सलीमा मजारी...वो अफगान गवर्नर जिन्होंने बना ली खुद की सेना...तालिबान को दे रहीं मुंहतोड़ जवाब
अफगानिस्तान की एक महिला गवर्नर ने तालिबान के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है। कौन हैं सलीमा मजारी...आईये जानते हैं।
काबुल, अगस्त 08: उत्तरी अफगानिस्तान के एक ग्रामीण इलाके में टूटी-फूटी सड़क पर बेधड़क एक जीप गुजर रही होती है। जीप में अफगानिस्तानी थाप पर बजती एक गीत तेज आवाज में गुंजती रहती है और अगले सीट पर एक महिला बैठी होती है, जिसकी आंखों में गुस्सा होता है। एक गांव में जाकर गाड़ी रूकती है और गाड़ी से स्थानीय भाषा में एक जानकारी स्थानीय लोगों के बीच प्रसारित होने लगती है और पता चलता है कि गाड़ी के आगे वाली सीट पर बैठी महिला लोगों से अपनी सेना में शामिल होने के लिए अपील कर रही है। महिला का नाम है, सलीमा मजारी, जो तालिबान के खिलाफ एक मिशन पर निकली हैं और जिनका मकसद है अपनी सेना तैयार कर तालिबान को रोकना।

कौन हैं सलमा मजारी ?
जिस वक्त पूरे अफगानिस्तान में अशांति की आग फैली हुई है और तालिबान ने महिलाओं के अकेले घर से बाहर निकलने पर मनाही लगा दी है, उस वक्क उन तालिबानी लड़ाकों के खिलाफ मिशन पर निकलने वाली महिला सलीमा मजारी, अफगानिस्तान में एक महिला जिला गवर्नर हैं, जो अपनी आर्मी के लिए युवाओं को भर्ती कर रही हैं। सलीमा मजारी युवाओं से अपील करती हैं कि अफगानिस्तान आपकी धरती है और इस धरती के लिए बलिदान देना गर्व की बात है। ऐसा ही एक गीत लाउडस्पीकर पर बजता रहता है। मई की शुरुआत से जब तालिबान ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में अपनी पहुंच बनाने में लग गाय और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जब 31 अगस्त तक अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने की आखिरी तारीख मुकर्रर कर दी, उसी वक्त से अफगानिस्तान खून का स्नान कर रहा है और ऐसा लग रहा है, मानो ये देश अनाथ है और इसके मुकद्दर में सिर्फ बर्बादी लिखी है।

सलीमा मजारी का मिशन
''मानवाधिकारों को रौंदना ही तालिबान का काम है'', यही वाक्य है सलीमा मजारी का। अफगानिस्तान के उन इलाकों में जहां तालिबान अपनी पकड़ बना चुका है, वहां के लोगों की स्थिति अब काफी बदल गई है। लेकिन, चारकिंट में, जो पहाड़ों और घाटियों के बीच स्थिति है, वहां अभी भी सलीमा मजारी का शासन चल रहा है। यानि अफगानिस्तान सरकार अभी भी यहां पर एक्टिव है। ये इलाका बल्ख प्रांत में मजार-ए-शरीफ से करीब एक घंटे दक्षिण में पड़ता है। तालिबान शासन के तहत महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा और रोजगार से वंचित कर दिया गया था, लेकिन 2001 में आतंकवादियों के पतन के बाद भी रवैया धीरे-धीरे बदल गया है। मजारी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि, "सामाजिक रूप से पहले लोग एक महिला नेता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।" लेकिन, धीरे-धीरे स्थिति बदल गई है।
हजारा समुदाय से तालिबान की दुश्मनी
वैसे तो तालिबान हर उस शख्स को खत्म कर देना चाहता है, जो उसका विरोध कर रहा हो, लेकिन हजारा समुदाय ने हमेशा से तालिबान को काफी बड़ी चुनौती दी है। मजारी भी हजारा समुदाय से भी आती हैं, जिनमें ज्यादातर शिया मुसलमान हैं और तालिबान सुन्नी प्रधान है, जो शियाओं को 'विधर्मी संप्रदाय' का मानते हैं। उन्हें तालिबान और इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा नियमित रूप से निशाना बनाया गया है, जिसमें मई में राजधानी के एक स्कूल पर हमला भी शामिल है, जिसमें 80 से ज्यादा लड़कियों की मौत हो गई थी। लेकिन, अब स्थिति बदल गई है और आधे जिलों पर तालिबान का नियंत्रण स्थापित हो चुका है और बाकी इलाके की रक्षा के के लिए सलीमा मजारी दिन भर लड़ाकों की तलाश करती हैं और अब तक उन्होंने अपने इलाके में आने से तालिबान को रोक कर रखा हुआ है।

