Gurkha Recruitment: भारत के लिए नहीं अब अंग्रेजों के लिए लड़ेंगे गोरखा के जवान? ब्रिटेन ने चल दी बड़ी चाल
British Army Gurkha Recruitment: भारतीय सेना और नेपाली गोरखाओं का रिश्ता दशकों पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां भारत में 'अग्निपथ योजना' को लेकर उपजे विवाद के कारण गोरखाओं की भर्ती रुकी हुई है, वहीं ब्रिटेन ने इस मौके को लपक लिया है।
ब्रिटेन ने न केवल अपनी सेना में गोरखाओं की संख्या बढ़ाने का फैसला किया है, बल्कि 'किंग्स गोरखा आर्टिलरी' (KGA) नाम से एक नई रेजिमेंट भी बना दी है। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या भारत अपनी इस पारंपरिक सैन्य शक्ति को खो रहा है?

किंग्स गोरखा आर्टिलरी की शुरुआत
ब्रिटिश सम्राट किंग चार्ल्स III के नाम पर बनी यह नई रेजिमेंट 'किंग्स गोरखा आर्टिलरी' गोरखाओं की वीरता को एक नया मंच दे रही है। हाल ही में इसके पहले बैच के सैनिकों की शपथ ग्रहण प्रक्रिया इंग्लैंड के लार्कहिल कैंप में पूरी हुई। ब्रिटेन का लक्ष्य अगले चार सालों में इसमें 400 सैनिकों को शामिल करना है। यह यूनिट ब्रिटिश सेना को युद्ध के मैदान में नजदीकी आर्टिलरी सपोर्ट (तोपखाना सहायता) प्रदान करेगी, जिससे ब्रिटिश सेना की मारक क्षमता में काफी इजाफा होगा।
भारतीय सेना में भर्ती पर लगा ब्रेक
भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती का रास्ता साल 2022 से बंद पड़ा है। इसका मुख्य कारण भारत सरकार की 'अग्निपथ योजना' है। नेपाल सरकार का मानना है कि केवल 4 साल की सेवा और उसके बाद बिना पेंशन के घर वापसी, 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की शर्तों के खिलाफ है। इस असहमति के कारण पिछले चार सालों से भारतीय सेना में एक भी नेपाली गोरखा भर्ती नहीं हो सका है, जबकि हजारों पुराने सैनिक रिटायर हो चुके हैं।
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ब्रिटेन की चाक-चौबंद भर्ती प्रक्रिया
ब्रिटेन अपनी 'ब्रिगेड ऑफ गोरखास' के लिए नेपाल के पोखरा और धरान में बेहद सख्त और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाता है। हर साल हजारों युवाओं में से केवल 200 के करीब बेहतरीन सैनिक चुने जाते हैं। फिजिकल टेस्ट से लेकर मेडिकल चेकअप तक, हर चरण काफी कठिन होता है। चयन के बाद इन जवानों को ट्रेनिंग के लिए ब्रिटेन के कैटरिक भेजा जाता है। वहां 36 हफ्तों की कड़ी ट्रेनिंग के बाद वे पूरी दुनिया में तैनात किए जाते हैं।
गोरखाओं का गौरवशाली सैन्य इतिहास
गोरखाओं और आधुनिक सेनाओं का साथ साल 1815 से है, जब अंग्रेजों ने उनकी बहादुरी को देख उन्हें सेना में शामिल किया था। दोनों विश्व युद्धों में 2 लाख से ज्यादा गोरखा सैनिकों ने अपनी जान की बाजी लगाई थी। आजादी के बाद हुए समझौते के तहत गोरखाओं की कुछ रेजिमेंट भारत को मिलीं और कुछ ब्रिटेन को। तब से लेकर आज तक गोरखा सैनिक अपनी "जय महाकाली, आयो गोरखाली" की हुंकार से दुश्मनों के छक्के छुड़ाते आए हैं।
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क्या भारत खो देगा अपनी 'गोरखा शक्ति'?
नेपाली गोरखाओं का झुकाव अब धीरे-धीरे ब्रिटेन की ओर बढ़ रहा है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना की रीढ़ मानी जाती रही है। हालांकि भारत अब भारतीय मूल के गोरखाओं (जो भारत में ही रहते हैं) की भर्ती बढ़ाकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन नेपाल के पारंपरिक लड़ाकों का ब्रिटिश सेना में जाना भविष्य में रणनीतिक संतुलन को बदल सकता है।












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