भारत में अफ्रीकी महिला इन बेहूदा सवालों से हुई परेशान

एशली बटरफ़ील्ड
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एश्ली बटरफ़ील्ड की उम्र 31 साल है और वह लगभग पूरी दुनिया घूम चुकी हैं, अकेले एक काली महिला के रूप में भारत की यात्रा ने उनके सामने कई चुनौतियां खड़ी कीं. पढ़िए, उनकी कहानी, उनकी ज़ुबानी.

मैंने जैसे ही डिनर ख़त्म किया तो भारतीय रेस्टॉरेंट के अधेड़ उम्र के मालिक ने मुझसे पूछा कि, "क्या काले अपने जीन के कारण या खाना खाने की क्षमता के कारण सेक्स में बेहतर होते हैं?"

बिल भरने से पहले मैंने ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं की थी, हालांकि मैं इससे बिलकुल भी असहज नहीं हुई. अंतरराष्ट्रीय विकास पर पिछले सात सालों तक काम करते हुए मैंने लगभग अकेले ही 30 देशों की यात्रा की है और मैं तरह-तरह सवालों को सुनने की आदी हो गई हूं.

भारत में यह कोई पहली या आख़िरी बार नहीं था जब मैंने ऐसी परिस्थिति का सामना किया था.

उत्तर भारत में एक बस यात्रा के दौरान मेरी आंख लग गई, जब मैं जागी तो कुछ इंच की दूरी पर एक शख़्स अपने फ़ोन से मेरी वीडियो बना रहा था.

मैंने पूछा कि "तुम यह क्या कर रहे हो?"

उसने बड़ी आसानी से जवाब दिया, "इंस्टाग्राम."

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'मुझसे कामुक बातें की गईं'

उदयपुर में रेस्टोरेंट में एक आदमी मेरे पास आया और बताने लगा कि वह काले लोगों से कितना प्यार करता है. इसके बाद उसने ऐसी टिप्पणियां करने शुरू कीं जो कामुक थीं.

मेरी ओर जो ध्यान दिया जाता है वह हमेशा चरम पर नहीं होता लेकिन जब मैं दूसरे यात्रियों के साथ रहती हूं तो कुछ बदलाव दिखाई देते हैं. गोरे या एशियाई यात्रियों के साथ यात्रा करने और अकेले या किसी काले शख़्स के साथ यात्रा करने के दौरान जो मेरी ओर लोगों का ध्यान आता है, उसमें अंतर होता है.

मैं जब किसी शख़्स के साथ यात्रा करती हूं तो साथी यात्रियों की प्रतिक्रया अलग होती है लेकिन नकारात्मक नहीं होती है. हालांकि, जब मैं अकेले या किसी काले शख़्स के साथ यात्रा करती हूं तो अधिकतर लोगों की टिप्पणियां नकारात्मक होती हैं. वे तरह-तरह से मुंह बनाते हैं, हँसते हैं, घूरते हैं, चुटकुले बनाते हैं या फिर हमसे दूर भागते हैं.

पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं भी कई युवाओं की तरह दुनिया देखना चाहती थी और कुछ ऐसा सार्थक काम करना चाहती थी जो मुझे विभिन्न समुदाय और संस्कृति को दिखाए.

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पहली बार विदेश की यात्रा

मैं अमरीका में फ़्लोरिडा के उस परिवार से आती हूं जो छुट्टियां मनाने भी नज़दीकी जगहों पर केवल कार से जाता था, मैं कभी हवाई जहाज़ में नहीं बैठी थी और कभी देश से भी बाहर नहीं गई थी.

22 साल की उम्र में मैंने पहली अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा की. मैं किंगडम ऑफ़ स्वाज़ीलैंड (हाल में इसके सम्राट ने इसका नया नाम इस्वातिनी रखा है) गई. यह एक छोटा-सा देश है जिसकी सीमाएं दक्षिण अफ्रीका और मोज़ाम्बिक के साथ लगती हैं.

यह अपरिचित क्षेत्र मेरे लिए काफ़ी रोमांचकारी था. वहाँ जाकर मुझे समझ में आया कि अफ्रीका के बारे में अमरीका में कितनी ग़लत धारणाएं हैं, वहाँ न तो कोई भाले से शिकार कर रहा था, न ही मिट्टी के घरों में रह रहा था, उन लोगों की सोच और चिंताएँ बहुत अलग नहीं थीं.

मुझे समझ में आया है कि किसी देश को सिर्फ़ पढ़कर या टीवी देखकर नहीं समझा जा सकता.

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जब अमरीकी नहीं समझा गया

लेकिन मेरे लिए सबसे चौंकाने वाली बात मेरे साथ हुआ व्यवहार रहा. मैंने पढाई पूरी करने के बाद अमरीकी संस्था पीस कॉर्प्स ज्वाइन किया, उन्होंने मुझे स्वाजीलैंड भेजने का फैसला किया.

