अंटार्कटिका ने बजाया खतरे का अलार्म, आधी दुनिया में प्रलय का खतरा, सैकड़ों शहरों के डूबने की आशंका
पिछले साल अंटार्कटिका ने 18.3 डिग्री सेल्सियस या लगभग 65 डिग्री फारेनहाइट का रिकॉर्ड-उच्च तापमान दर्ज किया था। जो आश्चर्यजनक और डराने के लिए काफी है।
वॉशिंगटन, अगस्त 17: अंटार्कटिका ने पूरी दुनिया में खतरे का गंभीर अलार्म बजा दिया। वैज्ञानिकों ने नई रिपोर्ट के आधार पर दावा किया है कि अंटार्कटिका में बर्फ की चादरें इतनी तेजी से पिघल रही हैं, जो विनाशकारी परिणाम लाने के लिए काफी हैं। वैज्ञानिकों ने रिसर्च के आधार पर कहा है कि जो नया अनुमान लगाया जाता है, वो कुछ दिनों बाद गलत हो जाते हैं और पुराने अनुमान की तुलना में काफी ज्यादा रफ्तार से अंटार्कटिका में बर्फ पिघल रहा है, जिसका नतीजा ये होगा कि पृथ्वी पर मौजूद कई शहर पूरी तरह से डूब जाएंगें और हाहाकार मच जाएगा।

तबाही की चेतावनी
अंटार्कटिका को कवर करने वाली मशहूर फोटोग्राफर ने कहा है कि किसी वैज्ञानिक को अब ये बताने की जरूरत नहीं है कि अंटार्कटिका का कितना बुरा हाल हो गया है। मशहूर फोटोग्राफर केमिली सीमैन कहती हैं कि अब यह जानने के लिए उन्हों संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है कि पृथ्वी खतरनाक गति से गर्म हो रही है। वो बताती हैं कि मैंने इसे अपनी आंखों से देखा है...महसूस किया है। फोटोग्राफर केमिली सीमैन 2004 से अंटार्कटिका का दौरा कर रही हैं और वो नेशनल ज्योग्राफिक के लिए कई अंटार्ककिट प्रोजेक्ट पर काम कर चुकी है। और बताती हैं कि उन्होंने अंटार्कटिका महाद्वीप में पिछले कुछ सालों में भारी परिवर्तन देखा है। उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में ही इतना परिवर्तन हो चुका है, जो आश्चर्यजनक है।

पूरी तरह बदला अंटार्कटिका
फोटोग्राफर केमिली सीमैन ने कई तस्वीरों के आधार पर इशारा करते हुए कहा कि बर्फ में पैदा हुए हिम सैवाल को लेकर कहा कि ये अकसर बर्फ को गुलाबी या फिर कभी कभी हरे रंग में बदल देता है, और ये काफी ज्यादा खूबसूरत दिखने लगता है। केमिली सीमैन बताती हैं कि ये असामान्य नहीं है...उन्होंने कहा कि असान्य बात ये है कि पहले ये कभी ग्लेशियरों में मार्च से पहले नहीं खिलता था लेकिन अब ये दिसंबर और जनवरी में खिलने लगे हैं, दिखने लगे हैं...यानि करीब 3 महीने पहले। आखिर ऐसा क्यों ? उन्होंने इसके लिए मौसम परिवर्तन का इशारा किया। उन्होंने कहा कि ''अंटार्कटिका में कई ऐसी जगहें हैं, जहां मैंने कभी जमीन नहीं देखी थी, हमेशा बर्फ ही बर्फ भरा रहता था, बर्फ की चट्टानें रहती थीं, लेकिन ऐसी जगहों से बर्फ गायब हो गये हैं। उन्होंने कहा कि ''आप अपनी पैर के नीचे अब जमीन, मिट्टी और कीचड़ महसूस करेंगे, जो काफी खतरनाक इशारा है इंसानों के लिए।''

अंटार्कटिका में तापमान परिवर्तन
पिछले साल अंटार्कटिका ने 18.3 डिग्री सेल्सियस या लगभग 65 डिग्री फारेनहाइट का रिकॉर्ड-उच्च तापमान दर्ज किया था। जो आश्चर्यजनक है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव पेटेरी तालास ने कहा कि, ''जलवायु परिवर्तन इसके लिए जिम्मेदार है, जिसे हम लोग महसूस कर रहे हैं''। उन्होंने नोट करते हुए कहा कि ''अंटार्कटिक प्रायद्वीप का उत्तर-पश्चिमी नोक, दक्षिण अमेरिका की तरफ आता है, जो ग्लोबल वॉर्मिंग के लिहाज से सबसे तेज क्षेत्रों में से एक माना जाता है और इसका नतीजा अंटार्कटिका में बर्फ के पहाड़ों का तेजी से पिघलना है।''

