Bangladesh violence: सिर्फ यूनुस नहीं, इन 5 चेहरों ने बांग्लादेश को बनाया बारूद का ढेर, भारत के खिलाफ भरा जहर

Bangladesh violence: बांग्लादेश में अगस्त 2024 के सत्ता परिवर्तन के बाद से राजनीतिक स्थिरता के बजाय कट्टरपंथ और हिंसा का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार इन चरमपंथी ताकतों को नियंत्रित करने में विफल नजर आ रही है, जिससे अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं (Bangladesh Hindu Minority Attacks 2025) पर हमले तेज हुए हैं। साथ ही स्थानीय लोगों में भारत के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें और हालिया हिंसक घटनाएं संकेत देती हैं कि फरवरी 2026 के चुनावों से पहले देश में अस्थिरता पैदा करने की सोची-समझी साजिश रची जा रही है। वर्तमान संकट के पीछे पांच प्रमुख कट्टरपंथी समूह और चेहरे जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

Bangladesh violence

जमात-ए-इस्लामी का पुनरुत्थान

शेख हसीना सरकार द्वारा प्रतिबंधित इस संगठन को यूनुस सरकार ने आते ही वैधानिकता दे दी। जमात-ए-इस्लामी पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से गहरे संबंध होने के आरोप हैं। यह समूह न केवल चुनाव सुधारों के नाम पर दबाव बना रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों पर हमलों और भारत विरोधी प्रदर्शनों का मुख्य चेहरा बनकर उभरा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि शरीफ उस्मान हादी की हत्या जैसे घटनाक्रमों का राजनीतिक लाभ उठाकर यह अपनी जड़ें और मजबूत कर रहा है।

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हिफाजत-ए-इस्लाम और शरिया की मांग

विशाल मदरसा नेटवर्क वाला यह समूह बांग्लादेश में सख्त शरिया कानून लागू करवाना चाहता है। महिलाओं के अधिकारों और धर्मनिरपेक्ष नीतियों का मुखर विरोधी यह संगठन पूर्व में प्रतिबंधित था, लेकिन अब इसके नेताओं की सरकार तक सीधी पहुंच है। इसके नेता मामुनुल हक लगातार यूनुस प्रशासन पर इस्लामी कायदे थोपने का दबाव बना रहे हैं। संपत्ति में महिलाओं के बराबरी के अधिकार जैसे आधुनिक सुधारों के खिलाफ इनका उग्र प्रदर्शन देश के सामाजिक ढांचे को कमजोर कर रहा है।

हिज्ब-उत-तहरीर का विस्तार

खलीफा शासन की वकालत करने वाले इस वैश्विक संगठन को 2009 में बैन किया गया था, जिसे वर्तमान सरकार ने फिर से सक्रिय होने का मौका दे दिया। यह समूह अब सोशल मीडिया और यूनिवर्सिटीज के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बना रहा है। ढाका की सड़कों पर ISIS जैसे झंडे लहराना और सार्वजनिक रूप से शरिया की मांग करना इसकी बढ़ती ताकत का प्रमाण है। सरकार की ढुलमुल नीति के कारण यह संगठन अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

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इंकलाब मंच की उग्रता

जुलाई 2024 के आंदोलन की उपज यह समूह शुरुआत में सरकार का समर्थक था, लेकिन अब यह यूनुस प्रशासन के लिए ही सिरदर्द बन गया है। इसके नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद इस मंच ने देशव्यापी हिंसा भड़काई और अखबारों के दफ्तर तक फूंक दिए। भारत विरोधी विचारधारा और कट्टर इस्लामिक संस्कृति को बढ़ावा देने वाला यह संगठन अब सरकार गिराने की धमकियां दे रहा है, जिससे बांग्लादेश में गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है।

खूंखार आतंकियों की रिहाई

यूनुस सरकार के कार्यकाल में अल-कायदा से जुड़े अंसारुल्लाह बंग्ला टीम (ABT) के प्रमुख मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी और कट्टरपंथी मामुनुल हक की रिहाई ने आग में घी का काम किया है। रहमानी की रिहाई से न केवल बांग्लादेश बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि यह संगठन स्लीपर सेल्स के जरिए जिहादी नेटवर्क फैला रहा है। इन अपराधियों की मौजूदगी ने कट्टरपंथी समूहों का मनोबल बढ़ाया है, जिससे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को खाद-पानी मिल रहा है।

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