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Women Reservation: 2029 से पहले 33% महिला आरक्षण! लोकसभा सीटें 816, महिला MP की संख्या 273, हर डिटेल

Women Reservation 2029: देश की राजनीति में बड़ा बदलाव होने की तैयारी है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं को 33% आरक्षण देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके लिए संसद के मौजूदा सत्र में दो अहम बिल लाए जा सकते हैं। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ, तो लोकसभा की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी।

सरकार महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्तों में बदलाव करना चाहती है। अभी कानून के मुताबिक नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू होना है, लेकिन अब प्रस्ताव है कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। इससे 2029 से पहले ही महिलाओं को आरक्षण मिल सकेगा।

Women Reservation 2029

इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है। इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी संसद में महिलाओं की भागीदारी एक झटके में काफी बढ़ जाएगी, जो अब तक सीमित रही है।

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सरकार ये दो बिल लाने की कर रही है तैयारी?

सरकार इस बार दो अलग-अलग बिल लाने की तैयारी में है।पहला बिल 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' में संशोधन से जुड़ा होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव करेगा। इन दोनों बिलों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा, इसलिए सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है। गृहमंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए कई दलों से बातचीत शुरू कर दी है। इसमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम जैसे दल शामिल हैं। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी चर्चा हो चुकी है, जबकि कांग्रेस से बातचीत अभी बाकी है।

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आरक्षण का फॉर्मूला क्या होगा? कानून बना, लागू क्यों नहीं हुआ?

प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। हालांकि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोई प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। यही मॉडल राज्यों की विधानसभाओं में भी लागू करने की योजना है।

महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हो चुका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया था। लेकिन इसकी लागू होने की तारीख अभी तय नहीं हुई है। केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए इसे लागू करेगी और जरूरत पड़ने पर संशोधन भी कर सकती है।

संसद में महिला सांसदों की स्थिति: राज्यों के हिसाब से पूरी तस्वीर

लोकसभा में कुल 75 महिला सांसद हैं, जो अलग-अलग राज्यों से चुनकर आई हैं। इस डेटा से साफ दिखता है कि कुछ राज्यों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा है, जबकि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एक भी महिला सांसद नहीं है। पश्चिम बंगाल सबसे आगे है, जहां से 11 महिला सांसद हैं और सभी एक ही पार्टी से आती हैं। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में भी अच्छी संख्या देखने को मिलती है। वहीं राज्यसभा में 242 में 41 महिला सांसद हैं।

राज्यवार लोकसभा महिला सांसदों की डिटेल

राज्य सांसद पार्टी
पश्चिम बंगाल 11 सभी टीएमसी
उत्तर प्रदेश 7 सपा- 5, भाजपा- 1, अपना दल- 1
महाराष्ट्र 7 कांग्रेस- 4, भाजपा- 2, एनसीपीएसपी- 1
मध्य प्रदेश 6 सभी भाजपा
तमिलनाडु 5 कांग्रेस- 2, डीएमके- 3
बिहार 5 जदयू- 1, आरजेडी- 1
गुजरात 4 भाजपा- 3, कांग्रेस- 1
ओडिशा 4 सभी भाजपा
राजस्थान 3 कांग्रेस- 1, भाजपा- 2
कर्नाटक 3 कांग्रेस- 2, भाजपा- 1
छत्तीसगढ़ 3 भाजपा- 2, कांग्रेस- 1
आंध्र प्रदेश 3 भाजपा- 1, वाईएसआर- 1, टीडीपी- 1
तेलंगाना 2 भाजपा- 1, कांग्रेस- 1
दिल्ली (NCT) 2 सभी भाजपा
झारखंड 2 भाजपा- 1, जेएमएम- 1
उत्तराखंड 1 भाजपा
त्रिपुरा 1 भाजपा
पंजाब 1 शिरोमणि अकाली दल
केरल 1 कांग्रेस
हिमाचल प्रदेश 1 भाजपा
हरियाणा 1 कांग्रेस
असम 1 भाजपा
दादरा और नगर हवेली व दमन-दीव 1 भाजपा

