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तालिबान को लेकर पाकिस्तान ने ऐसा क्या किया कि अफगानिस्तान के लोग गुस्से से उबल रहे हैं?

अफगानिस्तान की सिविल सोसाइटी पाकिस्तान को दुनिया के लिए खतरा बताते हुए पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही है।

काबुल/इस्लामाबाद, अगस्त 22: पिछले एक हफ्ते में दूसरी बार ट्विटर पर 'सेंक्शन पाकिस्तान' टॉप ट्रेंड कर रहा था और अफगानिस्तान के हजारों लोग पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे थे। लोगों का गुस्सा साफ तौर पर पाकिस्तान के खिलाफ निकल रहा था। खबर थी कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी काबुल जाने वाले हैं और ट्विटर पर आम अफगानिस्तान के लोग भारी विरोध कर रहे थे। ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था 'पाकिस्तान का काबुल में स्वागत नहीं है'। तो आखिर ऐसी क्या बात है कि आम अफगान पाकिस्तान से इस कदर नफरत करने लगे हैं। उनमें पत्रकारों से लेकर राजनेता भी शामिल हैं। क्या अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग अलग हैं...अफगानों का तो यही मानना है।

पाकिस्तान का अलग खेल?

पाकिस्तान का अलग खेल?

अफगानिस्तान के सीनियर जर्नलिस्ट और कवि हबीब खान कहते हैं कि अफगानिस्तान की इस बर्बादी के पीछे अगर किसी का हाथ है तो वो पाकिस्तान का है। हबीब खान ने लिखा है कि पाकिस्तान एक न्यूक्लियर शक्ति संपन्न देश है, जहां रहने वाले लाखों लोग मजहबी तौर पर काफी ज्यादा कट्टर बन चुके हैं और ये देश ना सिर्फ अफगानिस्तान के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। पाकिस्तान को वैश्विक सुरक्षा के लिए रोकना ही होगा। हबीब खान तालिबान और पाकिस्तान गठबंधन को लेकर सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहते हैं कि काबुल पर कब्जा करने के बाद तालिबान की चाल पूरी तरह से बदल गई है।

सरकारी दफ्तरों पर आईएसआई काबिज!

उन्होंने कहा है कि 'तालिबान अफगानिस्तान के सरकारी दफ्तरों में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंटों और प्रो पाकिस्तानियों को नियुक्त कर रही है। इसके साथ ही जितने भी सरकारी संगठन हैं, उन सभी की जिम्मेदारी आईएसआई के हाथों में दी जा रही है। तालिबान के जरिए पाकिस्तान अफगानिस्तान के हर संवैधानिक, राजनीतिक, धार्मिक पदों पर कब्जा जमा रहा है।' हबीब खान ने आरोप लगता हुए कहा है कि 'कुनार और बेशना में जो नये गवर्नर बनाए गये हैं, वो दोनों आईएसआई एजेंट हैं और रावलपिंडी स्थिति आईएसआई दफ्तर से सीधे तौर पर उनकी नियुक्ति की गई है।' हबीब खान अभी भी सदमे में हैं और कहते हैं कि उन्होंने और उनके जैसे लाखों आम अफगानों को तालिबान का शासन कबूल नहीं है। खासकर हबीब खान जैसे लाखों अफगान युवा पाकिस्तान पर प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं।

तालिबान को मान्यता दिलाने की कोशिश

तालिबान को मान्यता दिलाने की कोशिश

तालिबान को सीधे तौर पर पाकिस्तान ने समर्थन दे दिया है और अब अफगानिस्तान में शांति बहाली के नाम पर पाकिस्तान तालिबान को मान्यता दिलाने के लिए पूरी ताकत से जुटा हुआ है। लिहाजा पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी इन दिनों काफी काफी दौर-भाग कर रहे हैं। शनिवार को पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोग्लू के साथ काफी देर तक बात की और पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने काफी देर तक अपने समकक्षों को समझाने की कोशिश की, कि आखिर क्यों तालिबान को मान्यता देने से अफगानिस्तान में शांति बहाली हो सकती है। इसके साथ ही पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक शाह महमूद कुरैशी ने इस्लामिक सहयोग संगठन यानि ओआईसी के महासचिव युसेफ बिन अहमद अल ओथैमीन से भी अफगानिस्तान के मुद्दे पर काफी देर तक चर्चा की है।

हथियार ले जा रहे पाकिस्तान

हथियार ले जा रहे पाकिस्तान

अफगानिस्तान के कई पत्रकारों ने दावा किया है कि अफगान सैनिक जिन हथियारों को छोड़कर भाग हैं, उनमें से कुछ पर तालिबान का कब्जा है और ज्यादातर हथियार ट्रकों पर लादकर पाकिस्तान लाया जा रहा है। पाकिस्तान नहीं चाहता है कि अफगानिस्तान के सैनिक फिर से इन हथियारों पर कब्जा हासिल कर सके और तालिबान के लिए आगे खतरा बन सके। अफगानिस्तान से कई ऐसे वीडियो और तस्वीरें मिली हैं, जिसके जरिए दावा किया जा रहा है कि अफगान सैनिकों के हथियार पाकिस्तान ले जाए जा रहे हैं। इसको लेकर भी अफगानिस्तान के लोगों में भारी गुस्सा देखा जा रहा है।

