Pakistan bomb blast: बलूचिस्तान बना जिन्ना के देश का नासूर, क्या पाकिस्तान फिर टूटने वाला है?

Pakistan bomb blast: पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत के मस्तुंग जिले में शुक्रवार को एक आत्मघाती हमले में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई और 70 से ज्यादा लोग घायल हो गए हैं।

हालांकि, किसी ने फौरन इस बमबारी की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) ने फिलहाल इस बम ब्लास्ट से दूरी बना ली है। मस्तुंग जिले में पिछले 5 सालों में ये दूसरा भीषण आत्मघाती हमला है। इससे पहले 2018 में भी घातक आत्मघाती बम धमाका हुआ था, जिसमें 149 लोग मारे गये थे।

Pakistan bomb blast

पाकिस्तान के कार्यवाहक आंतरिक मंत्री सरफराज बुगती ने बम विस्फोटों की निंदा की और उन्हें "जघन्य कृत्य" बताया। वहीं, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी और कार्यवाहक प्रधान मंत्री अनवारुल-हक-काकर ने भी अलग-अलग ट्वीट्स में एकता का आह्वान किया है, और लोगों से पैगंबर की शिक्षाओं का पालन करने के लिए कहा है।

बलूचिस्तान, जितना खूबसूरत उतना की खूंखार

बलूचिस्तान, पाकिस्तान के कब्जे वाला सबसे बड़ा प्रांत है, जिसपर पाकिस्तान ने 1948 में ही कब्जा कर लिया था। हालांकि, सबसे बड़ा प्रांत होने के बाद भी, ये पाकिस्तान के बाकी हिस्सों की तुलना में कम आबादी वाला और गरीब प्रांत है।

हालांकि, इसकी प्राकृतिक स्थिति और यहां की जमीन में मौजूद प्रचूर प्राकृतिक संसाधन, इसे पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। यह प्रांत 1948 से खूनी विद्रोहों, क्रूर पाकिस्तानी दमन और एक स्थायी बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन की एक श्रृंखला का स्थल रहा है।

बलूचिस्तान पर जबरन पाकिस्तान का कब्जा

भारत की स्वतंत्रता के समय, इस क्षेत्र में मकरान, लास बेला, खारन और कलात शामिल थे, जिनके आदिवासी प्रमुखों ने अंग्रेजों के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी। कलात का मुखिया सबसे शक्तिशाली मुखिया था, बाकी लोग उसके प्रति सामंती निष्ठा रखते थे।

जैसे ही उपमहाद्वीप से अंग्रेजों की विदाई करीब आई, कलात के अंतिम प्रमुख अहमद यार खान ने खुले तौर पर बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश बताना शुरू कर दिया। उन्हें उम्मीद थी, कि मुहम्मद अली जिन्ना के साथ उनकी व्यक्तिगत दोस्ती, उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय अपना राज्य सुरक्षित करने में मदद करेगी और 11 अगस्त 1947 को, उन्हें पहली सफलता मिलने की उम्मीद दिखी, जब जब पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को अपने देश में शामिल होने के लिए मजबूर करने के बजाय, उनके साथ मित्रता की संधि पर हस्ताक्षर किए।

हालांकि, ब्रिटिश, इस क्षेत्र में रूसी विस्तारवाद से सावधान थे और इस संधि के सख्त खिलाफ थे और अंग्रेज चाहते थे, कि बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय हो जाए। लेकिन, इससे भी अधिक जटिल मामला यह था, कि कलात के तीन सामंत पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे।

और फिर अक्टूबर 1947 आते आते पाकिस्तान के सुर बदल गये और उसने बलूचिस्तान के ऊपर विलय के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया।

आख़िरकार, हालात तब बिगड़ गए जब 17 मार्च 1948 को पाकिस्तान सरकार ने कलात के तीन सामंती राज्यों के विलय को स्वीकार करने का फैसला किया, जिससे कलात चारों ओर से ज़मीन से घिरा रह गया और उसके पास आधे से भी कम भूभाग रह गया।

इसके अलावा, ऑल इंडिया रेडियो पर अफवाह फैल गई, कि अहमद यार खान वास्तव में भारत में शामिल होना चाहते हैं। लिहाजा, पाकिस्तान अब जल्द से जल्द बलूचिस्तान को हड़पने की दिशा में आगे बढ़ गया और फिर बलूचिस्तान पर जबरन पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया। 27 मार्च अहमद यार खान से जबरन, बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय के दस्तावेजों पर बंदूक के बल पर साइन करवा लिया गया।

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बलूचिस्तान में हिंसा की शुरूआत

विलय संधि की स्याही अभी पूरी तरह सूखी भी नहीं थी, कि बलूचिस्तान में विरोध शुरू हो गया। उस वर्ष जुलाई में, अहमद यार खान के भाई, प्रिंस अब्दुल करीम ने विलय समझौते के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जिससे पांच बलूच "स्वतंत्रता के युद्ध" की शुरुआत हुई।

