डर से भी ज्यादा भयावह हालात, बेटी बेचते लोग, ना रोटी ना कपड़ा ना नौकरी.. तालिबान शासन के दो साल

Afghanistan: अफगानिस्तान में तालिबान शासन के आज दो साल पूरे हो गये हैं और इन दो सालों में अफगानों ने देखा है, कि असल जिंदगी में नर्क क्या होता है। एक एक रोटी के लिए संघर्ष, बदन ढंकने के लिए कपड़े नहीं और इन सबके बीच, पेट की आग जला ना दे, लिहाजा छोटी बेटियों को अधेड़ों के हाथ बेच देना.. दो सालों में अफगानिस्तान आज इस मोड़ पर खड़ा है, जहां की स्थिति तालिबान के डर से भी ज्यादा भयावह हो चुकी है।

दो दशकों के युद्ध के बाद जैसे ही अमेरिका और नाटो सेनाएं अफगानिस्तान से वापस चली गईं, इस्लामी कट्टरपंथी समूह तालिबान के लड़ाकों ने तेजी से पांव फैलाया की और कुछ ही हफ्तों में पूरे देश पर कब्जा कर लिया। अफगानिस्तान से अकसर छोटी-छोटी बेटियों के बिकने की खबर आती रहती है। कभी 8 साल तो कभी 10 साल या कभी 12 साल की बेटियों को, 50 साल या 60 साल के बूढ़ों के हाथों बेच दिया जाता है।

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शरिया या इस्लामी कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने के शुरुआती वादों के बावजूद, तालिबान ने तब से महिलाओं और लड़कियों पर कठोर प्रतिबंध ही लगाए हैं। महिलाएं और लड़कियां इन दो सालों में सड़कों से गायब कर दी गई हैं और उनकी हैसियत घर की दीवारों के पीछे कैद कर दी गई है।

महिलाओं की आवाजाही की स्वतंत्रता भी प्रतिबंधित कर दी गई है। आइये जानते हैं, कि पिछले दो सालों में अफगानिस्तान, कहां से कहां पहुंच गया है।

अफ़ग़ानिस्तान में रहने की स्थितियां कैसी हैं?

पिछली, पश्चिमी समर्थित अफगान सरकार का लगभग 80% बजट अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से आता था। वह पैसा - जो अब काफी हद तक बंद हो चुका है, लिहाजा अब अस्पतालों, स्कूलों, कारखानों और सरकारी मंत्रालयों को फंड मिलना बंद हो चुका है।

कोविड-19 महामारी, मेडिकल व्यवस्थाओं की कमी, जलवायु परिवर्तन और कुपोषण ने अफ़गानों के जीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है। स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी सेवाएं प्रदान करने के लिए कुछ सहायता एजेंसियां जरूर अफगानिस्तान में काम कर रही हैं, लेकिन वो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

अफगानिस्तान लगातार तीसरे साल सूखे जैसी स्थिति, परिवारों के इनकम में लगातार गिरावट और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग पर प्रतिबंधों से जूझ रहा है। लिहाजा, दशकों के युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित रहे इस देश की स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो चुकी है।

अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है?

विश्व बैंक ने पिछले महीने कहा था, कि स्थानीय मुद्रा, अफगानी, ने प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मूल्य बढ़ाया है। ग्राहक अगस्त 2021 से पहले की गई व्यक्तिगत जमा राशि से ज्यादा पैसा निकाल सकते हैं और अब ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों को भुगतान किया जाने लगा है।

विश्व बैंक का कहना है, कि देश का टैक्स कलेक्शन "स्वस्थ" है और देश में अधिकांश जरूरत के सामान उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें खरीदने वाले कम हैं।

तालिबान ने चीन और कजाकिस्तान सहित क्षेत्र के देशों के साथ निवेश को लेकर बैठकें की हैं। इसके अलावा तालिबान चाहता है, कि देश की बैंकिंग के ऊपर पश्चिम ने जो प्रतिबंध थोप रखा है, उसे हटाया जाए और अमेरिका उसे अरबों डॉलर की फ्रीज धनराशि को जारी करे।

तालिबान का कहना है, कि प्रतिबंधों के हटने से अफगानिस्तान का दर्द कम हो जाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ऐसे कदम तभी उठाएगा, जब तालिबान महिलाओं और लड़कियों पर प्रतिबंध हटाने के साथ साथ एक ऐसी सरकार का गठन करेगा, जिसमें अफगानिस्तान की सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व शामिल होगा।

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तालिबान के दिशा बदलने की कितनी संभावना है?

यह काफी हद तक तालिबान नेता अखुंदजादा पर निर्भर है। मौलवी अखुंदजादा, अपने समूह में समान विचारधारा वाले सरकारी मंत्रियों और इस्लामी विद्वानों को चुनते हैं।

महिलाओं और लड़कियों पर जो भी प्रतिबंध लगाए गये हैं, उन सभी फरमानों के पीछे उनका ही हाथ है। इस्लामी कानून की भाषा में तैयार किए गए उनके आदेश आखिरी होते हैं। प्रतिबंध तभी हटाया जाएगा, जब अखुंदज़ादा आदेश देंगे।

कुछ तालिबान नेताओं को लेकर खबरें आती रहती हैं, कि वो लड़कियों की शिक्षा पर लगाए प्रतिबंध से सहमत नहीं हैं और वो चाहते हैं, कि लड़कियों के लिए स्कूल खोले जाएं, लेकिन तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने इन रिपोर्टों को प्रोपेगेंडा करार दिया है।

