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) वहां अपना दखल बढ़ाने की कोई भी कोशिश नहीं छोड़ रही है। जब से नेपाल में लोकतंत्र आया है, चीन ने किसी ना किसी तरह से वहां अपना दखल कायम रखने की कोशिश की है। पिछले कई सरकारों के कार्यकाल में उसे सफलता भी मिली है। लिहाजा, उसका यह प्रयास इस चुनाव से पहले भी देखे जाने की बात सामने आ रही है, जो कि नेपाली लोकतंत्र के लिए किसी भी तरह से सेहतमंद नहीं है।

नेपाल में 14 साल का लोकतंत्र, 11वीं सरकार के लिए चुनाव
न्यूज एजेंसी एएनआई को एशिया-पेसिफिक फाउंडेशन के सीनियर फेलो मार्कस एंड्रियोपोलोस ने जो कुछ बताया है, वह ड्रैगन के खतरनाक मंसूबे को जाहिर कर रहा है। एंड्रियोपोलोस फॉरेन पॉलिसी के लिए लिखते रहे हैं। गौरतलब है कि नेपाल में 20 नवंबर को चुनाव हो रहा है। हिमालय की गोद में बैठा यह देश 2008 में ही लोकतांत्रिक गणराज्य बना था और इतने कम वर्षों में इस चुनाव के माध्यम से वहां 11वीं बार सरकार का गठन होना है। मतलब, नेपाल का लोकतंत्र अभी खुद ही कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिससे वोटरों का भी मोहभंग होता जा रहा है। बड़ी वजह है कि नेपाली राजनीतिक दलों की गुटबाजी ने अभी तक यहां की लोकतांत्रिक प्रणाली को पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं होने दिया है।

नेपाल से बीजिंग का हित साधना चाहता है ड्रैगन
एंड्रियोपोलोस का कहना है कि नेपाल का भूगोल ऐसा है, जिसमें चीन को नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता, लेकिन इसकी वजह से ड्रैगन का वहां बढ़ता हस्तक्षेप भी दिखाई देता है। चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग का तीसरा कार्यकाल शुरू हुआ है और खासकर दक्षिण एशिया में उनकी महत्वाकांक्षा के लिए नेपाल का चुनाव परिणाम उनके लिए खास मायने रखता है। चीन की कोशिश होगी कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियां एकजुटता दिखाएं, लेकिन यह कितनी टिकाऊ होगी, इसको लेकर चीन भी भ्रम में नहीं है। दरअसल, जबसे नेपाल में लोकतंत्र आया है, चीन ने वहां अपनी पैठ बढ़ाने के लिए इन्ही कम्युनिस्टों और वामपंथी दलों का इस्तेमाल किया है। चीन की पूरी तरह से कोशिश रही है कि वहां ऐसी सरकार सत्ता में रहे, जिससे उसका हित साधना आसान हो जाए।

नेपाल के शासन में चीन का हस्तक्षेप खुलकर दिख चुका है
2017 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) ने घोषणा की थी कि वह उस साल का आम चुनाव गठबंधन में लड़ेंगे। कई विश्लेषकों को संदेह है कि यह सब बीजिंग में सत्ताधारी चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के इशारे पर हुआ था। 2018 में नई-नवेली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ने सरकार बनाई थी। लेकिन, 2021 में गठबंधन टूट गया था। तब माओइस्ट ने नेपाली कांग्रेस पार्टी के साथ साझेदारी की थी। लेकिन, इसके बारे में कहा जाता है कि यह वैचारिक नहीं, बल्कि पूरी तरह से अवसरवादी साझेदारी थी। इसलिए चीन अब यह चाहता है कि नेपाल में ऐसी सरकार बने, जिसका नेतृत्व वैचारिक तौर पर चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के करीब हो।

चीन, नेपाल का इस्तेमाल मुल्क से बाहर भी करना चाहता है
नेपाल में चीन के सहयोग से कई प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं, जिसको लेकर भी बीच-बीच में सवाल और संदेह उठने की खबरें आती रही हैं। लेकिन, काठमांडू में बीजिंग की विचारधारा वाली सरकार जिनपिंग सरकार की प्राथमिकता में नजर आती है। क्योंकि, सीसीपी को नेपाल की जरूरत मुल्क से बाहर भी है। 2021 की बात है संयुक्त राष्ट्र में जब चीन शिंजिआंग, तिब्बत और हॉन्ग कॉन्ग में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए आलोचनाओं से घिरा हुआ था, तब नेपाल में चीन-हित वाली कम्युनिस्ट सरकार ने बाकी दक्षिण एशिया देशों के साथ उसकी सराहना में जुट गया था। एंड्रियोपोलोस का कहना है कि अगर नेपाल में सीसीपी के हित वाली सरकार रहती है तो वह तिब्बत के मसले पर भी अपने में ज्यादा सुकून महसूस हो सकता है।

नेपाल में चीन की दखल, लोकतंत्र के लिए खतरा!
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने तो कई बार ऐसा रुख अपनाया था, जैसे लगने लगा था कि उनका कंट्रोल सीधे जिनपिंग के हाथों में जा चुका है। उन्होंने उस समय नए नक्शे के नाम पर भारत के साथ भी द्विपक्षीय संबंधों को तनाव में ला दिया था। 2019 में उन्होंने ताइवान के मसले पर चीन का खुलकर समर्थन किया था। चीन एकबार फिर से वह सब तिकड़म में जुटा दिख रहा है। लेकिन, यह एक संप्रभु देश और उसके लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। वैसे नेपाल में चाहे जिस किसी दल या गठबंधन की सरकार बने, चीन उसे अपनी गिरफ्त में फांसने की कोशिश किए बिना नहीं रहेगा।












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