एस. जयशंकर के पांच बयान, जिन्होंने बाइडेन प्रशासन की धज्जियां उड़ा दी, US से संबंध होंगे खराब?

विदेश मंत्री एस जयशंकर बुधवार को अपनी यात्रा समाप्त कर रहे हैं, तो हम उन पांच कड़े बयानों पर भी एक नज़र डालते हैं जो उन्होंने अमेरिका दौरे पर अमेरिका के खिलाफ दिए हैं। इन बयानों को अमेरिका चाहकर भी नहीं भूल पाएगा।

नई दिल्ली, 27 सितंबरः विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने संयुक्त राज्य अमेरिका की 10 दिवसीय यात्रा के अपने न्यूयॉर्क चरण का समापन किया। इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा समेत कई बहुपक्षीय, त्रिपक्षीय बैठकों के अलावा लगभग 40 द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लिया। इस अवसर पर उन्होंने बाइडन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत भी की। इसके अलावा अपने समकक्षों के साथ उनकी कई बैठकें द्विपक्षीय थीं जबकि उनमें से कुछ अनौपचारिक बैठकें भी थीं। अब जब विदेश मंत्री बुधवार को अपनी यात्रा समाप्त कर रहे हैं, तो हम उन पांच कड़े बयानों पर भी एक नज़र डालते हैं जो उन्होंने अमेरिका दौरे पर अमेरिका के खिलाफ दिए हैं।

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    1. आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं?

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    भारतीय-अमेरिकन समुदाय की ओर से वाशिंगटन में आयोजित एक कार्यक्रम में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान को लड़ाकू विमान एफ-16 के उच्चीकरण के लिए 45 करोड़ डॉलर की धनराशि मंजूर करने पर सवाल उठाए। विदेश मंत्री ने कहा कि इस्लामाबाद और वाशिंगटन के बीच संबंधों से ना तो पाकिस्तानियों का भला है और ना ही अमेरिकियों का। उन्होंने आगे कहा, 'अमेरिका को पाकिस्तान से अपने संबंधों पर सोचना चाहिए कि उसे इससे क्या हासिल हुआ।' जयशंकर ने कहा, 'मैं ये बात इसीलिए कह रहा हूं क्योंकि ये आतंकवाद विरोधी सामान है। हर कोई जानता है, ये आप भी जानते हैं कि विमानों को कहां तैनात किया गया है और उनका क्या उपयोग किया जा रहा है। आप ये बातें कहकर किसी को बेवकूफ नहीं बना सकते।'

    2. गरीब देश से 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तक

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    न्यूयॉर्क में एक विशेष ‘इंडिया@75′ शोकेसिंग इंडिया-यूएन पार्टनरशिप इन एक्शन' कार्यक्रम में बोलते हुए एस जयशंकर ने कहा कि 2047 तक खुद को एक विकसित देश के रूप में देखता है, जब हमारी आजादी के 100 साल पूरे होंगे। विदेश मंत्री ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आलोचना करते हुए कहा, "18वीं शताब्दी में भारत वैश्विक जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा था। लेकिन 20वीं शताब्दी तक आते-आते उपनिवेशवाद की वजह से भारत दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक बन गया। आज भारत अपनी आजादी के 75वें वर्ष में संयुक्त राष्ट्र के सामने "गर्व से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था" के रूप में खड़ा है और अभी भी "सबसे मजबूत, सबसे उत्साही और निश्चित रूप से सबसे तर्कपूर्ण लोकतंत्र" के रूप में उभर रहा है।

    3. हमें अच्छी तरह पता होता कि वे क्या लिखने वाले हैं

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    एस जयशंकर ने भारत को लेकर ‘पक्षपाती खबरें' दिखाने पर ‘द वाशिंगटन पोस्ट' समेत कई बड़े अमेरिकी मीडिया संस्थानों पर निशाना साधा। जयशंकर ने भारतीय-अमेरिकियों के साथ 25 सितंबर को एक संवाद में कहा, ‘मैं मीडिया में आने वाली खबरों को देखता हूं। कुछ समचार पत्र हैं, जिनके बार में आपको अच्छी तरह पता होता है कि वे क्या लिखने वाले हैं और ऐसा ही एक समाचार पत्र यहां भी है।' बतादें कि वाशिंगटन पोस्ट वाशिंगटन डीसी में प्रकाशित होने वाला राष्ट्रीय दैनिक पत्र है और इसके मालिक ‘अमेजन' के जेफ बेजोस हैं।

    4. भारत में नहीं चल पाती तो विदेश में प्रोपेगेंडा फैलाते हैं

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    एस जयशंकर ने कहा कि ‘मेरा यह कहना है कि कुछ लोग पूर्वाग्रही हैं। वे कोशिश करते हैं फैसले तय करने की और जैसे-जैसे भारत अपने फैसले खुद करना शुरू करेगा, इस तरह के लोग जो अपने को संरक्षक की भूमिका में देखते हैं, उनके विचार बाहर आएंगे।' विदेश मंत्री ने कहा कि ऐसे समूहों कि भारत में जीत नहीं हो रही है। ऐसे में ये समूह देश के बाहर जीतने की कोशिश करते हैं और बाहर से भारत की राय व धारणाएं बनाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि हमें इसे लेकर सतर्क होने की जरूरत है।

    5. अमेरिका ने ही भारत को समझा पराया

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    विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि रूसी रक्षा उपकरणों पर भारत की निर्भरता और मॉस्को के साथ मजबूत रिश्तों का कारण यह नहीं है कि नई दिल्ली ने इन उपकरणों को हासिल करने के लिए अमेरिका से संपर्क नहीं किया। उन्होंने कहा, हमारे संबंधों में आया एक बदलाव रक्षा सहयोग के क्षेत्र में भी है, जो शायद पिछले करीब 15 साल में अपने मौजूदा रूप में आया है। 1965 से आगामी 40 साल तक भारत में अमेरिका का कोई सैन्य उपकरण नहीं आया। इस दौरान भारत-सोवियत, भारत-रूस के रिश्ते मजबूत हुए। लेकिन इसका कारण भारत की ओर से कोशिश का अभाव नहीं है। मैं इसकी पुष्टि स्वयं कर सकता हूं। मेरे रिश्तेदार, मेरे पिता, मेरे दादा, रक्षा मंत्रालय में काम करते थे। इसलिए, मैं पहले से जानता हूं कि उन वर्षों में अमेरिका को यह समझाने के लिए कितने महान प्रयास किए गए थे कि एक मजबूत, एकजुट, स्वतंत्र, समृद्ध भारत का होना अमेरिकी हित में है।

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