1990 के दशक में अफगानिस्तान पर शासन करने के दौरान पाकिस्तान में तालिबान के दूत के रूप में काम करने वाले अब्दुल सलाम ज़ीफ़ ने कहा, कि "उनकी सफलता का रहस्य यह है, कि वे एकजुट हैं।"

2001 के अमेरिकी आक्रमण के बाद ग्वांतानामो बे हिरासत केंद्र में कई साल बिताने वाले ज़ीफ़ ने कहा, "अगर कोई अपनी राय या अपने विचार व्यक्त करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है, कि कोई नेतृत्व के खिलाफ है या किसी अन्य पक्ष में जाएगा।"

उन्होंने कहा, कि "तालिबान के नेता अमीर अखुंदजादा के सामने अपनी राय रखते हैं और आखिरी फैसला उनका होता है, जिसे सब मानते हैं।"

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का मान्यता देने से इनकार

अफगानिस्तान में सहायता चलाने वाले अधिकारियों का कहना है, कि तालिबान मान्यता को एक अधिकार के रूप में देखता है, बातचीत के लायक नहीं।

अधिकारी चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों के साथ उच्च स्तरीय बैठकों का भी हवाला देते हुए संकेत देते हैं, कि तालिबान अपने तरीके से द्विपक्षीय संबंध बना रहा है। कतर के प्रधान मंत्री ने जून में दक्षिण-पश्चिमी अफगान शहर कंधार में अखुंदज़ादा से मुलाकात की थी, जो सर्वोच्च नेता और किसी विदेशी अधिकारी के बीच सार्वजनिक रूप से ज्ञात पहली बैठक थी।

भले ही तालिबान आधिकारिक तौर पर वैश्विक मंच पर अलग-थलग है, लेकिन ऐसा लगता है, कि कुछ देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए उनके पास पर्याप्त बातचीत और जुड़ाव है। नशीले पदार्थों, शरणार्थियों और आतंकवाद-निरोध पर तालिबान के साथ सहयोग पश्चिम सहित विश्व स्तर पर रुचि का है। चीन, रूस और पड़ोसी देश पाकिस्तान जैसे देश, तालिबान पर प्रतिबंधों का अंत चाहते हैं।

ज़ीफ़ ने कहा, "राजनीतिक बातचीत ऐसी है, कि क्षेत्र का कोई भी देश अफ़ग़ानिस्तान को अपनी शक्ति या नियंत्रण में लाने के बारे में नहीं सोच रहा है।" उन्होंने कहा, कि ब्लैकलिस्ट द्वारा अधिकारियों को यात्रा करने से रोकने और बाकी दुनिया के साथ साझा आधार की कमी के कारण तालिबान की विदेशी पहुंच बाधित हो रही है।

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भारत के साथ कैसे हैं संबंध?

भारत, बाकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरह, काबुल में तालिबान सरकार को मान्यता नहीं देता है, लेकिन अतीत की आपसी दुश्मनी को भी 'अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात' के साथ सहयोग के रास्ते में नहीं आने देता है।

भारत ने पिछले 24 महीनों में नियमित रूप से अफगानिस्तान को राहत सहायता भेजी है, जिसमें 50 हजार टन गेहूं भी शामिल है। वहीं, तालिबान ने बार बार भारत से संबंध मजबूत करने की अपील की है और भारत को आश्वासन दिया है, कि वो अपनी धरती को भारत के खिलाफ आतंकी हरकतों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा।

अफगानिस्तान, जिसकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो चुकी है, वो लगातार भारत से मदद के इंतजार में रहता है और इसीलिए वो नई दिल्ली के साथ, अलग अलग स्तर पर कनेक्ट होता है।

हालांकि, भारत अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों की गतिविधियों के बारे में अभी भी चिंतित है और बहुपक्षीय मंचों से बार-बार इस मुद्दे को हल करने की आवश्यकता को रेखांकित करता रहा है। वहीं, भारत ने अफगानिस्तान में एक समावेशी सरकार की स्थापना की मांग की है, जिसमें सभी धर्म, पंथ और महिलाओं की भागीदारी हो।

अफगानिस्तान में तालिबान का कितना विरोध?

अफगानिस्तान के अंदर फिलहाल ऐसी शक्ति नहीं है, जो तालिबान शासन को उखाड़ फेंके। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक हालात ऐसे हैं, कि अब कोई भी देश अफगानिस्तान में जाकर युद्ध लड़ने की स्थिति में ना है, और ना ही आना चाहेगा।

तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए पर्याप्त घरेलू या विदेशी समर्थन वाला कोई सशस्त्र या राजनीतिक विरोध भी नहीं है। काबुल के उत्तर में पंजशीर घाटी से तालिबान शासन का विरोध करने वाली एक लड़ाकू सेना जरूर मौजूद है, जिसके साथ तालिबान के अभी भी हिंसक झड़प चलते रहते हैं, लेकिन उसमें इतनी शक्ति नहीं है, कि तालिबान को हटा सके।

वहीं, इस्लामिक स्टेट लगातार अफगानिस्तान के सरकारी मंत्रालयों और मस्जिदों पर धमाके करता रहता है, लेकिन आतंकवादियों के पास तालिबान के खिलाफ बड़ा हमला करने के लिए लड़ाकों, धन और अन्य संसाधनों की कमी है।

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