Explainer: नई दिल्ली में अफगान दूतावास बंद, क्या भारत को तालिबान को राजदूत भेजने की इजाजत देनी चाहिए?
Afghan Embassy India Close: नई दिल्ली स्थिति अफगान दूतावास ने आधिकारिक तौर पर प्रेस रिलीज जारी करते हुए भारत में अपना दूतावास बंद करने की घोषणा कर दी है। ये अफगान दूतावास तालिबान के नियंत्रण से पहले अशरफ गनी सरकार द्वारा स्थापित की गई थी, जिसे तालिबान शासन ने मंजूरी नहीं दी थी। लिहाजा, अब जब अफगान दूतावास आधिकारिक तौर पर बंद हो चुके हैं और अफगानिस्तान में भारत के काफी हित जुड़े हुए हैं, तो सवाल उठ रहे हैं, कि क्या भारत, तालिबान को नई दिल्ली में दूतावास खोलने की इजाजत देगा?
लिहाजा, तालिबान शासन की नजर नई दिल्ली में राजनयिक प्रतिनिधित्व पर है।
तालिबान शासन लंबे सयम से भारत सरकार से अनुरोध कर रहा है, कि नई दिल्ली में उसे अपने डिप्लोमेट को भजने की इजाजत दी जाए। इसी साल फरवरी महीने में द प्रिंट में छपी एक खबर में कहा गया था, कि तालिबान शासन, भारत पर इस बात के लिए दबाव डाल रहा है, कि उसे भारतीय राजधानी में अपना दूत तैनात करने की अनुमति दी जाए।

तालिबान ने स्पष्ट रूप से इस मामले को पहली बार जुलाई 2022 में उठाया था, जब भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक टीम ने काबुल का दौरा किया था।
वहीं, फरवरी महीने में ही डिप्लोमेट की एक रिपोर्ट में एक पूर्व अफगान राजनयिक के हवाले से, नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा था, कि "तालिबान शासन ने "अपने अधिकारियों को नई दिल्ली में देश का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति देने के लिए" भारत से "अपना अनुरोध बढ़ा दिया है"।
तालिबान भारत से अपने संबंध इसलिए भी बढ़ाना चाह रहा है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ उसके संबंध काफी खराब हो चुके हैं और इस वक्त, जब पाकिस्तान अफगानिस्तान के शरणार्थियों को देश से निकाल रहा है, तो अफगानिस्तान को और ज्यादा मानवीय मदद की जरूरत है और भारत से ज्यादा मानवीय मदद उसे भला और कौन भेजेगा?
भारत से संबंध क्यों जोड़ना चाहता है तालिबान?
तालिबान के बार बार अनुरोध के पीछे उसकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की उसकी बेताब मुहिम है। अभी तक किसी भी देश ने तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन पाकिस्तान, ईरान, रूस और चीन जैसे कुछ देशों ने तालिबान को अपने राजनयिकों को भेजने की इजाजत दे दी है। ये देश काफी तेजी से तालिबान से जुड़े हैं, लिहाजा भारत के ऊपर भी तालिबान से जुड़ने का दबाव है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के काफी ज्यादा हित रहे हैं।
माना जा रहा है, कि ये रूस, चीन, कतर और पाकिस्तान जैसे देश तालिबान शासन को मान्यता देने के मूड में हैं और हो सकता है, कि अगले साल इन देशो से तालिबान को मान्यता भी मिल जाए।
वहीं, एक पूर्व भारतीय राजनयिक ने कहा, कि भारत अगर तालिबान को नई दिल्ली में राजनयिक भेजने की इजाजत देता है, तो तालिबान की टोपी में लगा ये एक मूल्यवान पंख होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि एक तो भारत दुनिया का सबसे विशालकाय और बड़ा लोकतंत्र है और भारत, अमेरिका के सबसे ज्यादा करीब है।
लिहाजा, दिल्ली में डिप्लोमेट भेजने के बाद तालिबान शासन को वैश्विक गंभीरता मिलेगी, वहीं इसके बाद तालिबान के लिए पाकिस्तान को बैकफुट पर लाना काफी ज्यादा आसान हो जाएगा।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को नुकसान?
