प्लीज, कर्ज में कुछ राहत दे दो, चीन के सामने 'रोया' भारत का ये पड़ोसी देश, ड्रैगन से मिला टका सा जवाब
श्रीलंकन राष्ट्रपति के कर्ज पेमेंट री-स्ट्रक्टर के अनुरोध को चीन ने अस्वीकार कर दिया है और अब डर ये है, कि क्या चीन श्रीलंका के आंतरिक मामलों में दखल देगा?
बीजिंग/कोलंबो, जनवरी 11: दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका ने चीन के सामने कर्ज में कुछ छूट के लिए गुहार लगाई है, लेकिन चीन ने कर्ज में किसी भी तरह की छूट देने से इनकार कर दिया है। दो दिन पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति ने चीन से अनुरोध किया था, कि श्रीलंका की आर्थित स्थिति काफी ज्यादा खराब है, लिहाजा चीन की तरफ से श्रीलंका को कर्ज स्ट्रक्चर में कुछ रियायत दी जाए, जिसे चीन ने ना सिर्फ सीधे तौर पर नकार दिया है, बल्कि श्रीलंका के बहाने चीन ने भारत और अमेरिका को भी लपेटने की कोशिश की है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति ने किया था अनुरोध
रविवार को कोलंबो में चीनी स्टेट काउंसलर और विदेश मामलों के मंत्री वांग यी के साथ एक बैठक के दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने चीन से श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कर्ज में छूट देने का अनुरोध किया था। श्रीलंकन राष्ट्रपति ने चीन से दक्षिण एशियाई देश की बिगड़ती वित्तीय स्थिति को नेविगेट करने में मदद करने के प्रयास के तहत श्रीलंका के कर्ज चुकाने के स्ट्रक्चर को फिर से बनाने की अपील की थी, जिसका मतलब ये होता है कि, कर्ज चुकाने के लिए जो साइकिल बना हुआ है, उसमें कुछ मोहलत दी जाए, क्योंकि श्रीलंका की आर्थिक स्थिति काफी खराब है और श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे की कार्यालय की तरफ से ये अनुरोध जारी किया गया था।

चीन के सामने फैलाया था 'हाथ'
चीन के राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से जारी किए गये 'अनुरोध' में चीन से अपील की गई थी, कि श्रीलंका हाल के महीनों में गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है और विदेशी मुद्रा संकट के कारण देश दिवालिएपन की तरफ बढ़ रहा है और आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष कर रहा है। लिहाजा, ऋण पुनर्गठन में मदद के लिए चीन की तरफ से मदद की जाए। श्रीलंकन राष्ट्रपति के इस अनुरोध के बाद चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स में एक बड़ा लेख लिखकर ना सिर्फ सार्वजनिक तौर पर श्रीलंका के अनुरोध को ठुकरा दिया गया है, बल्कि ग्लोबल टाइम्स के लेख में भारत, अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के खिलाफ चीन ने आरोप भी लगाए हैं।

भारत-अमेरिका पर निशाना
श्रीलंकन राष्ट्रपति के मदद मांगने के बाद ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में लिखा है कि, ''भारत और पश्चिम ताकतों के कारण हुए व्यवधानों के बावजूद, चीन ने श्रीलंका के प्रति मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखा है और दोनों देशों ने वर्षों से व्यापक आर्थिक और व्यापार सहयोग किया है, विशेष रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत। निश्चित रूप से, चीन नहीं चाहता कि श्रीलंका आर्थिक संकट में डूबे और चीन जहां भी हो सके मदद करेगा। लेकिन, श्रीलंका के ऋण संकट का कारण क्या है और चीन कैसे मदद कर सकता है, इसका निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसके साथ ही चीन के विदेश मंत्री ने भारत को नसीहत देते हुए कहा है, कि चीन और श्रीलंका के संबंध में किसी भी 'थर्ड पार्टी' को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जो चीन की श्रीलंका के संबंध में आक्रामक नीति को जाहिर करता है।

