पांच सालों में टूट जाएगा अंटार्कटिका का सबसे खतरनाक ग्लेशियर, मुंबई पर जलप्रलय का खतरा!

वैज्ञानिकों ने कहा है कि, अंटार्कटिका के थ्वाइट्स ग्लेशियर का हिस्सा, जिसका आकार अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य जितना बड़ा है, वो टूट सकता है। इस ग्लेशियर को सबसे खतरनाक ग्लेशियर कहा जाता है।

वॉशिंगटन, दिसंबर 14: अंटार्कटिका में खतरनाक दरार का पता चलने के बाद वैज्ञानिकों ने खतरे का अलार्म बजा दिया है। वैज्ञानिकों को पता चला है कि, अंटार्कटिका के डूम्सडे ग्लेशियर के सामने के हिस्से में एक 'खतरनाक दरार' है, जिससे यह सिर्फ पांच वर्षों में टूट सकता है। ये हिस्सा अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य जितना बड़ा है और अगर यह टूटता है, तो विश्व के कई हिस्सों में प्रलय मच सकता है। सबसे खतरनाक बात ये है कि, समुद्री जलस्तर बढ़ने से मुंबई शहर के तटीय इलाकों के डूब जाने का खतरा काफी बढ़ गया है।

फ्लोरिडा के आकार का टुकड़ा टूटेगा

फ्लोरिडा के आकार का टुकड़ा टूटेगा

वैज्ञानिकों ने कहा है कि, अंटार्कटिका के थ्वाइट्स ग्लेशियर का हिस्सा, जिसका आकार अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य जितना बड़ा है, वो टूट सकता है, और उसका बर्फ पिघलने की वजह से विश्व में समुद्र का जलस्तर करीब 4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जो इंसानों पर आने वाला अब तक का सबसे बड़ा खतरा होगा। सोमवार को जारी किए गए नए डेटा से पता चलता है कि, महासागरों के गर्म होने से थ्वाइट्स ईस्टर्न आइस शेल्फ़ (टीईआईएस) पनडुब्बी शोल, या बैंक पर अपनी पकड़ खो रही है, जो इसे बाकी ग्लेशियर में बनाए रखने के लिए एक पिनिंग पॉइंट के रूप में कार्य करता है, जिसमें दरारें पैदा हो चुका है और उसपर टूटने का खतरा मंडरा रहा है।

तस्वीरों में दिखी बड़ी-बड़ी दरारें

तस्वीरों में दिखी बड़ी-बड़ी दरारें

अमेरिका की जियोफिजिकल यूनियन ने सैटेलाइट तस्वीरों को जारी किया है, जिसमें पता चलता है कि, बर्फ के ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा, जो अंटार्कटिक से जुड़ा हुआ है, उसमें दरारें आ गई हैं और उसपर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि, 'यदि यह तैरती हुई बर्फ की शेल्फ टूट जाती है, तो थ्वाइट्स ग्लेशियर में पानी की मात्रा काफी तेजी से बढ़ेगी, जिसका परिणाम ये होगा कि, समुद्र के स्तर में काफी तेजी से वृद्धि होगी''।

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    ग्लेशियर में नाटकीय बदलाव

    ग्लेशियर में नाटकीय बदलाव

    इंटरनेशनल थ्वाइट्स ग्लेशियर कोलैबोरेशन यानि आईटीजीसी के यूएस लीड कोऑर्डिनेटर, ग्लेशियोलॉजिस्ट प्रोफेसर टेड स्कैम्बोस ने बीबीसी को बताया कि, "ग्लेशियर के सामने एक दशक से भी कम समय में नाटकीय बदलाव होने जा रहा है।" उन्होंने कहा कि, ''प्रकाशित और अप्रकाशित दोनों अध्ययन इसी दिशा में इशारा करते हैं।''

