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US Sanctions on Chabahar: चाबहार पोर्ट पर अमेरिका की सख्ती! भारत के लिए खतरे की घंटी या मौका? आगे बड़ी चुनौती

US Sanctions on Chabahar: ईरान पर बढ़ते अमेरिकी दबाव के बीच भारत के लिए चाबहार पोर्ट एक बार फिर कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती बन गया है। यह पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, व्यापार और भू-राजनीतिक हितों के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ सख्त रुख और संभावित प्रतिबंधों ने चाबहार के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत के लिए चाबहार पोर्ट कितना जरूरी है और अमेरिकी बैन के बीच भारत के पास क्या विकल्प मौजूद हैं?

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Chabahar Port पर लटक रही अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार

सूत्रों के मुताबिक, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत चाबहार पोर्ट में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। ट्रंप प्रशासन द्वारा पिछले साल चाबहार पोर्ट को लेकर दी गई छह महीने की सशर्त छूट अप्रैल 2026 तक वैध है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 28 अक्टूबर 2025 को इस संबंध में एक पत्र जारी किया था, जिसमें प्रतिबंधों से आंशिक राहत का जिक्र है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में है। उन्होंने स्पष्ट किया, भारत चाबहार पोर्ट को लेकर अमेरिका के साथ बातचीत में बना हुआ है और इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के विकल्पों पर काम कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि फिलहाल कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।

India Strategic Chabahar Port: क्या है भारत की रणनीति?

कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि भारत का मुख्य फोकस यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का सीधा असर न पड़े। इसी रणनीति के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के बोर्ड में शामिल सभी भारतीय सरकारी अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है। यह कंपनी 2018 से ईरान के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन कर रही थी। इसके अलावा, भारत एक ऐसे नए ऑपरेशनल मॉडल पर भी विचार कर रहा है, जिसके तहत एक अलग इकाई बनाई जा सकती है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में न आए या उन्हें झेलने में सक्षम हो।

Chabahar Port Inidia Investment: चाबहार परियोजना में भारत का निवेश जारी

सूत्रों के अनुसार, भारत ने मई 2024 में ईरान के साथ हुए 10 साल के दीर्घकालिक समझौते के तहत चाबहार पोर्ट के विकास के लिए 120 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता पूरी कर दी है। इस राशि का उपयोग शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल में आधुनिक उपकरण लगाने के लिए किया जाना है, जिनमें मोबाइल हार्बर क्रेन, रेल-माउंटेड क्वे क्रेन, फोर्कलिफ्ट और न्यूमैटिक अनलोडर शामिल हैं।

भारत ने इस परियोजना में अब तक करीब 1000 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इसके अलावा, पोर्ट की ढांचागत सुविधाओं के लिए 25 करोड़ डॉलर की क्रेडिट विंडो भी दी गई है, जिसमें से अधिकांश राशि जारी की जा चुकी है।

क्यों भारत के लिए अहम है चाबहार पोर्ट?

चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है और भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच का अहम हिस्सा है। इस पोर्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक सीधी पहुंच देता है।

यह पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का भी हिस्सा है, जो करीब 7,200 किलोमीटर लंबा नेटवर्क है और भारत को यूरेशिया और यूरोप से जोड़ता है। इसके जरिए माल ढुलाई का समय और लागत दोनों कम होती हैं।

रणनीतिक नजरिए से भी चाबहार बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके पास ही पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित ग्वादर पोर्ट स्थित है। ऐसे में चाबहार भारत के लिए क्षेत्रीय संतुलन और चीन-पाकिस्तान धुरी को जवाब देने का माध्यम भी है।

चाबहार पोर्ट में भारत की मौजूदगी बनाए रखना इसलिए भी जरूरी है ताकि ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी बनी रहे। ईरान ने कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कई बहुपक्षीय मंचों पर भारत का समर्थन किया है। ऐसे में चाबहार से भारत का हटना द्विपक्षीय संबंधों को कमजोर कर सकता है।

अमेरिकी टैरिफ की धमकी और उसका असर

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी है। हालांकि, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इसका असर सीमित हो सकता है क्योंकि वर्ष 2024-25 में भारत-ईरान व्यापार केवल 1.68 अरब डॉलर रहा, जो भारत के कुल व्यापार का लगभग 0.15% है। इसके बावजूद अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि 25% टैरिफ को लेकर अभी तक कोई औपचारिक अधिसूचना या कार्यकारी आदेश जारी नहीं हुआ है। भारत पहले से ही रूसी तेल खरीद को लेकर 50% अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहा है।

भारत के लिए आगे की राह कितनी कठिन?

कूटनीतिक सूत्र मानते हैं कि मौजूदा हालात में चाबहार पोर्ट को लेकर भारत के सामने रास्ता आसान नहीं है। विशेषज्ञों की मानें तो हमारे पास अभी कुछ महीने हैं और इस दौरान अमेरिका के साथ बातचीत जारी है। कोशिश यही है कि कोई ऐसा समाधान निकले जिससे भारत की रणनीतिक मौजूदगी भी बनी रहे और प्रतिबंधों का जोखिम भी न हो।

चाबहार पोर्ट भारत की विदेश नीति, व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का अहम स्तंभ बना हुआ है। अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों के बावजूद भारत इसे छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि भारत किस विकल्प को चुनता है और चाबहार पोर्ट पर उसकी मौजूदगी किस रूप में आगे बढ़ती है।

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