चीनी वैज्ञानिकों ने बनाया दुनिया का पहला सुपर जज, सुनाएगा 97% सही फैसले, जानिए कैसे करेगा काम?
चीन ने विश्व का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस जज तैयार किया है, जिसमें 97 फीसदी सही फैसले सुनाने की क्षमता है।
बीजिंग, दिसंबर 28: टेक्नोलॉजी की दुनिया में चीन लगातार तरक्की कर रहा है और चीन ऐसे ऐसे टेक्नोलॉजी का इजाद कर रहा है, जिसे देखकर और जिसके बारे में सुनकर दुनिया हैरान रह जाती है। अब चीन के वैज्ञानिकों मे सुपरजज बनाने का दावा किया है, और इस जज की खासियत ये होगी, कि ये गलत फैसले नहीं सुनाएगा। यानि, चीन का ये सुपर जज, जो भी फैसले सुनाएगा, वो सही होगा।

चीन के वैज्ञानिकों ने किया दावा
अब चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने एक ऐसी मशीन विकसित की है, जो आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी का उपयोग कर फैसला सुना सकती है। इस मशीन को लेकर चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि, ये मशीन अपने तरह की दुनिया की पहली मशीन है, जो ना सिर्फ अपराध करने वालों की शिनाख्त कर सकती है, बल्कि ये मशीन सही फैसला सुनाएगी। यानि, इस मशीन के जरिए अब आसानी से फैसला किया जा सकता है कि, कि अपराधी कौन है, सच कौन बोल रहा है और झूठा कौन है?

97% सही फैसले होने का दावा
चीन के वैज्ञानिकों ने आगे दावा किया कि है कि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई तकनीक से जिस जज को बनाया गया है, वो जज 97 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ फैसले सुना सकता है। चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए जिस मशीन का निर्माण किया गया है, वो बहस के आधार पर फैसला सुनाएगा। यानि, कोर्ट रूम में बहस के दौरान ये मशीन इस बात का फैसला कर लेगी, कि कौन सही है और कौन झूठ बोल रहा है। साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जज को शंघाई पुडोंह पीपुल्स प्रोक्यूरेटोरेट ने बनाया है और इस मशीन का परीक्षण भी किया जा चुका है।

जजों से बोझ होगा कम
चीनी वैज्ञानिकों ने कहा है कि, इस मशीन के निर्माण के बाद इसकी मदद से अब जजों के ऊपर काम का बोझ काफी कम किया जा सकेगा। इस प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ने स्थानीय मीडिया को बताया कि, जजों के ऊपर वर्तमान में काफी ज्यादा बोझ है और अब इस मशीन की मदद से जजों के ऊपर से बोझ काफी कम हो जाएगा और इसी इरादे के साथ इस मशीन का निर्माण किया गया है।

इंसानों के गुनाह की करेगा पहचान
प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर शी योंग के हवाले से चीनी मीडिया ने कहा है कि, "यह प्रणाली कुछ हद तक निर्णय लेने की प्रक्रिया जजों की जगह ले सकती है।" इसके साथ ही दावा किया गया है कि, यह चीन राज्य के खिलाफ "असहमति" रखने वालों की पहचान भी कर सकता है। रिसर्चर्स ने दावा करते हुए आगे कहा कि, ये मशीन कंप्यूटर प्रोग्राम के तहत काम करेगी और एक कंप्यूटर डेस्कटॉप की तरह ही इस मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही ये मशीनी जज अपने सिस्टम में दर्ज एक अरब से ज्यादा आंकड़ों का विश्लेषण करने के आधार पर फैसला सुनाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा कि, इस मशीन का निर्माण करते वक्त दुनियाभर में साल 2015 से 2020 के बीच आए लाखों मामलों का इस्तेमाल करते हुए बनाया गया है और इस मशीन में 17 हजार मुकदमों का फीड किया गया है।

ट्रेनिंग के दौरान दिलचस्प नतीजे
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, ट्रेनिंग के दौरान एआई मशीन को दिए गए मामलों में क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, जुआ से जुड़े मामले, खतरनाक ड्राइविंग, चोरी और कुछ अन्य आधिकारिक मामलों को पहचानने की क्षमता रखता है। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने कहा है कि, आगे जाकर मशीन को और भी ज्यादा अपडेट किया जा रहा है और फिर कुछ समय बाद ये मशीन फैसला लेने की प्रक्रिया के दौरान जज की तरफ फैसला भी सुनाने में सक्षम हो जाएगी।

मशीन को लेकर चिंता भी हैं
एक तरफ वैज्ञानिकों का कहना है कि, कुछ अपडेट्स के बाद ये मशीन फैसला सुनाने में पूरी तरह से सक्षम हो जाएगी, लेकिन चीन के कुछ जजों ने इस मशीन को लेकर अपनी आपत्ति जताई है। कुछ जजों ने कहा है कि, इंसानों के जीवन का फैसला मशीन के हाथों में देना सही नहीं है और इसमें गलती होने पर किसकी जिम्मेदारी होगी, ये भी तय नहीं है। चीन के कई जजों ने इस मशीन के इस्तेमाल को लेकर ऐतराज जताया है और कहा है कि, मशीनों को इंसानों के काम में हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि, मशीन 'किसी' के निर्देश पर भी काम कर सकती है और फैसलों की निष्पक्षता भी संदिग्ध हो सकती है।
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मशीन को 'जज' बनाना कितना सही?
इसमें कोई शक नहीं कि, गुनाह से लेकर गुनाहगारों तक की पहचान में टेक्वोलॉजी काफी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और कानून एजेंसियों को टेक्नोलॉजी की मदद से सच साबित करने में काफी ज्यादा मदद मिलती है, लेकिन अभी तक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सबूतों की तस्दीक से लेकर फॉरेंसिक जांच तक ही सीमित है, ऐसे में क्या एक मशीन के हाथ में इंसानों के जीवन का फैसला करने का अधिकार देना चाहिए? भारत जैसे देश में, जहां इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर भी सवाल उठाए जाते हैं, क्या वहां ऐसे मशीनों से अगर फैसले होने लगे, तो क्या न्यायिक व्यवस्था सवालों के घेरे में नहीं आ जाएगी?












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