Women's day 2025: विलुप्त हो रही ऐपण कला को विदेशों में पहचान देने वाली नैनीताल की बेटी कौन है ?
Women's day 2025: किसी भी जगह की पहचान वहां की लोककलाओं, वहां की संस्कृतियों और त्योहारों से होती है। हमारे देश में ऐसी ना जाने कितनी कलाएं हैं जिनके बारे में लोग कुछ नहीं जानते। ये लोक कलाएं किसी जमाने में काफी समृद्ध हुआ करती थी लेकिन अब विलुप्ति के कगार पर हैं।
देवभूमि उत्तराखंड अपनी कई लोक कलाओं और संस्कृतियों के लिए जाना है जाता है इनमें से ही एक कला है ऐपण विधि। ऐपण कला देवभूमि के कुमाऊं क्षेत्र की है जहां आज भी परम्पराओं के अनुसार इसे शादी ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर बनाया जाता है।

कुमाऊनी लोग इस विधि को बहुत शुभ मानते हैं लेकिन ये कलाकृति अब विलुप्त हो रही है। क्या है ऐपण विधि जिसकी छाप नए संसद भवन की दिवारों पर भी दिखता है। कौन है वो महिला जो इस कला को संजोने का कार्य कर रही हैं? आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं..
कुमाऊं की ये ऐपण कला काफी समृद्ध है जिसका पहाड़ी रीति-रिवाजों में अपना अलग महत्तव है। ये कला न सिर्फ पहाड़ी विरासत को दिखाती है बल्कि प्रकृति से लगाव की सीख देती है। लेकिन ये विधि अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही और कुछ लोग इसे सहेजने का काम कर रहे हैं।
कुमाऊनी महिलाएं अपनी इस पारम्परिक कला को जीवित रखने का प्रयास कर रही हैं और इसमें उनका साथ दे रही है नैनीताल की हेमलता कड़वाल। हेमलता ना सिर्फ इस कुमाऊंनी कला को बचाने का प्रयास कर रही है बल्कि इसे देश-विदेश तक पहुंचाने का भी प्रयास कर रही हैं।
ऐपण कला क्या है ?
ऐपण का अर्थ होता है लेखन यानि हांथो से की गई कलाकृति। ऐपण कला को दाहिने हांथ की तीन उंगलियों से बनाया जाता है। भीगे हुए चावल को पीस कर एक घोल तैयार किया जाता है फिर लाल रंग के बैकग्राउंड या दीवारों पर कोई कलाकृति बनाई जाती है। खासतौर पर ये ज्यामितीय कलाकृतियां घर-आंगन, मंदिर में बनाई जाती है जो ईश्वर के बुलाने का प्रतिक है। दिखने में ये ऐपण भले ही सरल और सामान्य सा लगता हो लेकिन स्थानीय महिलाएं इन कलाकृतियों को बनाने में ग्रह नक्षत्रों का खास ध्यान रखती हैं।

कौन हैं ये ऐपण गर्ल?
हेमलता काडवाल, कुमाऊं के मुक्तेश्वर जिले के छोटे से गांव सतखोल की रहने वाली है। पहाड़ों के शौकिनों को ये जगह काफी पसन्द है और लाखों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक यहां घूमने आते रहते हैं। इन टूरिस्टों को ये लोक कला काफी पसंद है और वो इसे अपने साथ लेकर जाते हैं। जिससे इस ऐपण विधि को विदेशों में भी पहचान मिल रही है। विदेशी टूरिस्ट इसे काफी पसंद करते हैं और इन कलाकृतियों को विदेशों में भी मंगवाते हैं।
मुक्तेश्वर के एक छोटे से गांव से इस कला को सहेजने का प्रयास शुरू हुआ और आज विदेशी धरती तक इसकी धूम मच रही है। उत्तराखंड की इस बेटी की मेहनत तब रंग लाई जब इन कलाकृतियों ने संसद भवन की दीवारों को सजाया संवारा।
बना रोजगार का जरिया
हेमलता अपने गांव और स्थानीय महिलाओं को भी ऐपण विधि के गुण सिखा रही हैं और अब ये जो रोजगार का एक जरिया भी बन गया है। लोग उनके इस कला को काफी पसंद भी कर रहे हैं.












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