क्या चाचा संजय गांधी की तरह लाठियां खाकर राहुल कांग्रेस को फिर दिला पाएंगे सत्ता?

नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठाया है। राहुल गांधी के बजट चर्चा में शामिल नहीं होने पर भी सवाल उठाया गया है। कांग्रेस लगातार दो चुनाव हार कर वनवास भोग रही है। कांग्रेस के प्रदर्शन में गिरावट जारी है। निकट भविष्य में वह सत्ता के आसपास भी दिखायी नहीं दे रही। ऐसा नहीं है इसके पहले कभी कांग्रेस लोकसभा का चुनाव नहीं हारी। लेकिन इतनी बुरी स्थिति पहले कभी नहीं रही। 1977 में मटियामेट हुई कांग्रेस को संजय गांधी ने पुलिस की लाठियां खा कर तीन साल में ही फिर खड़ा कर दिया था। लेकिन राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस गिरने के बाद उठ ही नहीं पा रही। उनकी नेतृत्व क्षमता और कार्यशैली पर लगातार सवाल उठाया जा रहा है। यहां तक कि उन पर 'पार्ट टाइम पॉलिटिशियन’ होने का कटाक्ष किया जाता है। क्या राहुल गांधी अपने चाचा संजय गांधी की तरह संघर्ष का माद्दा दिखा पाएंगे ? क्योंकि संघर्ष और आंदोलन ही वापसी का रास्ता है।

अंधेरे के बाद उजाला
1977 में जब कांग्रेस पहली बार सत्ता से बेदखल हुई थी तब उसके सामने अंधेरा ही अंधेरा था। संजय ब्रिगेड के अत्याचारों के खिलाफ लोगों में इतना गुस्सा था कि कांग्रेस की कहानी खत्म ही लगती थी। उस समय यही कहा जाता था कि संजय गांधी के चलते ही इंदिरा गांधी की सत्ता चली गयी। लेकिन उसी संजय गांधी ने फिर ऐसा जुझारू संघर्ष किया कि 1980 में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गयी। 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में एक चर्चा के दौरान इंदिरा गांधी से कहा था, "अगर आज आप सत्ता में हैं तो इसकी वजह हैं संजय गांधी। संजय गांधी ने जनता सरकार के खिलाफ गली-कूचों में आंदोलन किया, लाठियां खायीं और कांग्रेस को फिर से जिंदा कर दिया।" हार और जीत राजनीति का हिस्सा है। लेकिन हार को जीत में कैसे बदला जाय यह किसी दल के नेता की योग्यता पर निर्भर करता है। क्या राहुल गांधी अपने चाचा की तरह जुझारू राजनीति कर पाएंगे ?

राजनीतिक अदावत और संघर्ष
1977 में इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन से त्राहिमाम कर रही जनता ने कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। इमजेंसी के दौरान इंदिरा सरकार ने विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल कर बहुत यातना दी थी। जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो राजनीतिक अदावत की एक नयी कहानी शुरू हुई। उस समय संजय गांधी को इमरजेंसी का खलनायक कहा जाता था। चरण सिंह उस समय गृहमंत्री थे। कहा जाता है कि चरण सिंह ने इंदिरा गांधी और संजय गांधी के खिलाफ बदले की भावना के तहत कार्रवाई की थी। 1977-79 के बीच संजय गांधी को आरोपी के रूप में कई बार शाह कमिशन के सामने पेश होना पड़ा था। 1979 में संजय गांधी को छह बार जेल जाना पड़ा। फिल्म किस्सा कुर्सी के मामले में दो साल जेल की सजा हुई। इंदिरा गांधी भी दो बार गिरफ्तार हुईं। लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने इन गिरफ्तारियों को मौके के रूप में भुनाया।

संजय गांधी की लाठियों से पिटाई
2 मई 1979 को द स्टेट्समैन अखबार के कोलकाता संस्करण में एक तस्वीर प्रकाशित हुई थी। इस तस्वीर में संजय गांधी अपनी पीठ पर लाठियों से निशान दिखा रहे थे। उनका कहना था कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान उनकी बेरहमी से पिटाई की थी। इस तस्वीर के छपने के बाद भूचाल आ गया। एक पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र की इतनी निर्ममता से पिटाई, चर्चा का विषय बन गयी। लोगों की सहानुभूति कांग्रेस से जुड़ने लगी। जनता सरकार पर पक्षपात का आरोप लगने लगा। इस संबंध में चर्चित पत्रकार राशिद किदवई ने लिखा है, कांग्रेस के दो तत्कालीन सांसदों एम अरुणाचलम और के रामलिंगम ने घटना के दिन सुना था कि दिल्ली के तत्कालीन डिप्टी पुलिस कमिश्नर पीएस बरार कैसे संजय गांधी पर चिल्ला रहे थे। बरार ने संजय गांधी पर चिल्लाते हुए कहा था, मैं तुम्हें बताता हूं कि नेता कैसे बनते हैं। इसके बाद संजय गांधी लाठी से बचने के लिए भागने लगे। संजय गांधी की पीठ पर लाठियों के निशान सार्वजनिक होने से सबको ये बात मालूम हो गयी। संजय गांधी ने निडर होके परिस्थितियों का सामना किया।

संजय राजनीति में भी निपुण
संजय गांधी पर अनगिनत आरोप हैं। विरोधी उन्हें उन्हें बिगड़ैल और निरंकुश कहते थे। लेकिन संजय गांधी में कुछ गुण भी थे जिसकी वजह से कांग्रेस फिर सत्ता में आयी। संजय गांधी स्वभाव से निडर थे। उन्होंने जनता पार्टी को तोड़ने के लिए उसी चरण सिंह को मोहरा बनाया जिनकी वजह से उन्हें और इंदिरा गांधी को जेल जाना पड़ा था। ये बिल्कुल अनोखी चाल थी। चरण सिंह, संजय गांधी की कूटनीति में फंस कर मोरारजी सरकार को गिराने के लिए राजी हो गये। कांग्रेस के सहयोग से चरण सिंह ने प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा कर लिया। जनता पार्टी को तोड़ कर संजय गांधी ने पहले मोरार जी देसाई की सरकार गिरायी फिर कुछ दिनों के बाद समर्थन वापस लेकर चरण सिंह की भी विदाई तय कर दी। चरण सिंह की सरकार एक महीने में ही गिर गयी। संजय गांधी ने अपने दुश्मन को ही दोस्त बना कर जनता पार्टी तो तिनके की तरह बिखेर दिया। चरण सिंह सरकार गिरने के कारण लोकसभा का मध्यावधि चुनाव अपरिहार्य हो गया। 1980 में चुनाव हुआ तो कांग्रेस फिर सत्ता में आ गयी। क्या राहुल गांधी अपने चाचा के कारनामा को दोहरा पाएंगे ?












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