    सैकड़ों टुकड़ों में टूटेगा ग्लेशियर

    सैकड़ों टुकड़ों में टूटेगा ग्लेशियर

    प्रोफेसर टेड स्कैम्बोस ने बीबीसी से कहा कि, 'यह गति (थ्वाइट्स की) को तेज करेगा और ग्लेशियर के खतरनाक हिस्से को प्रभावी ढंग से चौड़ा करेगा।' इस रिसर्च के प्रमुख लेखक और ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एरिन पेटिट ने खतरनाक अंदाज में बढ़ती दरार की तुलना विंडशील्ड में देखी गई दरार से की है। उन्होंने कहा कि, ये ऐसा होगा, मानो छोटी सी टक्कर के बाद भी जैसे किसी कार का शीशा सैकड़ों टुकड़ों में बिखर जाता है, उसी तरह से बर्फ का ये विशालकाय ग्लेशियर बिखर जाएगा।

    पिघल जाएगा थाइट्स ग्लेशियर का पूर्वी हिस्सा

    पिघल जाएगा थाइट्स ग्लेशियर का पूर्वी हिस्सा

    स्टडी करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि, अंटार्कटिका में जब जब शेल्फ फेल हो जाती है, तो थ्वाइट्स ग्लेशियर का पूर्वी तिहाई और भी तेज गति से पिघल जाएगा। प्रोफेसर पेटिट ने साइंस मैगजीन को दिए इंटरव्यू में बताया कि, यह पिघलने की गति को तीन गुना कर देगा और पूरी दुनिया में समुद्र में जलस्तर को काफी कम समय में खतरनाक तरीके से बढ़ा देगा।

    5 प्रतिशत बढ़ेगा जलस्तर

    5 प्रतिशत बढ़ेगा जलस्तर

    उन्होंने कहा कि, वैश्विक समुद्र जलस्तर में कम समय में करीब 5 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है, जो काफी खतरनाक होगा। उन्होंने कहा कि, बर्फ का ये विशालकाय टुकड़ा आड़े-तिरछे अंदाज में टूटेगा, जो बर्फ के दूसरे हिस्सों को भी फ्रैक्चर करेगा और अंत में 5 सालों में ये पूरा बर्फ का हिस्सा टूट सता है। जिसकी वजह से समुद्र में बर्फ का विशालकाय टुकड़ा आ जाएगा, जो काफी आसानी से पिघल जाएगा।

    पृथ्वी से ही निकल रही गर्मी

    पृथ्वी से ही निकल रही गर्मी

    वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि, अंटार्कटिका में फ्लोरिडा राज्य जितने बर्फ के टुकड़े के टूटने के पीछे सिर्फ ग्लोबल वॉर्मिंग की जिम्मेदार नहीं है, बल्कि अगस्त में किए गये स्टडी से पता चला है कि, पृथ्वी के अंदर से भी काफी ज्यादा गर्मी निकल रही है, जिसकी वजह से बर्फ पिघल रहा है। आपको बता दें कि, थ्वाइट्स ग्लेशियर- जिसे समुद्र के स्तर में वृद्धि पर इसके प्रभाव के कारण 'डूम्सडे ग्लेशियर' कहा जाता है, वो पृथ्वी की पपड़ी से निकलती गर्मी से प्रभावित हो रहा है और ये पश्चिमी अंटार्कटिका से करीब 10 से मील उत्तर अंदर है और पूर्व अंटार्कटिका से 25 मील की दूरी पर है।

    600 अरब टन बर्फ का नुकसान

    600 अरब टन बर्फ का नुकसान

    2017 में नासा के जेपीएल डेटा का विश्लेषण करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट छापी थी, जिसमें कहा गया है कि, साल 1980 के बाद से कम से कम 600 अरब टन बर्फ अंटार्कटिका से पिघल चुका है। इस रिसर्च के सह-लेखक और एडब्ल्यूआई भूभौतिकीविद् डॉ कार्स्टन गोहल ने समझाते हुए कहा कि, 'ग्लेशियर के नीचे का तापमान कई कारकों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए जमीन में कॉम्पैक्ट, ठोस चट्टान, या पानी से संतृप्त तलछट के मीटर हैं या नहीं, इसपर भी धरती के अंदर का तापमान निर्भर करता है।'' उन्होंने कहा कि, ''बढ़ती गर्मी को पामी काफी कुशलता के साथ संचालित करता है, लेकिन यह ग्लेशियर तक पहुंचने से पहले ही हीट एनर्जी को दूर भी ले जा सकता है।''

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