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70 लाख साल पहले दो पैरों पर पहली बार चला था मानव, जानिए चार से दो पैरों तक का सफर

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वाशिंगटन, 25 अगस्तः दो दशक पहले शोधकर्ताओं ने अफ्रीकी देश चाड में एक आंशिक जीवाश्म पैर की हड्डी यानी कि फीमर और दो अग्र-भुजाओं की हड्डी यानी उलना की एक जोड़ी का पता लगाया। वे जीवाश्म सबसे पहले ज्ञात होमिनिड से आते हैं, जो लगभग 7 मिलियन वर्ष पहले रहते थे, और यह प्रकट करते हैं कि प्राणी जमीन और पेड़ों दोनों पर सीधे चलते थे।

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लेकिन एक नए अध्ययन से चर्चा छिड़ गयी है, कि क्या वे वास्तव में होमिनिड प्रजातियों से संबंधित हैं, जिन्हें सहेलथ्रोपस टचडेन्सिस के रूप में जाना जाता है? ये परेशान करने वाले प्रश्न बन गए हैं क्योंकि वैज्ञानिकों को संदेह है कि वानर और होमिनिड प्रजातियों ने लगभग 7 मिलियन वर्ष पहले, सीधे चलने के लिए कई तरह के तरीके विकसित किए, जो दूसरों की तुलना में कुछ अधिक कुशल थे। फीमर और उलना की जांच से संकेत मिलता है कि सहेलथ्रोपस टचडेन्सिस न सिर्फ दो पैरों पर चलते थे बल्कि पेड़ों पर भी चढ़ते थे।

इंसानों के कई लक्षण हमारे सबसे करीबी रिश्तेदार चिंपैंजी और बोनोबो से हमें अलग करते हैं। जैसे कि हमारे बड़े दिमाग, सीधी मुद्राएं, विरोधी अंगूठे और बड़े पैमाने पर बाल रहित शरीर। हालांकि यह अनिश्चित बना हुआ है कि इनमें से कौन सी विशेषता होमिनिन के अलावा चिंपांजी और बोनोबो वंश को विभाजित करना शुरू कर देती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सहेलथ्रोपस टचडेन्सिस की आंशिक खोपड़ी आकार और संचरना में संभवतः एक चिंपैंजी के करीब की है लेकिन इसका चेहरा मोहरा और दांत होमिनिन्स के साथ मिलते जुलते थे। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि ये मनुष्य और चिंपांजी के बीच के करीबी रिश्तेदार हो सकते हैं।

नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने तीन और जीवाश्मों का विश्लेषण किया जो कि सहेलथ्रोपस टचडेन्सिस से जुड़े थे। इस जीवाश्म में एक पीमर और दो अल्सर थे। वैज्ञानिकों ने मूल रूप से इन हाथ-पैर की हड्डियों को एक ही समय और साइट पर अन्य सहेलथ्रोपस टचडेन्सिस जीवाश्मों के रूप में हासिल किया। पोइटियर्स यूनिवर्सिटी में एक पालीओथ्रोपोलॉजिस्ट फ्रैंक गाय बताते हैं कि चाडियन प्रजातियों में चयनित शारीरिक विशेषताओं का एक सेट है जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि हमारे पूर्वज जमीन पर और पेड़ों पर चलने का अभ्यास कर रहे थे। और सबसे खास बात ये है कि हमारे सबसे करीबी चिंपैंजी रिश्तेदारों की तरह शुरुआती होमिनिनों ने अभी भी पेड़ों पर चढ़ने की क्षमता बरकरार रखी है।

70 लाख साल पहले मानव जाति के पूर्वज पेड़ों पर रहते थे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि घास के फैलने और पेड़ों के कम होने के कारण उन्हें पेड़ों पर रहने में समस्या होने लगी। एक ही पेड़ पर कई-कई वानर होने से भोजन से लेकर रहने तक में दिक्कतें आने लगीं। ऐसे में उन्हें खाने की तलाश के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाना पड़ा। कई वानरों ने खतरा मोल लिया और संभवतः यही वह वक्त था जब वे दो पैरों के सहारे चलने लगे।

हालांकि घास सभी जगह थी लेकिन यह नई जगह उन वानरों के लिए ज्यादा अच्छी थी जो दो पैरों पर चलते थे। वे लंबी घासों से सिर उठाकर शिकार और शिकारी दोनों पर नजर रख सकते थे। दो पैरों पर चलना एक बहुत ही अहम विकास था। क्योंकि उससे दोनों हाथ खाली रहते थे। ये खाली हाथ थे जिन्होंने मानव इतिहास को गढ़ा। कहना चाहिए की दो पैरों पर चलने की मजबूरी ने मानव सभ्यता का विकास किया।

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English summary
7 million years ago, our earliest relatives took their first steps on 2 feet
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