संजय निरुपम की कार्यप्रणाली से कार्यकर्ताओं में मायूसी, मुंबई कांग्रेस का सबसे बुरा दौर

मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई हमेशा से रही है लेकिन, मुंबई कांग्रेस वर्तमान में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं में मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरुपम की कार्यप्रणाली से मायूसी साफ देखी जा सकती है। जानकारों का कहना है कि निरुपम की कार्यप्रणाली से केंद्र और महाराष्ट्र की सत्ता में सहभागी शिवसेना को लगातार फायदा हो रहा है जबकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में लगातार निराशा का माहौल बनता जा रहा है। यदि इस पर पार्टी आलाकमान ने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिन मुंबई कांग्रेस के लिए किसी आपदा से कम नहीं होंगे।

संजय निरुपम की कार्यप्रणाली से कार्यकर्ताओं में मायूसी, मुंबई कांग्रेस का सबसे बुरा दौर
मुंबई कांग्रेस में हमेशा से गुटबाजी हावी रही है। पूर्व मंत्री गुरुदास कामत, मिलिंद देवड़ा, कृपाशंकर सिंह और पूर्व सांसद एकनाथ गाहकवाड गट अपने - अपने वर्चस्व को लेकर आपसी खींचतान को हवा देते रहे हैं। इसके बावजूद जरूरत पड़ने पर इन नेताओं के बीच कहीं न कहीं आपसी समझ भी देखने को मिल जाती थी। इधर निरुपम को मुंबई अध्यक्ष बने हुए तीन साल हो गया के लेकिन वरिष्ठ नेताओं के बीच कभी भी आपसी समझ देखने को नहीं मिली। इसी का नतीजा है कि जबतक पार्टी आलाकमान का निर्देश नहीं आता तबतक कामत, देवड़ा अन्य नेता एक साथ नहीं बैठते।

कार्यकर्ता निराश होकर पलायन कर गए

निरुपम की कार्यप्रणाली से पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में जबरदस्त निराशा है। पिछले तीन सालों में पूर्व विधायक रमेश सिंह, राजहंस सिंह सहित पार्टी के निष्ठावान पदाधिकारी जयप्रकाश सिंह, नीतेश सिंह और अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष निज़ामुद्दीन राईन ने निरुपम की कार्यप्रणाली और अपनी उपेक्षा से नाराज होकर पार्टी छोड़ दी। इनमें राईन ने हालांकि कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद कोई दूसरी पार्टी नहीं जॉइन की लेकिन शेष लोगों ने भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश करके अपनी नई पारी शुरू कर दी। पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा का आलम यह है कि अधिकांश पदाधिकारी आज़ाद मैदान स्थित पार्टी कार्यालय भी नहीं आते। अपने नाम को न छापने का आग्रह करते हुए एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने निरुपम पर कांग्रेसी संस्कारों के विपरीत व्यवहार करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि अंततः हमने अपनी सारी उम्र कांग्रेस में गुजार दी है, हमें कुछ न भी मिले तो कम से कम सम्मान तो मिले। उन्होंने निरुपम पर ऐसे चाटुकार कार्यकर्ताओं से घिरे होने का आरोप लगाया जिनका कोई जनाधार और जनसंपर्क नहीं है।

माइनॉरिटी और महिला कांग्रेस की दुर्दशा

कांग्रेस में माइनॉरिटी विभाग के साथ ही महिला कांग्रेस का विशेष महत्व है। यह सब जानने के बावजूद पिछले लगभग डेढ़ साल से माइनॉरिटी विभाग के अध्यक्ष पद को रिक्त रखा गया। मुंबई में मुस्लिम मतदाता एकमुश्त कांग्रेस को वोट देता रहा है। वर्तमान में मुंबई के पांच कांग्रेसी विधायकों में से तीन मुस्लिम हैं। इसके बावजूद अल्पसंख्यक विभाग की जानबूझ कर अनदेखी की गई जिसका सीधा सा फायदा दूसरे दलों को मिला है। हाल ही में इस पद पर बब्बू खान की नियुक्ति की गई जो फिलहाल कांग्रेस के टिकट पर कॉर्पोरेटर चुने गए हैं लेकिन उन्हें कांग्रेस के लोग आयातित ही मानते हैं। इसी तरह निरुपम ने महिला कांग्रेस की अध्यक्ष के तौर पर अजंता यादव की नियुक्ति करा दी है जबकि यादव को कांग्रेस संगठन के बारे में ही जानकारी नहीं है। वे हर बात के लिए निरुपम के निर्देश का इंतजार करती हैं।

शिवसेना से आए लोगों का बोलबाला

कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इस बात का हमेशा मलाल रहा है कि जब से निरुपम मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं उनके आस - पास शिवसेना से आए लोगों का वर्चस्व है। इसकी वजह स्वयं निरुपम का शिव सैनिक होना है। वे कांग्रेस में आने के पहले शिवसेना में थे और कांग्रेस के कट्टर विरोधी थे। ऐसे में वे आजतक अपनी शिवसैनिक वाली छवि से बाहर नहीं आए सके हैं। कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता उन्हें इसलिए भी स्वीकार करने को आज भी नहीं तैयार हैं क्योंकि निरुपम को अपने पूर्व शिवसैनिकों पर ही भरोसा है। बहरहाल, निरुपम की शिवसेना से नजदीकी कांग्रेस के लिए कभी भी घातक साबित हो सकती है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने तो साफ - साफ कहा है कि पार्टी आलाकमान को मुंबई कांग्रेस को बचाने के लिए इस ओर जल्द से जल्द फैसला लेना होगा।

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