इसके बाद बलूचिस्तान ने पाकिस्तान के साथ पांच बार स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ा, जो 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-1977 में लड़े गए और वर्तमान युद्ध 2003 से जारी हैं।

लेकिन, पाकिस्तान ने इन स्वतंत्रता सेनानियों को क्रूरता से कुचलना शुरू कर दिया। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को पाकिस्तान की सेना ने बिना किसी सबूत या मुकदमे के फांसी दे दी। पाकिस्तानी फौज ने हजारों बलूच महिलाओं से बलात्कार किए।

2011 की एमनेस्टी इंटरनेशनल रिपोर्ट में पाकिस्तानी सैनिकों की 'मार डालो और फेंक दो' की रणनीतियों के बारे में बात की गई थी, जिसमें सेना पर, अक्सर वर्दी में, बलूच कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, पत्रकारों और वकीलों को उठाने, उन्हें प्रताड़ित करते हैं, फिर उन्हें गोली मार देने का खुलासा किया गया। रिपोर्ट में कहा गया, कि गोली मारने के बाद शवों को फेंक दिया जाता है।

हालांकि, कितने बलूच मारे गये, इसकी सटीक संख्या बताना मुश्किल है, लेकिन अलग अलग रिपोर्ट्स में मरने वालों की संख्या हजारों में बताई गई है। एनजीओ वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स के मुताबिक, 2001 से 2017 के बीच लगभग 5,228 बलूच लोग लापता हो गए हैं।

हाल के वर्षों में, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे बलूच राष्ट्रवादी संगठन टीटीपी और इस्लामिक स्टेट सहित इस्लामी संगठनों के करीब बढ़ गए हैं।

इस्लामाबाद स्थित गैर सरकारी संगठन, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज की 'पाकिस्तान सुरक्षा रिपोर्ट 2022' के अनुसार, अकेले 2022 में विद्रोहियों और उनके इस्लामी सहयोगियों ने बलूचिस्तान के अंदर और बाहर 71 बड़े हमले किए हैं, जिनमें मुख्य रूप से सुरक्षा और सैन्य कर्मियों को निशाना बनाया गया है।

बलूच विद्रोहियों ने अब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और अन्य आतंकी संगठनों के साथ मिलकर बलूचिस्तान के साथ साथ खैबर-पख्तूनख्वा में भी हमले करने शुरू कर दिए हैं।

बलूचों के आंदोलन से टूट सकता है पाकिस्तान?

तो, यह संघर्ष इतने लंबे समय तक क्यों बना रहा? इसकी सबसे बड़ी वजह बलूचिस्तान के लोगों का साझा इतिहास, भाषा और अन्य सांस्कृतिक समानताएं, पंजाबियों और सिंधियों से बहुत अलग हैं।

पाकिस्तान का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ था। लेकिन, मुस्लिमों के अलग अलग जातियों के बीच फौरन संघर्ष शुरू हो गये। पंजाबी जमींदारों की पाकिस्तान की नौकरशाही पर लगभग निर्विवाद पकड़ थी। जातीय मतभेद 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के टूटने का कारण थे और बलूच राष्ट्रवाद के पीछे प्रेरक शक्ति भी हैं।

बलूच लोगों की गहरी आर्थिक और राजनीतिक शिकायतें, जातीय मतभेदों को उग्र कर रही हैं। सबसे हालिया संघर्ष वास्तव में लगभग पूरी तरह से आर्थिक अलगाव की भावना से प्रेरित था। बलूच राष्ट्रवादियों का तर्क है, कि बलूच लोग स्वयं बलूचिस्तान के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का लाभ नहीं उठाते हैं, बल्कि उन्हें दबाकर पाकिस्तानी सरकार उसका फायदा, पंजाबियों को पहुंचाती है।

इसके अलावा, चीन समर्थित ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कुछ मायनों में बलूच आबादी के सामने आने वाले आर्थिक अन्याय का प्रतीक है। शिक्षित बलूच आबादी के बीच बेरोजगारी के अत्यधिक उच्च स्तर के बावजूद, इस परियोजना के लिए पंजाबी और सिंधी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को सामूहिक रूप से काम पर रखा गया है।

हाल के वर्षों में, बलूच उग्रवादियों ने परियोजना में शामिल चीनी अधिकारियों को नियमित रूप से निशाना बनाया है।

लेकिन, पाकिस्तानी सरकार ने भारत और ईरान समेत विदेशी तत्वों पर क्षेत्र में समस्या पैदा करने का आरोप लगाया है। 2016 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में पाकिस्तान के अत्याचारों और बलूच लोगों के दमन का उल्लेख किया तो पाकिस्तान में हंगामा मच गया था। लेकिन, हकीकत ये है, कि बलूचों का आंदोलन पाकिस्तान के लिए नासूर बन चुका है।

बलूचों के हमले को रोकने में नाकामी के पीछे की सबसे बड़ी वजह, पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी का कट्टरपंथी होना है, जिनमें आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान की मजबूत पकड़ का होना है। लिहाजा, बम धमाके को काफी आसानी से अंजाम दिया जाता है।

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