जहां से एक भी महिला सांसद नहीं

  • राज्य: गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश
  • केंद्र शासित प्रदेश: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अंडमान-निकोबार, चंडीगढ़, लक्षद्वीप, पुडुचेरी

दूसरी तरफ, कई छोटे और पूर्वोत्तर राज्यों में महिला प्रतिनिधित्व पूरी तरह से गायब है। यह स्थिति बताती है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी संतुलित नहीं है। कुछ राज्यों में राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को ज्यादा मौके दे रही हैं, जबकि कई जगह यह अवसर सीमित है।

कुल मिलाकर यह आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं। एक तरफ महिलाओं की बढ़ती भागीदारी दिखती है, तो दूसरी तरफ अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। महिलाओं की बराबर हिस्सेदारी के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक बदलाव दोनों जरूरी हैं।

महिला आरक्षण बिल: साल-दर-साल पूरा सफर

महिला आरक्षण बिल का रास्ता आसान नहीं रहा। इसकी शुरुआत 1996 में हुई थी, जब पहली बार इसे संसद में लाया गया। लेकिन शुरुआत से ही इस पर राजनीति और विरोध हावी रहा। कई बार बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार हंगामे, विरोध या सहमति की कमी के कारण यह आगे नहीं बढ़ पाया।

1998 में तो स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि संसद में बिल की कॉपी तक फाड़ दी गई। इसके बाद 2000, 2002 और 2003 में भी कोशिशें जारी रहीं, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

2008 और 2010 में मनमोहन सरकार के समय यह बिल राज्यसभा से पास भी हुआ, लेकिन लोकसभा में अटक गया और अंततः खत्म हो गया।

करीब 27 साल के लंबे इंतजार के बाद 2023 में यह बिल 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के रूप में पास हुआ और कानून बन गया। यह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

Women Reservation Bill India Timeline

वर्ष क्या हुआ
1996 देवगौड़ा सरकार महिला आरक्षण बिल लेकर आई, लेकिन कई पार्टियों ने विरोध किया और मामला स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया।
1998 (13 जुलाई) अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन आरजेडी सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने विरोध में बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998 (14 जुलाई) सरकार ने दोबारा बिल पेश करने की तैयारी की, लेकिन भारी हंगामे के कारण यह संभव नहीं हो पाया।
1998 (11 दिसंबर) एक और कोशिश की गई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद सरोज विरोध करते हुए पोडियम तक पहुंच गए और प्रक्रिया रुक गई।
1998 (23 दिसंबर) अटल सरकार बिल पेश करने में सफल रही, लेकिन जेडीयू के विरोध के चलते यह पास नहीं हो सका।
2000 सरकार ने फिर से बिल लाने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
2002 एक बार फिर प्रयास किया गया, मगर इस बार भी सफलता नहीं मिली।
2003 बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास भी असफल रहा।
2008 मनमोहन सिंह सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में बिल पेश किया, लेकिन हंगामे के बाद इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेज दिया गया।
2010 9 मार्च को राज्यसभा में बिल दो-तिहाई बहुमत से पास हो गया, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका और बिल समाप्त हो गया।
2023 मोदी सरकार ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के रूप में बिल संसद में पेश किया, जो लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पास हुआ और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन गया।

क्या बदल सकता है आगे? (What Next)

अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो संसद में महिलाओं की संख्या 273 तक पहुंच जाएगी। इससे न सिर्फ महिलाओं की आवाज मजबूत होगी, बल्कि नीतियों और फैसलों में भी उनका असर बढ़ेगा।

कुल मिलाकर, यह कदम भारतीय राजनीति में सबसे बड़े सामाजिक बदलावों में से एक साबित हो सकता है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक सहमति सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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