महाराष्ट्र सरकार की इस चाल में क्या फंस जाएंगे पीएम मोदी और शाह ?

Will PM Modi and Shah Get Caught By Census Proposal of Maharashtra Government?महाराष्‍ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की महाअघाडी सरकार ने पिछले दिनों अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की जनगणना कराने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित करा दिया है। ऐसे में मोदी और शाह की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है, जानें कैसे

बेंगलुरु। महाराष्‍ट्र की महाअघाडी सरकार के द्वारा हाल ही में लिए गए एक फैसले के कारण प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी और भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। महाराष्‍ट्र की सत्ता पर काबिज शिवसेना समेत कांग्रेस और एनसीपी इस समय भाजपा पर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। पहले नागरिकता संशोधित कानून और एनआरसी का विरोध कर रही थी और अब उन्‍होंने पीएम मोदी और अमित शाह को घेरने की नयी साजिश रची है। मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई रार और काफी समय तक चली उठापटक के बाद कांग्रेस और मराठा क्षत्रप शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली शिवसेना ने अब पिछड़ा कार्ड खेल दिया है।

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बता दें महाराष्‍ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की महाअघाडी सरकार ने पिछले दिनों अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की जनगणना कराने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित करा दिया है। महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष और कांग्रेस नेता नाना पटोले ने जाति जनगणना कराने को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया। जाति जनगणना के प्रस्ताव को सभी दलों को एक स्वर में समर्थन करना पड़ा और एकमत से प्रस्ताव पारित हो गया।

1931 में आखिरी बार हुई थी जातीय जनगणना

1931 में आखिरी बार हुई थी जातीय जनगणना

गौरतलब है कि देश में लंबे समय से जातीय जनगणना की माँग होती रही है। देश में अंतिम बार जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई थी। उसी आधार पर मंडल कमीशन ने अनुमान लगाया था कि देश की 52 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्ग की है।इसके अलावा 17 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति और 7.5 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति की मानी जाती है। कमीशन ने सिफ़ारिश की थी कि जातीय जनगणना कराई जाए, जिससे सही संख्या और सामाजिक-शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति के सटीक आँकड़े आ सकें और देश के इस बड़े वर्ग के उत्थान के लिए लक्षित क़दम उठाए जा सकें। इसमें ओबीसी की संख्या बढ़ने की संभावना है क्योंकि तमाम जातियों को समय-समय पर सामान्य से ओबीसी वर्ग में शामिल किया जाता रहा है। अगली जनगणना होने को है। सरकार पर दबाव बन रहा है कि जातीय जनगणना कराई जाए, वहीं वह रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस तैयार कराने की घोषणा कर चुकी है। मौजूदा नीति में भारत की जनगणना में जाति संबंधी जनगणना का प्रावधान नहीं है।

विधानसभा के अध्यक्ष पटोले ने कहा ओबीसी जनसंख्‍या के आंकडे जरुरी

विधानसभा के अध्यक्ष पटोले ने कहा ओबीसी जनसंख्‍या के आंकडे जरुरी

मोदी सरकार पर आरोप है कि 2021 में होने वाली जनगणना में जातिगत जनगणना नहीं करवा जाएगा। ऐसे में महाराष्ट्र विधानसभा की ओर से जाति जनगणना कराए जाने का प्रस्ताव पारित कराया जाना अहम है। महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष पटोले जो कि स्‍वयं कुर्मी जाति के है जो ओबीसी कैटेगरी में आते हैं। उन्होंने इस मामले को स्वतः संज्ञान में लेते हुए जाति जनगणना का प्रस्ताव पेश किया और कहा 2021 की जनगणना में इसे शामिल किया जाना चाहिए। ओबीसी जनसंख्या के आँकड़े ज़रूरी हैं, ताकि उन तक विकास का लाभ पहुँचाया जा सके।

भुजबल साध रहे एक तीर से दो निशाने

भुजबल साध रहे एक तीर से दो निशाने

एनसीपी के नेता जो कि वर्तमान सरकार में पीडब्लूडी मंत्री है वह भी ओबीसी है और अपनी पार्टी के ओबीसी के बड़े चेहरे के रुप में पहचान रखते हैं। भुजबल ने प्रस्ताव का समर्थन किया। रोचक बात ये है कि छगन भुजबल महाराष्ट्र की पिछली बीजेपी सरकार के लगातार निशाने पर रहे और विभिन्न मामलों में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था और क़रीब 2 साल तक जेल में रहकर उच्च न्यायालय के आदेश पर रिहा हुए। भुजबल के कार्यकाल में महाराष्ट्र सदन पर 50 करोड़ रुपये के निर्माण का बजट रखा गया था, जिसका बजट बढ़कर 152 करोड़ रुपये हो गया था। इसे भुजबल का भ्रष्टाचार मान लिया गया और उसकी जांच करवायी गयी। अब जब दोबारा वह महाराष्‍ट्र सरकार में उनकी पार्टी शामिल है तो वह एक तरफ जहां भाजपा से अपनी पुरानी रंजिश का हिसाब चुक्ता करना चाहते हैं वहीं ओबीसी वोटरों के दिल में अपनी जगह और मजबूत बनाने की फिराक में हैं।

