अफ़ग़ानिस्तान: अमेरिका के पीछे हटते क़दम और अल-क़ायदा की वापसी का ख़ौफ़
पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के प्रमुख चिंतित हैं. और उनकी चिंता जायज़ है.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के आदेश से, अफ़ग़ानिस्तान में बाक़ी बची पश्चिमी सेनाएं जल्दबाज़ी में देश छोड़ रही हैं. और इस वजह से तालिबान विद्रोहियों का हौसला बढ़ रहा है.
हाल के दिनों में उन्होंने एक के बाद एक ज़िलों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है. इन ज़िलों में सरकारी सैनिक आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं और कुछ जगहों पर तो मैदान छोड़ कर भाग जा रहे हैं.
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अब अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की एक बार फिर अवांछित वापसी हो रही है.
सुरक्षा और आतंकवाद विश्लेषक डॉक्टर सज्जन गोहेल ने बीबीसी को बताया, "अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी ने देश पर तालिबान के क़ब्ज़े को अपरिहार्य बना दिया है. इससे अल-क़ायदा को अपना नेटवर्क दोबारा शुरू करने का अवसर दे दिया है. ये संगठन एक बार फिर दुनिया भर में हमलों की साज़िश रच सकता है."
तालिबान की होगी वापसी?
ये आकलन निश्चित रूप से बहुत निराशावादी है लेकिन दो चीज़ें तो निश्चित हैं.
पहली - तालिबान -साल 1996 से 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान पर सख़्ती से राज करने वाला कट्टर इस्लामवादी संगठन तालिबान किसी न किसी रूप में वापस आ रहा है. फ़िलहाल तालिबान ने कहा है कि उनकी राजधानी काबुल को बलपूर्वक लेने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. लेकिन देश के बड़े हिस्से में वे पहले से ही एक दबदबे वाली ताक़त बन चुके हैं.
और उन्होंने अपने सख्त दिशानिर्देशों के अनुसार देश को इस्लामिक अमीरात बनाने की अपनी मांग को कभी नहीं छोड़ा है.
दूसरी, अल-क़ायदा और उसके प्रतिद्वंद्वी, इस्लामिक स्टेट इन ख़ुरासान (आईएस-केपी), पश्चिमी सेनाओं के वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अपने अभियानों का विस्तार की ताक में होंगे.
अलक़ायदा और इस्लामिक स्टेट पहले से ही अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद हैं. अफ़ग़ानिस्तान एक पहाड़ी मुल्क है, जहां इलाक़ा बहुत ऊबड़-खाबड़ है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित चरमपंथी समूहों को यहां छिपने में आसानी होती है. लेकिन अब तक अमेरिका और बाक़ी देशों के साथ मिलकर काम करने वाली अफ़ग़ानिस्तान की खुफ़िया एजेंसी, एनडीएस,, आंशिक रूप से इस ख़तरे को नियंत्रित करने में सक्षम रही है.
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हमले और बमबारी अब भी जारी हैं. लेकिन अनगिनत मौकों पर, जिनके बारे में हम सार्वजनिक रूप से शायद ही कभी सुनते हैं, मुखबिरों ने टिपऑफ़ या एक इंटरसेप्टेड मोबाइल फ़ोन कॉल की वजह से तुरंत और प्रभावी सैन्य कार्रवाइयां होती रही हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के अपने ठिकानों से पश्चिमी सेनाएं अक्सर मिनटों में प्रतिक्रिया करने में सक्षम होती हैं. रात के अंधेरे में हेलीकॉप्टर से उतरते हैं, और अपने दुश्मनों को दबोच लेते हैं.
वह अब ख़त्म होने जा रहा है.
'ब्रिटेन के लिए बढ़ेगा खतरा'
तालिबान ने इस सप्ताह ये साफ़ कर दिया है कि वे उम्मीद करते हैं कि काबुल हवाई अड्डे या अमेरिकी दूतावास की रखवाली तक के लिए कोई भी सैनिक पीछे नहीं छूट सकता. ऐसा हुआ तो वो दोहा में हुए समझौते का उल्लंघन होगा. इसी समझौते के तहत सभी अमेरिकी सेनाएं 11 सितंबर तक देश छोड़ने वाली हैं.
उन्होंने ऐसी किसी भी पीछे छोड़ी गई सेना पर, हमला करने की बात कही है. फिर भी इस हफ़्ते ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपनी सरकार की ख़ुफ़िया नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल (एनएससी) की एक बैठक बुलाई है. इस बैठक में ये चर्चा की जाएगी कि ब्रिटेन को अब अफ़ग़ानिस्तान में किस प्रकार की सैन्य सहायता बरक़रार रखनी चाहिए.
सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस (एमआई 6) के पूर्व प्रमुख सर एलेक्स यंगर ने स्काई न्यूज़ को बताया कि "अगर पश्चिमी देशों की फ़ौजें अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ देती हैं तो ब्रिटेन के लिए आतंकी खतरा बढ़ जाएगा."
लेकिन यहां एक बड़ी दुविधा है: देश में कुछ दर्जन स्पेशल फ़ोर्सज़ के सैनिक, बिना अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क़रीबी हवाई समर्थन के अगर पीछे छोड़ दिए गए तो तालिबान उनको निशाने पर ले सकते हैं.
तालिबान की मांग साफ़ है - सारे विदेशी सैनिक देश छोड़ें. और पश्चिमी मुल्कों के पास के पास इसका कोई जवाब नहीं है.
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तालिबान, अल-क़ायदा गठजोड़
तो तालिबान और अल-क़ायदा के बीच वास्तव में क्या संबंध हैं?
क्या तालिबान के किसी न किसी रूप में सत्ता में लौटने का अर्थ है कि अल-क़ायदा की भी वापसी होगी? क्या अल-क़ायदा के सभी ठिकानें, आतंकी प्रशिक्षण शिविर और कुत्तों पर उसके भयानक पॉयज़न-गैस प्रयोग वापिस लौटेंगे?
संक्षेप में, 2001 के अमेरिकी नेतृत्व वाले आक्रमण का उद्देश्य अल-क़ायदा की इन्हीं कारगुज़ारियों को बंद करना था.
यह सवाल वर्षों से पश्चिमी ख़ुफ़िया प्रमुखों को परेशान कर रहा है. ब्रिटिश सरकार के क्लासिफ़ाइड दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ब्रिटेन इन दो समूहों के बीच की कड़ी के बारे में कितना चिंतित रहता है.
सुरक्षा और आतंकवाद विश्लेषक डॉ सज्जन गोहेल के लिए तो इसमें गठजोड़ पर कोई संदेह नहीं है.
एशिया पैसिफिक फाउंडेशन के डॉ गोहेल ने कहा, "तालिबान अल-क़ायदा का अटूट हिस्सा है. अगर तालिबान का नेतृत्व चाहे भी तो वे अल-क़ायदा के साथ अपने सांस्कृतिक, पारिवारिक और राजनीतिक दायित्वों को पूरी तरह से त्यागने में असमर्थ रहेंगे."
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क्या हैं संकेत?
अल-क़ायदा प्रमुख, ओसामा बिन लादेन के साल 1996 में सूडान से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचने के बाद से 2001 तक, तालिबान ने उसके लिए एक सुरक्षित ठिकाना मुहैया करवाया था.
उस समय तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले केवल तीन देशों में से एक सऊदी अरब ने अपने ख़ुफ़िया प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल अफ़ग़ानिस्तान भेजा था. प्रिंस तुर्की का मिशन था कि तालिबान, ओसामा बिन लादेन को उनके हवाले कर दे.
तालिबान नेतृत्व इसके लिए तैयार नहीं हुआ. और इन्हीं अफ़ग़ान ठिकानों से 9/11 के विनाशकारी हमलों की योजना बनाई और निर्देशित की गई.
लेकिन ब्रिटेन के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़, जनरल सर निक कार्टर का मानना है कि तालिबान नेतृत्व ने अपनी पिछली ग़लतियों से सीखा होगा. जनरल कार्टर ने अफ़ग़ानिस्तान में कई कमांड दौरे किए हैं.
उनका कहना है कि अगर तालिबान सत्ता साझा करने, या इसपर पूरी तरह से काबिज़ होने की उम्मीद करता है, तो वे इस बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ना चाहेगा.
और यही है मुश्किल.
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एक अस्थिर भविष्य?
तालिबान के हाल ही में शांति वार्ता के दौरान दोहा के वातानुकूलित शॉपिंग मॉल में अच्छे जीवन का स्वाद चख चुके नेता चाहेंगे कि उनके राज को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति हासिल हो और इसके लिए वे पूरी तरह से अल-क़ायदा से रिश्ते तोड़ना चाहेंगे.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान जैसे विशाल देश में, यह निश्चित नहीं है कि भविष्य की तालिबान सरकार, अल-क़ायदा पर लगाम कस पाएगी या नहीं. अल-क़ायदा आसानी से गांवों और दूरस्थ घाटियों के भीतर अपने गिरोहों को छिपा सकता है.
और आख़िर में, अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट समूह, दोनों अफ़ग़ानिस्तान में एक अराजक और अस्थिर हालात के पनपने की उम्मीद रखेंगे. इस वक्त सभी संकेत उनकी मंशा पूरी होने की ओर इशारा कर रहे हैं.
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