श्रीलंका को लपेटने की कोशिश में ड्रैगन!
ग्लोबल टाइम्स ने श्रीलंका को कर्ज स्ट्रक्चर में रियायत देने के अनुरोध पर लिखा गया है कि, ''यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों, एशियाई विकास बैंक और जापान के बाद चीन वो चौथा देश है, जिसने चीन को सबसे ज्यादा कर्ज दिया है। लेकिन अजीब बात यह है, कि पश्चिम ने अन्य उधारदाताओं के बारे में बहुत कम बात की है और इसके बजाय चीनी परियोजनाओं के बारे में तथाकथित 'कर्ज का जाल' सिद्धांत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। उदाहरण के लिए, चीन को हंबनटोटा बंदरगाह का पट्टा लंबे समय से पश्चिमी ताकतों द्वारा चीन के "ऋण जाल" के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में चित्रित किया गया है, भले ही चीन और श्रीलंका दोनों ने कहा कि यह पूरी तरह से वाणिज्यिक है और इसका सैन्य इस्तेमाल नहीं होगा।

अपना 'मुंह पोंछने' की कोशिश करता चीन
ग्लोबल टाइम्स की तरफ से दलील देते हुए आगे लिखा गया है कि, श्रीलंका के कुल कर्ज में चीन की भूमिका के बारे में पश्चिम की ओर से लगाए गये आरोप असल में श्रीलंका जैसे विकासशील देश के प्रति उसके संकीर्ण सोच और पश्चिमी पूंजी विस्तार के शिकारी तर्क को दर्शाता है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, पश्चीमी देश में लंबे वक्त तक श्रीलंका को उपनिवेश बनाकर रखा है श्रीलंका के आत्मनिर्णय पर अंकुश लगाकर रखा और अब ऐसे देशों का मानना है कि, चीन भी ऐसा ही कर रहा है।
वास्तव में, चीन पश्चिम के देशों ने श्रीलंका के साथ जो किया है, उसके विपरीत कर रहा है। चीन के समर्थन से, श्रीलंका ने बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास का कार्यक्रम शुरू किया है, जिसका पश्चिम ने कभी समर्थन नहीं किया। यह कोई सीक्रेट बात नहीं है, कि कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर ढांचों के साथ श्रीलंका का सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं हो सकता है और चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट का उद्देश्य श्रीलंका की कनेक्टिविटी में सुधार करना है, जो देश के लिए वैश्विक व्यापार में एकीकृत करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

कर्ज स्ट्रक्चर पर चीन के बहाने
दुनिया के हर देश को कोसने के बाद चीन ने श्रीलंकन राष्ट्रपति के अनुरोध पर बहाने बनाने शुरू कर दिया और कहा कहा कि, 'कर्ज के कुछ स्तर अपरिहार्य हैं और यह कहना पूरी तरह से भ्रामक होगा, कि श्रीलंका की कर्ज वाली समस्या के लिए सिर्फ चीन जिम्मेदार है'। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, ''श्रीलंका की कर्ज वाली समस्या का समाधान तभी संभव है, जो इसकी प्रकृति को समझते हुए उचित विकल्प की तरफ आगे बढ़ा जाए''। इसके अलावा ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, मूल रूप से श्रीलंका जैसे विकासशील देशों के लिए, उनकी ऋण समस्याएं वास्तव में उनके विकास की बाधाओं का प्रतिबिंब हैं जो उन्हें उधार के पैसे को प्रभावी उत्पादन और विदेशी मुद्रा आय में लगाने से रोकती हैं।''

श्रीलंकन राष्ट्रपति का अनुरोध ठुकराया
इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स मे साफ तौर पर चीन की तरफ से कहा गया है कि, ''यदि चीन को श्रीलंका की मदद करनी है, तो श्रीलंका की अंतर्निहित आर्थिक चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य को समझते हुए उसका समाधान करना आवश्यक होगा, अन्यथा ऋण में कमी या राहत मूल कारण का समाधान नहीं करेगी। इसलिए, चीन के साथ ऋण के मुद्दों के समन्वय के अलावा, श्रीलंका को अपने आर्थिक विकास को मजबूत करने के लिए चीन से मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है।'' यानि, चीन ने साफ कर दिया है, कि वो श्रीलंका को किसी भी तरह की राहत तो हरगिज नहीं देगा, बल्कि वो श्रीलंका की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप जरूर करेगा।












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