50 सालों में स्थिति हो गई बेहद खराब
डब्लूएमओ का कहना है कि ''पिछले 50 वर्षों में अंटार्कटिक प्रायद्वीप पर तापमान लगभग 3 डिग्री सेल्सियस (5.4 डिग्री फ़ारेनहाइट) बढ़ गया है। इससे बर्फ पिघलने में काफी तेदी से वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ना शुरू हो गया है और दुनियाभर के जितने भी समुद्र से सटे हैं, उन शहरों के समुद्र में डूबने का खतरा पैदा हो गया है''। संयुक्त राष्ट्र ने पिछले हफ्ते ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर जो रिपोर्ट प्रकाशित की है, उसमें भी यही कहा गया है कि दुनिया भर समुद्री तटीय शहरों पर डूबने का खतना मंडराने लगा है। और अगर इसे रोकना है तो फौरन कई कदम उठाने होंगे। ग्लोबल वॉर्मिंग को फौरन कंट्रोल करना होगा।

अंटार्कटिका पिघलने का प्रभाव
ध्रुवीय क्षेत्रों के पिघलने से कुछ वन्यजीवों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है जो उन स्थानों को अपना घर कहते हैं। कोरोना महामारी से पहले अंटार्कटिका क्षेत्र में ग्रीनपीस अभियान में शामिल होने वाले स्वतंत्र शोधकर्ताओं के मुताबिक, अंटार्कटिक के कुछ क्षेत्रों में चिनस्ट्रैप पेंगुइन कॉलोनियों में पिछले 50 सालों में 75 प्रतिशत की कमी आ गई है। उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन को काफी हद तक दोष देना है, कम समुद्री बर्फ और गर्म महासागरों ने क्रिल नाम के जंतुओं को कम कर दिया है, जो पेंगुइन का भोजन होते हैं, लिहाजा पेंगुइन को अब खाने के बिना भूखा रहना होता है और उनकी मौत हो रही है, उनकी आबादी और उनकी कॉलोनियों की संख्या 75 प्रतिशत से कम हो गई है।

अंटार्कटिका का जीवन चक्र हुआ खराब
वैज्ञानिकों ने कहा कि अंटार्कटिका जैसे जगहों के लिए भी जीवन चक्र और भोजन चक्र होता है। फोटोग्राफर सीमैन ने समझाते हुए कहा कि ''फाइटोप्लांकटन समुद्री बर्फ के नीचे खिलता है, जिसे क्रिल नाम के छोटे-छोटे जीव खाते हैं। और फिर पेंगुइन क्रिल को खाकर अपना पेट भरते हैं। पेंगुइन को समुद्री व्हेल मछलियां खाती हैं, और कुल मिलाकर एक श्रृंखला का निर्माण होता है। लेकिन, अगर समुद्री बर्फ ही खत्म होने लगे तो आप इस फाइटोप्लांकटन को खो देते हैं। आप फाइटोप्लांकटन को खो देते हैं और फिर आप क्रिल को खोना शुरू कर देते हैं, और यह पूरी श्रृंखला ही टूट जाती है।

विनाश की शुरूआत
दरअसल अंटार्कटिका पृथ्वी का दक्षिणतम महाद्वीप है, जो पूरी तरह से बर्फ से ढका है। इसके अलावा ये एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के बाद पृथ्वी का पांचवां सबसे बड़ा महाद्वीप है, जो 140 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला है। अगर वहां का तापमान बढ़ता है, तो जाहिर सी बात है कि बर्फ तेजी से पिघलेगी, ऐसे में समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा। जिससे कई देशों के तटीय इलाके डूब सकते हैं या फिर उससे बड़ी तबाही भी आ सकती है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 1979 के मुकाबले 2017 में अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की रफ्तार 6 गुना बढ़ गई थी। जिसकी वजह से अब कुछ ही सालों में विश्व के सैकड़ों शहरों पर तबाही का खतरा मंडराने लगेगा और फिर इंसान कुछ नहीं कर पाएगा।












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