चीन ने अफगानिस्तान को नहीं दी एक फूटी कौड़ी, खजाना निकालने से किया मना, बौखलाया तालिबान

अफगानिस्तान में खनन का सपना पिछले कई सालों से चीन ने पालकर रखा हुआ है और अमेरिका की वापसी के बाद, चीन ने संकेत दिया था, कि वह भूगर्भ से दुर्लभ खनिज संपदाओं को बाहर निकालने में तालिबान की मदद करेगा।

बीजिंग/काबुल, अक्टूबर 02: अमेरिका जब अफगानिस्तान से निकला तो चीन ने तालिबान को जमकर सपने दिखाए, कि वो अफगानिस्तान की धरती में छिपा अरबों का खजाना निकालेगा, जिससे पिछले 40 सालों से युद्धग्रस्त रहा देश विकास के सूरज को देख सकेगा और ड्रैगन के दिखाए सपने में फंसा तालिबान कुलांचे भर रहा था, लेकिन साल भर बीत जाने के बाद अब तालिबान को अहसास हो रहा है, कि चीन ने उसे धोखा दिया है और चीन की कंपनियां अफगानिस्तान के अंदर किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए तैयार नहीं हो रही हैं, लिहाजा अब तालिबान का सब्र जवाब देने लगा है।

चीन से टूट रहा तालिबान का दिल

चीन से टूट रहा तालिबान का दिल

अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद चीन को भी उम्मीद जगी थी, कि वो अफगानिस्तान में अपने प्रभाव का विस्ताक करेगा, जिससे उसके अफगानिस्तान में छिपे अरबों डॉलर के खजाने तक पहुंचने का रास्ता मिल जाएगा, लेकिन चीन ने जैसा सोच रखा था, वैसा नहीं हो पाया। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से जाने के एक साल बाद युद्धग्रस्त देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है और करीब 2 करोड़ लोगों के सामने खाने का गंभीर संकट है। वहीं, पैसों के लिए पिताओं को अपनी छोटी छोटी बेटियों को बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। लेकिन, तालिबान ने जिस बीजिंग पर भरोसा किया था, उसने उसे बीच मंझधार में फंसा दिया है। और अब दोनों पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।

आमने-सामने चीन और तालिबान

आमने-सामने चीन और तालिबान

अफगानिस्तान के चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इनवेस्टमेंट के उपाध्यक्ष खान जान आलोकोजे ने एक इंटरव्यू में कहा कि, "चीन ने फूटी कौड़ी भी अफगानिस्तान में निवेश नहीं की है।" उन्होंने कहा कि, "उनकी (चीन की) कई कंपनियां आईं, हमसे मिलीं, शोध किया और फिर चली गईं और गायब हो गईं, जो निराशाजनक है।" लेकिन, चीनी नजरिए से देंखे, तो तालिबान ने सत्ता संभालने के लिए उन अलगाववादी ताकतों के खिलाफ कुछ भी नहीं किया है, जिनका संबंध चीन के शिनजियांग क्षेत्र में उग्रवाद फैलाने की कोशिश करने वाले उइगर मुस्लिमों से हैं और इन संबंधों का विस्तार हो रहा है, जिसकी वजह से दूर पश्चिमी शिनजियांग क्षेत्र में अलगाववादी गतिविधियों का संचार हो रहा है। वहीं, मामले से परिचित कुछ लोगों ने कहा कि, भले ही तालिबान बौखलाहट दिखा रहा हो, लेकिन तालिबान अफगानिस्तान के संसाधनों का दोहन करने के लिए मौजूदा परियोजनाओं की शर्तों पर फिर से बातचीत करने की कोशिश कर रहा है।

आतंकवाद रोकने में नाकाम तालिबान

आतंकवाद रोकने में नाकाम तालिबान

हालांकि, तालिबान ने जरूर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने आतंकवादियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देने और आतंकवादी संगठनों का समर्थन नहीं करने की कसम खाई हो, लेकिन चीन को तालिबान पर विश्वास नहीं है। चीन ने कई मौकों पर तालिबान को पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, यानि ईटीआईएम के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा है, जो एक मुस्लिम अलगाववादी समूह है, जिसका मकसद शिनजियांग प्रांत को चीन से अलग कर एक अलग इस्लामी राज्य कायम करने की है और जिसका दमन चीन ने काफी क्रूरता से किया है। चीन ने शिनजियांग प्रांत के तमाम मस्जिदों को तोड़ दिया और कुछ सरकारी मस्जिदों का निर्माण किया, जिनकी कड़ी निगरानी की जाती है। वहीं, शिनजियांग में चीन ने कई केन्द्रों की स्थापना की है, जहां चीन की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां उइगर मुस्लिमों में देशप्रेम की भावना भरती है। वहीं, चीन और अफगानिस्तान 76 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं और चीन का कहना रहता है, कि अफगानिस्तान से चरमपंथी तत्व चीन में घुस आते हैं और दहशत फैलाने की कोशिश करते हैं।

चीन के आरोप पर क्या कहता है तालिबान?

चीन के आरोप पर क्या कहता है तालिबान?