सलीमा मजारी की सेना
सलीमा मजारी के साथ धीरे धीरे लोग जुड़ रहे हैं और उनकी सेना में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए हैं, जिनमें किसान, चरवाहे और मजदूर शामिल हैं। लेकिन, दिक्कत ये थी कि पहले किसी के पास भी बंदूक नहीं हुआ करता था। लेकिन, अब लोगों ने बंदूक खरीदने के लिए अपनी जमीनों को गिरवी रखना या बेचना शुरू कर दिया है। लोगों ने तालिबान से लड़ने के लिए काफी बड़ी कुर्बानियां दी हैं, अपने मवेशियों को बेच दिया है और दिन रात सैकड़ों लोग अपने जिले की सीमा पर तालिबान को रोकने के लिए तैनात रहते हैं। जिला पुलिस प्रमुख सैयद नजीर का मानना है कि तालिबान के कब्जे में न आने का एकमात्र कारण स्थानीय प्रतिरोध है। एएफपी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, "हमारी उपलब्धियां हमारे लोगों के समर्थन के कारण हैं,"

मजारी की सेना में 600 लोग
सलीमा मजारी की सेना में अभी 600 लोग शामिल है और धीरे-धीरे ये आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। चूंकी ये सभी लोग स्थानीय लोग हैं, लिहाजा स्थानीय लोगों का पूरा समर्थन इन्हें हासिल है, लिहाजा तालिबानी आतंकियों ने अभी तक सलीमा मजारी के इलाके की तरफ रूख नहीं किया है। मजारी ने अब तक जिले में पारंपरिक सुरक्षा बलों के लिए लगभग 600 स्थानीय लोगों की भर्ती की है, जिसमें 53 वर्षीय सैयद मुनव्वर भी शामिल हैं, जिन्होंने 20 साल की खेती के बाद हथियार उठाए हैं। सैयद मुनव्वर कहते हैं कि, जब तक वे (तालिबान) हमारे गांवों पर हमला नहीं करते, तब तक हम कारीगर और कामगार हुआ करते थे।" "उन्होंने पास के एक गांव को हथिया लिया है और उनके सामान लूट लिए हैं, उन्होंने हमें गोला बारूद और हथियार खरीदने के लिए मजबूर किया है'' (फाइल फोटो)

तालिबान के खिलाफ स्थानीय प्रतिरोध
21 साल के फैज़ मोहम्मद भी सलीमा मजारी की सेना में शामिल हैं और कुछ दिनों पहले तक वो पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन तालिबान की वजह से किताब हाथ से जा चुकी है। तीन महीने पहले तक फैज मोहम्मद की दुनिया किताबों तक सीमित थी, लेकिन अब वो तीन लड़ाईयां तालिबान के खिलाफ लड़ चुके हैं। एएफपी के प्रतिनिधि जब फैज से मिलने पहुंचे तो वहां शोकपूर्ण हजारा संगीत एक सस्ते चायनीज फोन पर बज रहा था। फैज ने एएफपी को बताया कि ''कुछ दिन पहले रात में भीषण लड़ाई तालिबान के साथ हुई थी, उन्होंने एक रात में हमारे ऊपर सात हमले किए''। 2001 के अमेरिकी नेतृत्व वाले आक्रमण से कट्टरपंथी इस्लामी शासन को गिराने से पहले चरकिंट के ग्रामीणों के मन में अभी भी तालिबानी शासन के दौरान की बुरी यादें जिंदा हैं और वहां के लोगों का मानना है कि अब अगर फिर से तालिबान लौटता है, तो फिर से उनकी जिंदगी तबाह हो जाएगी।

सलीमा मजारी कितनी मजबूत ?
तालिबान से लड़ने के लिए गवर्नर सलीमा मजारी के पास ना तो फौज है और ना ही खुद की कोई बड़ी सेना। किसानों और छात्रों की फौज के साथ वो तालिबान को कब तक रोक पाएंगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इस बात को सलीमा बहुत अच्छे से जानती हैं कि अगर तालिबानी सत्ता में लौटते हैं, तो वो एक महिला को गवर्नर के पद पर कभी भी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि ''महिलाओं को शैक्षिक अवसरों से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा और हमारे युवा रोजगार से वंचित हो जाएंगे,"। उन्होंने कहा कि ''हमने अभी हार नहीं मानी है, अभी हम लड़ेंगे और हम अगली लड़ाई की तैयारी करेंगे''।












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