Bilawal Bhutto: क्या भारत और पाकिस्तान के संबंध हमेशा के लिए हुए बर्बाद? बिलावल के दौरे से क्या बदलेगा

भारत और पाकिस्तान के अलावा, एससीओ के अन्य सदस्य देश चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं। इन आठ सदस्य देशों में वैश्विक जनसंख्या का लगभग 42 प्रतिशत और वैश्विक जीडीपी का 25 प्रतिशत है।

Bilawal Bhutto India Visit

Bilawal Bhutto India Visit: पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो आज शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत के गोवा पहुंच रहे हैं। हालांकि, द्विपक्षीय बैठक की बात से भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देश इनकार कर चुके हैं।

लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या भारत और पाकिस्तान के संबंध हमेशा के लिए बर्बाद हो चुके हैं? क्या ऐसी कोई गुंजाइश अभी भी बची है, कि दोनों पड़ोसी देशों में दोस्ताना ना सही, शांतिपूर्ण रिश्ता कायम हो सके?

इस सवाल के गहराई में जाने पर पता चलता है, कि भारत-पाकिस्तान, अपने संबंधों को लेकर खुद को एक अजीब जगह पर पाते हैं। संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं, नेतृत्व अलग हो गया है, और लोग अलग-थलग हैं। अशुभ शांति की स्थिति बनी रहती है, लेकिन पाकिस्तान की विदेश नीति में जिस तरह से सेना हावी रही है और सेना ने जिस तरह से अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए राजनीति की है, वो पाकिस्तान के राजनेताओं के लिए भारत से वार्ता करने के लिए प्लेटफॉर्म बनने नहीं देता है।

भारत-पाकिस्तान में होगी शांति?

कहते हैं, कि दुश्मनी कभी भी शुरू हो सकती है, लेकिन दोस्ती के लिए आपसी सहमति की जरूरत होती है। ऐसा कुछ, जिसकी भारत और पाकिस्तान दोनों में पिछले कई दशकों से लगातार कमी रही है। इस तरह की सहमति के लिए आखिरी और सबसे लंबी बातचीत उस वक्त हुई थी, जब भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ थे।

भारत के राजदूत सतीश लांबा ने अपने संस्मरण, इन परस्यूट ऑफ पीस: इंडिया-पाकिस्तान रिलेशंस अंडर सिक्स प्राइम मिनिस्टर्स (2023) में लिखा है, ये शांति की ये खोज अधूरी रह गई। प्रधानमंत्री मोदी ने भी दो बार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। एक बार उन्होंने नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था और दूसरी बार खुद पाकिस्तान गये थे, लेकिन बदले में पाकिस्तान की तरफ से उरी और पुलवामा जैसे आतंकी हमलों के जख्म दिए गये।

संबंधों पर अतीत का काला साया

भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर अतीत का काला साया उसके निर्माण के साथ ही पड़ गया था और पाकिस्तान ने अपने निर्माण के बाद से ही जिस तरह से भारत को तोड़ने, अशांति फैलाने और भारत को लेकर एक तरह का जहरीला रवैया रखा, उसने इस संबंध को कभी भी बनने ही नहीं दिया। नतीजा ये निकला, कि दोनों देशों के बीच चार जंग हो चुकी है।

पाकिस्तान की स्कूल की किताबों में भारत और हिन्दुओं से नफरत करना सिखाया जाता है, लिहाजा जो पौध बनकर तैयार होती है, उसमें अजीब किस्म की भारत घृणा भरी होती है।

ऐसा नहीं है, कि पाकिस्तान के नेताओं ने भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने की कोशिश नहीं की, लेकिन पाकिस्तान की बदमाश सेना और उसके खुफिया संगठन ISI ने हमेशा से इसे खराब किया है। लिहाजा, भारत की हर सरकार ने पाकिस्तान को लेकर धोखा खाया है। मोदी सरकार ने भी। लिहाजा, अब मोदी सरकार ने तय कर रखा है, कि अब पाकिस्तान से अपनी शर्तों पर ही बात होगी, नहीं तो नहीं होगी।

मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति क्या है?

पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ही नरेन्द्र मोदी के एजेंडे में पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण रिश्ता कायम करना रहा है और उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को 2014 में अपने शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित कर इस बात की खुले तौर पर घोषणा की थी। बाद में पीएम मोदी ने पाकिस्तान का अचानक दौरा भी किया था और पूरी दुनिया को बताया था, कि भारत पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को सुधारना चाहता है। लेकिन, एक के बाद एक आतंकी घटनाओं ने पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार के भरोसे को तोड़ दिया।

मोदी सरकार ने चीन के साथ भी रिश्ता सुधारने की कई कोशिशें कीं। पीएम मोदी खुद चीन गये, चीन के राष्ट्रपति भारत आए, जहां उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। लेकिन, चीन से भी भारत को धोखा मिला। लिहाजा, मोदी सरकार अब चीन और पाकिस्तान को लेकर अलग जोन में चली गई है, जहां से वापसी करना बहुत हद तक असंभव है।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, मौजूदा विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने जिस तरह के शब्द पीएम मोदी के लिए इस्तेमाल किया, वो घटियापन की हर हदों को पार करने वाला था।

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    पीएम मोदी की नई नीति में अब वैश्विक ताकतों के साथ आगे बढ़ना है, जहां उनकी नीति अर्थव्यवस्था से जुड़ी है, लिहाजा मोदी की विदेश नीति की लिस्ट में पाकिस्तान 'ब्लैकलिस्ट' है। लिहाजा, बिलावल के भारत दौरे को लेकर एजेंडा सिर्फ शंघाई सहयोग संगठन तक की सीमित रहेगा और बहुत कम उम्मीद है, कि भारत, पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बैठक में शामिल होगा। ये तो नहीं कहा जा सकता है, कि दोनों देशों के बीच के रिश्ते हमेशा के लिए बर्बाद हो चुके हैं और कभी संबंध पटरी पर नहीं आएंगे, भविष्य में कुछ भी हो सकता है, लेकिन मौजूदा हालात में अब इस बात की न्यूनतम उम्मीद है, कि मोदी सरकार पाकिस्तान से रिश्ते बहाली की कोई पेशकश करेगी।

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