जब मैं वहां पहुंची तो मुझसे पूछा गया कि, "अमरीकी कब यहां आ रहा है?"

मैंने कहा कि मैं अमरीकी हूं. ये सुनकर वे चौंक गए. ठेठ अफ़्रीकियों को लेकर जैसे मेरे विचार थे, उसी तरह से ठेठ अमरीकियों के लिए उनके विचार थे.

उनके लिए मैं एक फ़र्ज़ी अमरीकी थी. कई का ये मानना था कि मैं अंग्रेज़ी बोलने वाले अफ़्रीकी देश की जासूस हूं. किसी ख़ास रंग के स्वयंसेवक के लिए यह असामान्य प्रतिक्रिया नहीं है.

पिछले साल गर्मियों में 31 साल का होने के बाद मैंने एशिया का दौरा करने की योजना बनाई. मैं कई देश जाना चाहती थी लेकिन मैंने मार्च में भारत जाना चाहा ताकि मैं हिंदू त्योहार होली को देख सकूं.

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मेरा कोई भारतीय दोस्त नहीं था इसलिए भारत को जानने के लिए मैंने किताबों पर भरोसा किया. यह मेरे लिए एक नया अनुभव था.

सात सप्ताह पहले मैं दिल्ली पहुंची. यहां पहुंचकर मैंने बहुत सारे कुत्ते, कचरा, शोर और बहुत सारे लोग देखे. यह वास्तव में एक नई दुनिया थी.

दूसरे दिन से मुझे बेचैन करने वाले अनुभव मिलने लगे. मैं सड़क पर जब चलती थी तो लोग मुझे घूरते थे, हंसते थे और मुझसे दूर भागते थे. आवारा कुत्तों ने मुझे घेर लिया और हमला करने की कोशिश करने लगे. मेरे डर को नज़रअंदाज़ कर लोगों को मैंने हंसते देखा.

कुत्तों के हटने के बाद लोगों ने मुझ पर पानी भरे गुब्बारे फेंके. मैं वापस होटल लौटी तो पता चला कि ये होली के दौरान होता है लेकिन मैंने जितना होली के बारे में पढ़ा था, इसने बिल्कुल भी मुझे खेलने का आनंद नहीं दिया.

मैं अगस्त 2017 से एशिया की यात्रा कर रही थी लेकिन भारत का अनुभव सबसे अलग था. यहां मुझे लोगों में जिज्ञासा नहीं दिखी और वह बेहद भयावह लगे. अधिकतर लोग दूर भागते, हंसते, घूरते दिखे. कुछ बेहद अभद्र थे और मुझसे गंदा व्यवहार करते थे.

सबसे अलग अनुभव तब रहा जब एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने मुझसे मासूमियत से काले लोगों की यौन शक्ति के बारे में पूछा.

मुझे एहसास हुआ कि जिस तरह से अफ़्रीका को लेकर मुझे ग़लत जानकारियां दी गई थीं. वैसी ही मुझे यहां के लिए भी दी गई.

उस व्यक्ति ने मुझसे पूछा कि भारत के लिए मैं इतनी जानकारियां कहां से लाई हूं.

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बालों को लेकर थी जिज्ञासा

उसका कहना था कि उसने बहुत-सी काली महिलाओं को टीवी पर बिना ज़्यादा कपड़ों के देखा है. उसने कहा कि उनमें बहुत बल होता है और उसने यह डिस्कवरी चैनल और पोर्न से सीखा है.

काली महिलाओं की यौन शक्ति के अलावा लोगों के दिमाग़ में मेरे बालों के लिए भी कई सवाल थे. एक जगह कई युवाओं के समूह मेरे पास आए और मुझसे मेरे बालों के बारे में पूछा. उनको लग रहा था कि मैंने विग पहनी है.

उनको बताने में मुझे यह ख़ुशी हुई कि लोग प्राकृतिक काले बालों को लेकर बेहद उत्सुक थे. इसके अलावा मुझे कई लोगों को अपने बारे में बताने में ख़ुशी भी हुई.

एक बार जयपुर से उदयपुर की साढ़े सात घंटे की बस यात्रा के दौरान लगभग 45 साल की महिला मेरे साथ यात्रा कर रही थी. उसने मुझे काफ़ी जानकारियां दीं और मुझे नाश्ता भी दिया.

इस यात्रा के दौरान मुझे काफ़ी राहत मिली. यह सब मेरे लिए काफ़ी बड़ी बात थी कि मैं एक काली महिला अपने अनुभव को साझा कर सकी.

मेरा लक्ष्य है कि मैं अधिक से अधिक लोगों से मिल सकूं, वह मुझे देख सकें. मैं चाहती हूं कि लोग मुझे तब तक देखें जब तक वह मुझ जैसे लोगों को देखते हुए बोर न हो जाएं.

मेरा सपना है कि भविष्य के लोग काले लोगों को देखने के आदी हो जाएं.

(बीबीसी की मेघा मोहन से बातचीत पर आधारित)

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