सूर्य के पास वाले ग्रह से एलियंस भेज रहे थे सिग्नल? रिसर्च में खगोलविदों ने किया चौंकाने वाला खुलासा

वैज्ञानिकों को लग रहा था कि, सूरज के पास वाले ग्रह से एलियंस सिग्नल भेज रहे हैं। लेकिन, रिसर्च में खगोलविदों ने चौंकाने वाला खुलासा कर दिया।

वॉशिंगटन, अक्टूबर 27: हमारी धरती के अलावा जीवन है या नहीं, एलियंस होते हैं या नहीं होते हैं, एलियंस खतरनाक होते हैं या फिर इंसानों की ही तरह होते हैं, ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका पता लगाने के लिए सालों से वैज्ञानिक तपस्या कर रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों को उन अलौकिक शक्तियों के बारे में कुछ भी पता नहीं चला है। लेकिन, पिछले दिनों वैज्ञानिकों को लगातार एक अजीब सिग्नल मिल रहा था और उस सिग्नल को लेकर वैज्ञानिकों को लगातार लग रहा था, कि वो सिग्नल किसी और ग्रह से आ रहा है।

रहस्यमयी सिग्नल का राज

रहस्यमयी सिग्नल का राज

पिछले दो सालों से लगातार वैज्ञानिकों को बेहद रहस्यमयी सिग्नल मिल रहा था और उस सिग्नल को लेकर लगातार वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे, लेकिन वैज्ञानिकों को कोई सफलता नहीं मिल रही थी। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को लगने लगा कि, ये सिग्नल किसी पास के ग्रह से आ रहा है और हो सकता है कि, उस ग्रह पर किसी तरह की कोई जिंदगी हो, जो सिग्नल भेज रहा है और इंसानों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा हो। वैज्ञानिक को इस बात की भी आशंका थी कि, ये सिग्नल एलियन इंटेलिजेंस सिग्नल हो सकते हैं, लेकिन दो सालों के बाद अब पता चला है कि ये सिग्नल किसी एलियन से नहीं आ रहा था, बल्कि ये सिग्नल धरती पर ही मौजूद किसी शक्तिशाली टूटे कंप्यूटर से मिल रहा था।

29 अप्रैल 2019 को मिला था सिग्नल

29 अप्रैल 2019 को मिला था सिग्नल

खगोलविदों को सबसे पहली बार 29 अप्रैल 2019 को पृथ्वी की तरफ आता एक सिग्नल मिला था। उस वक्त ऐसा प्रतीत हुआ कि ये सिग्नल प्रॉक्सिमा सेंटॉरी से आ रहे हैं, जो हमारे सूर्य के नजदीक ही मौजूद एक तारा है और वैज्ञानिकों का मानना है कि, प्रॉक्सिम सेंटॉरी पर जीवन हो सकता है। क्योंकि, सूरज के पास होने की वजह से इसपर भी रोशनी मौजूद है और ये गर्म भी नहीं है।

पृथ्वी से 4.2 प्रकाश वर्ष की दूरी

पृथ्वी से 4.2 प्रकाश वर्ष की दूरी

हमारी पृथ्वी से इस सितारे की दूरी करीब 4.2 प्रकाश-वर्ष है। चूंकि सिग्नल 982 मेगाहर्ट्ज रेडियो तरंगों के एक संकीर्ण बैंड से आ रहा था, लिहाजा इस बात की संभावना न्यूनतम थी कि ये सिग्नल किसी सैटेलाइट से आ रहा है, या किसी विमान से भेजा जा रहा है या फिर कहां से आ रहा है। लिहाजा इस सिग्नल ने वैज्ञानिकों को और चकरा कर रख दिया था। लिहाजा, रिसर्चर्स को लगा कि हो सकता है ये सिग्नल किसी दूसरे ग्रह से भेजा जा रहा है।

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    सिग्नल ने वैज्ञानिकों को चकराया

    सिग्नल ने वैज्ञानिकों को चकराया

    करीब पांच घंटे के बाद वैज्ञानिकों को सिग्नल मिलना बंद हो गया था और फिर उसको लेकर खगोलविद लगातार रिसर्च कर रहे थे और फिर प्रॉक्सिमा सेंटॉरी ग्रह की तरफ से कभी दूसरी बार वैज्ञानिकों को सिग्नल नहीं मिला। 25 अक्टूबर नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित दो नए अध्ययनों के अनुसार, इसका मतलब यही निकाला गया है कि, यह संकेत प्रॉक्सिमा सेंटॉरी से बिल्कुल नहीं आ रहा था। और अगर इसे हैलोवीन-वाई शब्दों के जरिए कहें को ऐसा माना जा सकता था कि ये सिग्नल सौर मंडल में से ही कहीं से आ रही थी। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में एक खगोलशास्त्री और दोनों रिसर्च के सह-लेखक, सोफिया शेख ने नेचर डॉट कॉम को बताया कि, "यह एक इंसानों के द्वारा निर्मित रेडोयि सिग्नल है, जो शायद पृथ्वी पर बना हो।"

    ऑस्ट्रेलिया में पकड़ा गया था सिग्नल

    ऑस्ट्रेलिया में पकड़ा गया था सिग्नल

    खगोलविदों ने इस सिग्नल को प्रोक्सिमा सेंटॉरी तारे के 26 घंटे के सर्वेक्षण के दौरान दक्षिणपूर्वी ऑस्ट्रेलिया के पार्क्स मुरियांग में रेडियो टेलीस्कोप में पकड़ा था। यह सर्वेक्षण ब्रेकथ्रू लिसन नामक 10 करोड़ डॉलर के एलियन प्रोग्राम का हिस्सा है, जो संभावित अलौकिक प्रसारणों को सुनने के लिए दुनिया भर में दूरबीनों का इस्तेमाल करता है। टेलीस्कोप ने उस प्रॉक्सिमा सेंटॉरी के आसपास करीब 40 लाख से ज्यादा सिग्नल्स को रिकॉर्ड किया था। लेकिन सिर्फ एक सिग्नल बाकी सिग्नल्स की तूलना में काफी अजीब और अलग था, लिहाजा वैज्ञानिकों को लगा कि हो सकता है ये सिग्नल एलियंस के द्वारा भेजा जा रहा हो।

    प्रॉक्सिमा सेंटॉरी पर जीवन की संभावना कितनी

    प्रॉक्सिमा सेंटॉरी पर जीवन की संभावना कितनी

    आपको बता दें कि, प्रॉक्सिमा सेंटॉरी ताना हमारी धरती से करीब 4.2 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थिति है, लिहाजा अब वैज्ञानिकों को धीरे-धीरे लगने लगा है कि, उस सितारे पर जीवन की संभावना काफी कम हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि, प्रॉक्सिमा सेंटॉरी तारे पर सूरज से इतनी भारी माज्ञा में घातक रेडिएशन पहुंच रहा है, जिससे वहां पर जीवन का होना मुमकिन नहीं हो सकता है।

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