रूस को अपने पाले में करने की कोशिश

रूस को अपने पाले में करने की कोशिश

अफगानिस्तान से हर देश का स्वार्थ जुड़ा है। रूस चाहता है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी वर्चस्व हमेशा के लिए खत्म हो जाए और अगल सरकार पर अमेरिका का प्रभाव नहीं हो। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव को अफगानिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में तालिबान के महत्व को समझाते हुए कहा कि तालिबान को अगर सरकार से दूर रखा गया तो अफगानिस्तान में शांति संभव नहीं है, लिहाजा तालिबान को मान्यता दे देनी चाहिए। इसके लिए शाह महमूद कुरैशी ने पाकिस्तान-रूस संबंध के बीच द्विपक्षीय संबंध का भी हवाला दिया। वहीं बात अगर रूस की करें तो उसके तालिबान के साथ कोई बुरे संबंध नहीं है। तालिबान के प्रवक्ता लगातार मॉस्को से प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहे हैं। वहीं, रूस बार-बार कहता रहा है कि 'अफगानिस्तान में बाहरी शक्तियों का कोई काम नहीं है और अफगानिस्तान का भविष्य आम अफगानों के हाथ में ही होना चाहिए'। ऐसे में पाकिस्तान चाहता है कि रूस अगर तालिबान को मान्यता दे देता है, तो उसका काम आसान हो जाएगा।

चीन-तुर्की को मनाता पाकिस्तान

चीन-तुर्की को मनाता पाकिस्तान

पाकिस्तान ने ही तालिबान नेताओं और चीन के विदेश मंत्री की मुलाकात और बात करवाई थी और तालिबान को लेकर चीन पूरी तरह से नरम है। चीनी मीडिया ने साफ तौर पर कहा है कि तालिबान अगर उसकी शर्तों को मान ले तो उसे मान्यता देने में कोई दिक्कत नहीं है। एक रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि तालिबान की सरकार बनते ही चीन उसे मान्यता दे देगा और तालिबान भी चीन को अफगानिस्तान के पुननिर्माण के लिए आमंत्रित कर चुका है। चीन को अफगानिस्तान में खनन करना है और सीपीईसी प्रोजेक्ट पर ध्यान देना है, लिहाजा चीन को फर्क नहीं पड़ता है कि काबुल में कौन काबिज है, वो सिर्फ अपने प्रोजेक्ट पर ध्यान देना चाहता है। रही बात तुर्की की, तो तुर्की और तालिबान के संबंध अभी तक अच्छे नहीं रहे हैं, लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड का हवाला देकर पाकिस्तान तुर्की को तालिबान पर नरम करना चाहता है। तुर्की के राष्ट्रपति भी अफगानिस्तान की शांति के लिए पाकिस्तान को अहम बता चुके हैं। ऐसे में माना यही जा रहा है कि तुर्की भले तालिबान को मान्यता अभी नहीं दे, लेकिन तुर्की तालिबान को लेकर चुप रह सकता है।

ईरान और ब्रिटेन का रूख

ईरान और ब्रिटेन का रूख

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ब्रिटेन और जर्मनी के राष्ट्राध्यक्षों से अफगानिस्तान को लेकर बात की है और उन्हें भी तालिबान को मान्यता और आर्थिक मदद देने की गुजारिश की है। ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन ने एक दिन पहले बयान में कहा भी है कि अगर जरूरत पड़ी तो वो तालिबान के साथ काम करने को तैयार हैं, हालांकि, मान्यता देने के सवाल पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन ब्रिटेन जैसा देश अगर तालिबान के साथ काम करने को तैयार होता है तो पाकिस्तान की ये बड़ी डिप्लोमेटिक जीत कही जाएगी। वहीं, ईरान को लेकर तालिबान ने कहा है कि उसे ईरान से कोई दिक्कत नहीं है। शिया बहुत ईरान को सुन्नी कट्टरपंथी संगठन तालिबान से डर है, लिहाजा ईरान अभी पूरी तरह से खामोश है। लेकिन, पर्दे के पीछे से पाकिस्तान लगातार ईरान से संपर्क में है।

अफगानों के गुस्से को समझिए

अफगानों के गुस्से को समझिए

पाकिस्तान के पीएम इमरान खान तालिबान को एक 'क्रांतिकारी संगठन' बताते हैं, तो पाकिस्तान के राजनेता लगातार तालिबान के समर्थन में बयान दे रहे हैं। पाकिस्तान की अवाम सोशल मीडिया पर सीधे तौर पर तालिबान को समर्थन दे रही है और 'स्टैंड विथ तालिबान' का हैशटैग चलता है तो डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, लाहौर में तालिबान के झंडे भी लहराए गये हैं। लिहाजा अफगानिस्तान के लोगों का मानना है कि पाकिस्तान की वजह से ही अफगानिस्तान का ये हाल है। अफगानिस्तान की अपदस्त सरकार ने खुले तौर पर पाकिस्तान का विरोध किया, अफगानिस्तान के पूर्व एनएसए ने पाकिस्तान को 'चकलाघर' तक बता दिया। यानि, पाकिस्तान को लेकर अफगानों का ये बढ़ता गुस्सा किस करवट बैठेगा, ये तो देखने वाली बात होगी, लेकिन तालिबान को समर्थन देकर पाकिस्तान ने ये जरूर साबित कर दिया है कि इमरान खान की सोच क्या है।

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