वहीं, दोहा में तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता सुहैल शाहीन के मुताबिक, तालिबान ने बार-बार कहा है कि ईटीआईएम अफगानिस्तान में काम नहीं कर रहा है और वे "किसी को भी किसी अन्य देश के खिलाफ अफगान धरती का उपयोग करने की अनुमति नहीं देंगे।" लेकिन मई में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कई देशों का हवाला देते हुए कहा गया है, कि ईटीआईएम अफगानिस्तान में मौजूद है। शिनजियांग में तनाव पैदा करने वाले किसी भी समूह के लिए समर्थन बीजिंग के लिए एक लाल रेखा है, और शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के साथ चीन जो सलूक कर रहा है, उसे अमेरिका 'नरसंहार' कहता है। शिनजियांग क्षेत्र कई सालों से अशांति का अड्डा रहा है, लेकिन 2012 में सत्ता संभालने के बाद चीन ने अलगाववादियों का काफी बेरहमी से दमन किया है, वहीं पश्चिमी देश जब आवाज उठाते हैं, तो चीन उसे अपने आंतरिक मामलों में दखल मानता है। वहीं, आजतक एक भी मुस्लिम देश चीन के सामने चूं तक कहने की हैसियत में नहीं आ पाया। आईटीसीटी के नाम से मशहूर यूके स्थित थिंक टैंक इस्लामिक थियोलॉजी ऑफ काउंटर टेररिज्म के डिप्टी डायरेक्टर फरान जेफरी ने कहा कि, "ईटीआईएम निश्चित रूप से चीन के लिए एक टिकिंग टाइम बम है, जो इसे एक दीर्घकालिक खतरा बनाता है।"

तालिबान पर चीन को भरोसा नहीं

तालिबान पर चीन को भरोसा नहीं

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने अफगानिस्तान के अंदर तालिबान और ईटीआईएम के बीच के संबंध को लेकर पूछे गये सवाल पर कहा कि, "अफगान तालिबान के साथ हमारी बातचीत के मुताबिक, तालिबान पक्ष ने कई मौकों पर कहा कि, वे अपने क्षेत्र को आतंकवादियों को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे और किसी भी आतंकवादी ताकतों को अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं करने देने की बात कही गई है, जिसमें चीन भी शामिल है। लेकिन, अफगानिस्तान के अंदर पनपे दर्जनों आतंकवादी संगठनों ने चीन की नाक में दम कर रखा है। सिर्फ अफगानिस्तान में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अंदर भी चीनी नागरिकों को पाकिस्तान तालिबान के आतंकी मारते हैं, लिहाजा चीन के लिए अफगानिस्तान में निवेश करना खतरे से खाली नहीं है।

अफगानिस्तान में अरबों की दौलत

अफगानिस्तान में अरबों की दौलत

हालांकि, अफगानिस्तान में खनन का सपना पिछले कई सालों से चीन ने पालकर रखा हुआ है और अमेरिका की वापसी के बाद, चीन ने संकेत दिया था, कि वह भूगर्भ से दुर्लभ खनिज संपदाओं को बाहर निकालने में तालिबान की मदद करेगा। वहीं, काबुल पर कब्जा करने के बाद अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान की दी जाने वाली सारी मदद को रोक दिया, लेकिन चीन उन कुछ देशों में से एक था, जिसने नए शासन को आर्थिक जीवन रेखा का वादा किया था। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पूर्व कर्नल झोउ बो ने अमेरिकी सेना के काबुल से निकलने के कुछ दिन पहलेृ न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा था, कि "चीन एक सुनहरे अवसर को भुनाने की कोशिश करेगा, और अफगानिस्तान के अंदर उस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश करेगा, जो अमेरिका के जाने से खाली हुई है। उन्होंने संबंधों में वृद्धि के प्रमुख लाभ के रूप में अफगानिस्तान की खनिज संपदा तक पहुंच का हवाला दिया था।

अफगानिस्तान के जी लपलपाता ड्रैगन

अफगानिस्तान के जी लपलपाता ड्रैगन

चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने से पहले और बाद में तालिबान के प्रतिनिधियों के साथ बार-बार मुलाकात की थी। इसी साल मार्च में चीनी विदेश मंत्री ने तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी के साथ बातचीत के लिए काबुल का दुर्लभ दौरा किया था। देश के नेताओं की प्रशंसा करने और बेल्ट एंड रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रम में अफगानिस्तान की भागीदारी के लिए समर्थन का संकेत देने के बाद भी वांग यी का बयान हवा में गायब हो गया। वहीं, चीनी विदेश मंत्री की तरफ से कहा गया था, कि चीन को उम्मीद है कि, अफगानिस्तान के अंदर तालिबान ईटीआईएम आतंकी संगठन के खिलाफ एक्शन लेगा, जो चीन में अशांति पैदा करना चाहता है। लेकिन, बीजिंग आश्वस्त नहीं है, कि तालिबान कोई कार्रवाई कर रहा है, लिहाजा उसने अफगानिस्तान में किए जाने वाले भविष्य के तमाम निवेशों को रोक दिया है। जिसमें 3 अरब डॉलर का वो निवेश भी शामिल है, जिसके तहत चीन की सरकारी कंपनी अफनागिस्तान के अंदर खनिज निकालने का काम करने वाली थी और तालिबान ने लंबे समय से रुकी हुई परियोजना से प्रति वर्ष करोड़ों डॉलर कमाने की उम्मीद की थी।

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