जो बीजेपी-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां नहीं कर पाई, वो टीएमसी-बीजेडी ने कर दिखाया

नई दिल्ली- 17वीं लोकसभा के लिए ओडिशा की बीजू जनता दल और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस ने एक बहुत ही बेहतरीन पहल की है। देश में महिला मतदाताओं की संख्या अब बढ़कर लगभग आधी हो चुकी है। आंकड़ों में देखें तो ये संख्या 47% से बढ़कर 48.13% तक पहुंच चुकी है, लेकिन लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या अभी भी 11.2% पर ही अटकी पड़ी है। इसकी वजह सिर्फ यही है कि सत्ताधारी दलों ने संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बातें तो बहुत कीं, लेकिन जमीन पर उसके लिए ठोस इरादे के साथ कभी भी पूरजोर कोशिश नहीं की। लेकिन, इन दोनों क्षेत्रीय पार्टियां ने अबकी बार कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को आईना दिखा दिखा दिया है। बीजेडी और टीएमसी ने चाहे जिन वजहों से भी महिलाओं को भरपूर संख्या में टिकट देने का फैसला किया हो, उन्हें उचित भागीदारी देकर देश की नारीशक्ति को उचित सम्मान देने का काम जरूर किया है।

ममता-नवीन का बहुत बड़ा सियासी कदम

ममता-नवीन का बहुत बड़ा सियासी कदम

पिछले दिनों ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में महिलाओं की एक विशाल रैली में मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने जैसे ही राज्य से 33% महिलाओं को लोकसभा का टिकट देने का ऐलान किया,तो पूरी देश की नजर उनकी ओर चली गई। महिलाओं के बीच में महिला सशक्तिकरण की इतनी बड़ी पहल पर कौन सवाल उठा सकता है। उनके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर 41% टिकट महिलाओं को देने की घोषणा करके चौका मार दिया। यानी अब ओडिशा की 21 लोकसभा सीटों पर बीजेडी 7 महिला उम्मीदवारों को उतारेगी और पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 17 सीटों पर टीएमसी ने महिलाओं उम्मीदवारों के नामों की घोषणा भी कर दी है।

खबरें हैं कि नवीन पटनायक ने पार्टी के सहयोगियों के मना करने करने के बावजूद इतनी बड़ी सियासी जोखिम ली है। बीजेडी के कई नेता इतनी बड़ी तादाद में महिला प्रत्याशियों की जीत को लेकर आशंकित नजर आ रहे हैं। जोखिम तो ममता बनर्जी ने भी ली है, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि इन दोनों पार्टियों ने अपनी तरफ से महिलाओं को उचित स्थान देश की राजनीति को बहुत ही सकारात्मक दिशा देने की कोशिश की है। बीजेपी और कांग्रेस हर बार संसद से महिलाओं को 33% आरक्षण दिलाने का वादा तो करते रहे हैं। लेकिन, पार्टी से 33% महिलाओं को टिकट दिलाने की दिशा में कभी भी कोई ठोस पहल नहीं किया है।

सत्ता विरोधी लहर खत्म करने का प्रयास

सत्ता विरोधी लहर खत्म करने का प्रयास

वैसे टीएमसी और बीजेडी के फैसले के पीछे की सियासी पहलुओं को समझने की कोशिश करें, तो महिलाओं को 33% या 41% टिकट देकर एक साथ कई निशाना साधने की कोशिश भी दिखती है। चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार के चुनाव में 3.80 करोड़ पुरुष मतदाताओं की तुलना में 4.35 करोड़ महिला मतदाता जुड़े हैं। इसमें अकेले पश्चिम बंगाल में 40 लाख नई महिला मतदाता शामिल हुई हैं। ओडिशा में रजिस्टर्ड महिला मतदाताओं की संख्या 1.5 करोड़ है, जबकि 2014 के चुनाव में ही वहां कई लोकसभा क्षेत्रों में महिला वोटरों की संख्या पुरुष मतदाताओं को पार कर चुकी थी।

पश्चिम बंगाल में ममता ने महिलाओं को टिकट देने के बहाने करीब 10 सांसदों का डिब्बा गोल कर दिया है। माना जा रहा है कि क्षेत्र से उनका फीडबैक सही नहीं था और उनकी जगह महिलाओं को टिकट देकर दीदी ने सत्ता विरोधी लहर की धार को कमजोर करने की कोशिश की है। इसी तरह ओडिशा में भी जनता बीजेडी के कई सांसदों और विधायकों के कामकाज से खुश नहीं है। इसी को देखते हुए बीजेडी ने ऐसा कदम उठाया है कि सत्ता विरोधी लहर से भी निपट सकेगी और महिलाओं को टिकट देने के नाम पर पार्टी के अंदर किसी तरह के विरोध का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

23 मई के बाद दोनों निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका

23 मई के बाद दोनों निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका

2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 में से 34 सीटों पर टीएमसी का कब्जा हुआ था, जबकि ओडिशा की 21 में से 20 सीटें बीजू जनता दल ने जीत ली थी। दोनों पार्टियों को इस बार बीजेपी के साथ कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। अगर दोनों पार्टियों ने पिछली बार की तरह सफलता पाई तो इसबार केंद्र में इन दोनों की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ने की संभावना है। त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में बंगाल की दीदी खुद को प्रधानमंत्री के तौर पर भी पेश कर सकती हैं, वहीं बीजेडी किंगमेकर के तौर पर बड़ा रोल निभा सकती है। इसलिए, ये चुनाव नवीन और ममता दोनों की पॉलिटिकल करियर के लिए बहुत ही अहम है। ओडिशा में तो विधानसभा चुनाव भी साथ ही हो रहे हैं। ऐसे में पटनायक के पास 5वीं बार मुख्यमंत्री बनकर ज्योति बसु का रिकॉर्ड तोड़ने का भी मौका है। अब बड़ा सवाल है कि दोनों ने महिला सशक्तिकरण के नाम पर जो सियासी दांव खेला है, उसका राजनीतिक अंजाम क्या होता है?

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