वहीं, भारत अगर तालिबान को नई दिल्ली में अपने दूत को भेजने की इजाजत देता है, तो फिर इसका मतलब साफ तौर पर यही होगा, कि भारत अब जियो-पॉलिटिक्स में अपने फायदे को देख रहा है।
डिप्लोमेट की एक रिपोर्ट में एक स्वतंत्र शोध मंच, मन्त्रया के संस्थापक-अध्यक्ष शांति मारिएट डिसूजा ने कहा, कि "नई दिल्ली को किसी भी रणनीति को अपनाने में सतर्क रहना चाहिए, जिसमें तालिबान के राजनयिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करना शामिल है, क्योंकि यह तालिबान शासन को मान्यता देने के समान है।"
उन्होंने कहा, कि "तालिबान एक आतंकवादी संगठन है, जिसने अवैध रूप से सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इस शासन में न केवल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच, बल्कि अफगान लोगों के बीच भी वैधता का अभाव है।" उन्होने कहा, कि "लिहाजा, भारत को इस समय शासन को मान्यता देने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे भारत की सद्भावना और अंतर्राष्ट्रीय शाख को नुकसान पहुंचेगा।"
कैसे रहे हैं भारत-तालिबान के संबंध?
भारत और तालिबान के बीच संबंध दशकों से शत्रुतापूर्ण रहे हैं। 2001 में पहले तालिबान शासन को हटाने के बाद, भारत ने राष्ट्रपति हामिद करजई और अशरफ गनी की लोकतांत्रिक सरकारों के साथ मजबूत संबंध बनाए और अफगानिस्तान के विकास में मजबूती से भाग लिया।
अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद, अफगानिस्तान में नई दिल्ली के प्रभाव में नाटकीय रूप से गिरावट आई। भारत ने अफगानिस्तान में अपने राजनयिक मिशन बंद कर दिए और विकास और आजीविका परियोजनाओं को निलंबित कर दिया।
लेकिन, सत्ता में लौटने के कुछ ही हफ्तों के भीतर, तालिबान भारत को सहायता प्रदान करने, अफगानिस्तान में अपनी राजनयिक उपस्थिति को पुनर्जीवित करने, देश में विकास कार्य फिर से शुरू करने, उड़ानें फिर से शुरू करने और भारत में अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति वाले छात्रों को वीजा जारी करने के लिए प्रस्ताव देने लगा।
भारत ने अफगानों को मानवीय सहायता भेजकर इसका जवाब भी दिया और पिछले साल जून में अधिकारियों की एक टीम काबुल भेजी। भारतीय अधिकारी, तालिबान शासन के अधिकारियों से जुड़े। और इस मुलाकात ने भारत के लिए काबुल में अपना दूतावास फिर से खोलने का मार्ग प्रशस्त किया। उम्मीद है कि भारत जल्द ही कंधार में अपना वाणिज्य दूतावास फिर से खोलेगा।
लेकिन, तालिबानी दूत को लेकर फैसला करना निश्चित तौर पर भारत के लिए मुश्किल फैसला लेने की स्थिति है, क्योंकि एक तरफ भारत के गंभीर हित हैं, तो दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय शाख।
तालिबान के साथ जुड़ाव गहराने से अफगानिस्तान से संचालित होने वाले भारत विरोधी आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने में शासन पर भारत का दबदबा बढ़ सकता है। पूर्व भारतीय राजनयिक ने कहा, यह विशेष रूप से "फायदेमंद" होगा क्योंकि पाकिस्तान का "तालिबान के साथ रणनीतिक स्टॉक अब तक के सबसे निचले स्तर पर है"।
डिसूजा ने देखा कि क्षेत्रीय शक्तियां अफगानिस्तान में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं और भारत "इसमें शामिल हो गया है।" उन्होंने कहा, जबकि तालिबान-पाकिस्तान संबंधों के खराब होने से भारत के लिए जगह खुल गई है, नई दिल्ली को इस जगह का उपयोग "न केवल रणनीतिक अर्थ में, बल्कि जमीनी स्तर पर जुड़ने के लिए" करना चाहिए। भारत को "अफगानिस्तान में एक राष्ट्रीय संवाद, सुलह और समावेशी सरकार बनाने" का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने एक ऐसे जुड़ाव की आवश्यकता पर बल दिया जो सरकारी अधिकारियों से आगे बढ़कर लोगों से लोगों के बीच जुड़ाव को शामिल करे, विशेषकर महिलाओं और युवा समूहों को, जिन्हें आय सृजन, बाजार और सतत विकास में मदद की जरूरत है।












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