फडणवीस को इसलिए करना पड़ा समर्थन

फडणवीस को इसलिए करना पड़ा समर्थन

बता दें 2018 के महाराष्‍ट्र क विधानसभा चुनाव में ओबीसी मतदाताओं का बड़ा तबक़ा विपक्ष के पाले में चला गया। वर्तमान समय में महाराष्ट्र में ओबीसी मतदाताओं को अपने पाले में खींचने की लड़ाई चल रही है। पटोले ने जब जाति जनगणना का प्रस्ताव रखा तो बीजेपी नेता और महाराष्‍ट्र के पूर्व सीएम देवेन्‍द्र फडणवीस को भी उसका समर्थन करना पड़ा क्योंकि वह अपने ओबीसी नेताओं को नाराज तो नहीं कर सकते थे। गौरतलब है कि महाराष्‍ट्र बीजेपी में गोपीनाथ मुंडे, एकनाथ खडसे और विनोद तावड़े प्रमुख ओबीसी नेता थे, माना जाता है कि ये बड़े पैमाने पर ओबीसी वोटरो का वोट बीजेपी में लेकर आए। इनके अलावा पटोले भी बीजेपी में रहते हुए ओबीसी मसलों को प्रमुखता से उठाते रहते थे। पार्टी ने न सिर्फ़ एक ब्राह्मण नेता देवेंद्र फडणवीस को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया, बल्कि ओबीसी नेताओं को पूरी मलाईदार पदों से दूर रखा।

महाराष्‍ट्र सरकार ने गेंद केंद्र के पाले में डाली

महाराष्‍ट्र सरकार ने गेंद केंद्र के पाले में डाली

इस प्रस्‍ताव के पेश होने के समय केवल शिवसेना के ब्राह्मण नेता और संसदीय कार्यमंत्री अनिल परब ने दबाव बनाया कि एडवाइज़री कमेटी द्वारा पारित प्रस्तावों को ही विचारार्थ लाया जाना चाहिए। लेकिन पटोले ने ज़ोरदार तरीक़े से प्रस्‍ताव को खारिज कर दिया और कहा कि जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अगर अब कमेटी में इस मसले को लाकर बजट सत्र में प्रस्ताव पेश किया जाता है तो बहुत देर हो जाएगी। स्पीकर पटोले ने कहा कि नई जनगणना साल 2021 में होनी है। ओबीसी की जनसंख्या कितनी है, इस आंकड़े की जरूरत है। इससे विकास का लाभ उन तक पहुंचाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में ओबीसी से जुड़े कई प्रतिनिधिमंडलों ने उनसे मुलाकात कर यह मांग की थी।

स्पीकर पटोले ने कहा कि ओबीसी की जनसंख्या से जुड़े आंकड़े को जाति आधारित जनगणना के लिए सदन प्रस्ताव पारित कर सकता है। महाराष्ट्र सरकार ने अब ऐसा करके अब गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है ओबीसी तबक़े का हितैशी होने का दावा करने वाली बीजेपी अब फँसी हुई नज़र आ रही है।

जातिगत जनगणना करवाने से डरती हैं सरकार

जातिगत जनगणना करवाने से डरती हैं सरकार

मालूम हो कि सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ न पाने वाला तबक़ा लंबे समय से यह कहता रहा है कि कुछ जातियाँ ऐसी हैं, जिन्हें पर्याप्त भागीदारी मिल गई है, वे अमीर हैं, इसके बावजूद आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। हालाँकि इसका कोई ठोस आँकड़ा नहीं है कि वह ऐसी बातें किस आधार पर कहता है। वंचित जातियों की यह लंबे समय से माँग रही है कि जाति आधारित जनगणना कराई जाए और अगर सचमुच देश के संसाधनों, सरकारी व निजी नौकरियों, शिक्षा, न्यायपालिका आदि में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिल गया है तो उन्हें आरक्षण से वंचित किया जाए। और अगर संसाधनों में प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो उन्हें अतिरिक्त संरक्षण देकर एक सामान्य जीवन स्तर पर लाने का इंतज़ाम किया जाए। ऐसा करने से हमेशा से सरकारें डरती रही हैं। बीजेपी भी इसका समर्थन करती नज़र नहीं आती।

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