ब्लॉग- 'हर बार चैं पैं चैं पैं होती है और लोकतंत्र ढर्रे पर लौट आता है'

नवाज़ शरीफ़
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नवाज़ शरीफ़

जिसे आप भारत में राज्यसभा कहते हैं उसे हम पाकिस्तान में सीनेट कहते हैं.

सीनेट के 104 सदस्य छह साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं. हर तीन साल बाद छह साल पूरे करने वाले सीनेट के आधे सदस्यों की जगह नए सदस्य आ जाते हैं.

सीनेट के सदस्य को राष्ट्रीय संसद और चारों प्रदेशों यानी पंजाब, सिंध, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और बलूचिस्तान की विधानसभाएं चुनती हैं. राष्ट्रीय संसद में तो हर प्रदेश की सीटें आबादी के हिसाब से कम ज़्यादा होती हैं मगर सीनेट में हर प्रदेश की बराबर सीटें होती हैं.

यानी सीनेट पाकिस्तानी संघ का वो तराज़ू है जिसके पलड़े बराबर के हैं. सीनेट का काम ये है कि वो कोई ऐसा क़ानून न बनने दे जो किसी ख़ास गुट या प्रांत के हित में हो इसलिए ही राष्ट्रीय संसद में पारित होने वाले किसी भी क़ानून को सीनेट से मंज़ूरी अनिवार्य है.

चुनांचे सीनेट में बुद्धिजीवी लोगों को होना चाहिए. मगर पिछले कई सालों से राजनीतिक लोगों ने सीनेट को ऐसी सभा बना दिया है जिसमें भेजने के लिए क़ाबिलियत कम, जी हुज़ूरी, भाई भतीजावाद, पैसा, सिफ़ारिश और ताक़त को ज़्यादा देखा जाता है.

कृष्णा कोहली
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कृष्णा कोहली

चुनाव आते ही खुल जाती है मंडी

जैसे ही सीनेट चुनाव क़रीब आते हैं मंडी खुल जाती है, बोली लगनी शुरू हो जाती है, ताक़त कम है तो दूसरी पार्टी के सदस्यों को ख़रीदने की कोशिश होती है.

एस्टेबलिशमेंट किसी ख़ास गुट को ऊंचा या नीचा दिखाना चाहती हो तो भी प्रदेश विधानसभाओं के सदस्यों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश से नहीं चूकती.

और फिर ऐसे ऐसे चमत्कार होते हैं जैसे बलूचिस्तान में कहने को नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम लीग (एन) सबसे बड़ी पार्टी है मगर सीनेट इलेक्शन से पहले उसमें बग़ावत हो गई और सारे सीनेट सदस्य बाग़ियों के धड़े से चुन लिए गए.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पीपुल्ज़ पार्टी की छह सीटें है मगर उसने इमरान ख़ान की पार्टी के बीस से अधिक सदस्यों को नोट दिखाकर अपने हित में वोट डलवा लिए और दो सीनेट सीटें ले उड़ी. इमरान ख़ान मुंह देखते रह गए.

पाकिस्तानी नेता
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पाकिस्तानी नेता

'चैं पैं चैं पैं'

इमरान ख़ान की पार्टी के ही एक सदस्य ने पंजाब विधानसभा में नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के चौदह सदस्यों से वोट पकड़ लिए, हालांकि नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान कट्टर विरोधी हैं.

सिंध प्रांत में भी यही हुआ और जिसका ज़ोर और पैसा चला, उसने सीटें उचक लीं. अब जो इस रास्ते से सीनेट में आएगा वो पहले अपना मालपानी खर्चा पूरा करेगा या देश या अपने प्रांत की बेहतरी के बारे में सोचेगा.

ये लोकतंत्र है कि मायातंत्र. हर बार चैं पैं चैं पैं होती है और फिर जीवन अपने टेढ़े ढर्रे पर उस वक़्त तक चलता रहता है जब तक अगली चुनाव मंडी नहीं लग जाती.

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