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दशकों में पहली बार एक साथ झूम रहे हैं किसान और सरकार

भारत गेहूं

नई दिल्ली, 29 अप्रैल। दस साल में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसान राजेन सिंह पवार सरकार की बजाय किसी निजी कंपनी को अपना गेहूं बेचा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें आसमान पर हैं और भारतीय किसानों को उसका भरपूर फायदा हो रहा है.

रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद दो बड़े गेहूं उत्पादक देशों के यहां से सप्लाई नहीं हो रही है, लिहाजा भारत जैसे देशों के किसानों के गेहूं की मांग बढ़ गई है और उन्हें अपने माल की रिकॉर्ड कीमत मिल रही है. ऐसा तब हुआ है जबकि पवार और उनके साथियों की फसल भी बंपर हुई है. यानी एक तरफ कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं तो उनके पास बेचने के लिए भी रिकॉर्ड गेहूं है.

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मध्य प्रदेश में रहने वाले 55 साल के पवार कहते हैं, "बहुत वक्त बाद ऐसा हुआ है कि ट्रेडर हमारे गेहूं के लिए एमएसएपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) से ज्यादा पैसा देने को भी तैयार हैं. भारत के बढ़ते गेहूं निर्यात ने हम जैसे किसानों की बड़ी मदद की है जिन्हें अपनी फसल पर बहुत अच्छा मुनाफा मिल रहा है."

सुनहरा मौका

पिछले कुछ हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमत 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है. उससे पहले हालत ऐसी थी कि भारत को गेहूं निर्यात करने में खासा संघर्ष करना पड़ता था. न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होने के कारण किसानों से तुलनात्मक रूप से ऊंचे दाम पर खरीदा गया गेहूं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए महंगा होता था और उसके खरीददार कम होते थे.

लेकिन एक के बाद एक कई ऐसे कारक काम कर रहे हैं जिनके कारण सारे खाने किसानों और गेहूं व्यापारियों के फायदे में फिट बैठ रहे हैं. एक तो वैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कमी है, उस पर भारतीय रुपये बहुत कमजोर हो गया है और फिर भारत में परिवहन आदि की सुविधाएं बेहतर हुई हैं. जिनका नतीजा मुनाफे के रूप में सामने आ रहा है. इसीलिए ओलम एग्रो इंडिया नामक कृषि उत्पाद कंपनी के उपाध्यक्ष नितिन गुप्ता कहते हैं, "भारत को अपना अतिरिक्त गेहूं निर्यात करने के लिए यह सुनहरा मौका है."

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रूस और यूक्रेन दोनों ही गेहूं के सबसे बड़े उत्पादकों में से हैं. लेकिन उनके बीच युद्ध के कारण काला सागर से सप्लाई रूट प्रभावित हुए हैं. इसके अलावा रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने भी गेहूं की कमी की स्थिति को गंभीर कर दिया है.

सरकार को बड़ी बचत

भारत के गेहूं निर्यात में वृद्धि का एक नतीजा यह भी होगा कि इस साल भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) कम गेहूं खरीदेगा. वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद करता है और इस साल यह कीमत 20,150 रुपये प्रति टन है. दशकों में पहली बार ऐसा होगा कि एफसीआई की खरीद में भारी कमी होगी. यानी भारत सरकार को भारी बचत होगी. पिछले साल भारत ने 43.34 टन गेहूं खरीदा था और इस पर 856 अरब रुपये खर्च किए थे.

अनुमान है कि इस साल एफसीआई की खरीद 30 फीसदी तक घट सकती है. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इससे कम सरकारी पैसा अतिरिक्त गेहूं के रूप में गोदामों में बंद होगा. दिल्ली स्थित ट्रेडर राजेश पहाड़िया जैन बताते हैं कि भारत ने 330 डॉलर से 350 डॉलर यानी 25,000 से 27,000 रुपये प्रति टन के मूल्य के निर्यात ऑर्डर बुक किए हैं. भारत के अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वन्द्वियों के मुकाले यह 50 डॉलर प्रति टन तक सस्ता है. मार्च में भारत ने 78.5 लाख टन गेहूं का निर्यात किया है जो कि पिछले साल से 275 प्रतिशत ज्यादा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2022-23 में भारत का निर्यात 1.20 करोड़ टन तक जा सकता है.

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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