क्यों ममता बनर्जी और शरद पवार की मुलाकात से 2024 के लिए तय होगा कांग्रेस का रास्ता ?

नई दिल्ली, 1 दिसंबर: बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और एनसीपी चीफ शरद पवार की मुंबई में मुलाकात पर ना सिर्फ भाजपा की नजर लगी है, बल्कि यह कांग्रेस के भविष्य के लिए भी अहम है। देश में जब से भाजपा का प्रभाव बढ़ा है, उसके विरोध में तमाम पार्टियां किसी न किसी रूप में एक तरफ खड़ी हो गई हैं। ना तो कांग्रेस और लेफ्ट की दूरी रह गई है और ना ही कांग्रेस-विरोध की पुरानी वाली राजनीति का कोई खास वजूद नजर आता है। क्योंकि, दो दशक पहले जो कांग्रेस की स्थिति थी, वही आज भारतीय जनता पार्टी की हो चुकी है। उसने कश्मीर से लेकर अंडमान तक और कच्छ से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम किया है। अबतक उसे चुनौती देने की अगुवाई खुद-ब-खुद कांग्रेस करती थी, लेकिन बंगाल चुनाव में बीजेपी के खिलाफ मिली कामयाबी के बाद टीएमसी वह जगह लेना चाहती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 2024 के लिए कांग्रेस का रास्ता किस ओर से निकलता दिख रहा है?

ममता-पवार मुलाकत कांग्रेस के लिए क्यों है अहम ?

ममता-पवार मुलाकत कांग्रेस के लिए क्यों है अहम ?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले से तय कार्यक्रमों के तहत मुंबई पहुंचकर अपनी सियासी रणनीति साधने में लगी हैं। बुधवार को एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से मुलाकात से पहले मंगलवार को वो उनकी पार्टी के नेता संजय राउत और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे से मिल चुकी हैं। उनका उद्धव से भी मिलने का कार्यक्रम था, लेकिन फिलहाल उनके अस्पताल में होने से यह संभव नहीं हो पाया है। लेकिन, असल मसला है एनसीपी चीफ से उनकी मुलाकात है, जिसको लेकर जितनी वो उत्साहित हैं, उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस का गला सूख रहा है। पिछले कुछ दिनों से टीएमसी का जो रोल रहा है, उससे साफ है कि वह कांग्रेस की पिच्छलग्गू बनकर नहीं रहना चाहती। पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर अपनी यह लाइन स्पष्ट कर दी है। यानी तृणमूल ममता बनर्जी को 2024 में मोदी-विरोधी चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती है। ऐसे में पवार जो कि पहले से कहते रहे हैं कि बिना कांग्रेस को साथ लिए बीजेपी-विरोधी मोर्चा संभव नहीं है, उनसे मुलाकात काफी मायने रखता है।

ममता-पवार मुलाकात से पहले क्या हुआ ?

ममता-पवार मुलाकात से पहले क्या हुआ ?

गौर करने वाली बात है कि कांग्रेस ममता की मुहिम से जितनी उनसे नाराज नहीं है, उससे ज्यादा उनके चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को पानी पी-पी कर कोस रही है। महाराष्ट्र कांग्रेस के महासचिव जाकिर अहमद ने ईटी से कहा भी है, 'राहुल गांधी मोदी-शाह और बीजेपी-आरएसएस से लड़ रहे हैं और ममता बनर्जी कांग्रेस से भिड़ रही हैं। इससे सिर्फ बीजेपी को फायदा होगा। अपने राजनीतिक सामर्थ्य को लेकर उनका खुद का आकलन गलत है। राजनीति समझने के लिए उन्हें प्रशांत किशोर जैसे सियासी नौसिखिए से पाठ पढ़ना बंद करना पड़ेगा।' यहां यह बताना जरूरी है कि ममता अगर पवार से मुलाकात के लिए मुंबई पहुंचीं हैं तो कुछ महीने पहले पीके भी दो-तीन बार मराठा नेता से मिल आए थे। वही नहीं टीएमसी नेता यशवंत सिन्हा भी एनसीपी सुप्रीमो से मिल चुके हैं और उसके बाद ममता ने उनसे मिलना पक्का किया है।

क्या शरद पवार पहले वाली लाइन से पीछे हटेंगे ?

क्या शरद पवार पहले वाली लाइन से पीछे हटेंगे ?

ममता बनर्जी की शरद पवार से मुलाकात को कांग्रेस के लिए किस नजरिए से देखना चाहिए, इस सवाल को लेकर वनइंडिया ने वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार से बात की। उन्होंने कहा है, "भारतीय राजनीति में तीन धड़े चलते हैं.... शरद पवार ये कह चुके हैं, बार-बार कह चुके हैं कि कांग्रेस के बगैर वैकल्पिक स्थिति अभी तैयार नहीं है.... शरद पवार मैच्योर आदमी हैं...वे ये नहीं कहते कि हो नहीं सकता, लेकिन कहते हैं कि अभी परिस्थिति नहीं है। वह खुद के बारे में भी कहते हैं कि हम प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, क्योंकि हमारी उतनी संख्या या प्रभाव नहीं है। अब ममता बनर्जी जो मुहिम शुरू कर रही हैं, सूत्रधार के रूप में उभर कर सामने आ रही हैं तो ये नॉन कांग्रेस-नॉन बीजेपी वाली बात है....यह जैसे ही आता है तो एक टर्म आता है तीसरा मोर्चा...थर्ड फ्रंट।" लेकिन, कुछ महीने पहले खुद प्रशांत किशोर इस संभावना को खारिज कर चुके हैं। उन्होंने एक चैनल से कहा था, 'मुझे नहीं लगता कि कोई तीसरा या चौथा मोर्चा मौजूदा सरकार के खिलाफ सफल चुनौती पेश कर सकता है।'

क्या ममता के नेतृत्व में काम करेंगे पवार ?

क्या ममता के नेतृत्व में काम करेंगे पवार ?

ममता बनर्जी की पार्टी सिर्फ यह कह रही है कि वह किसी के (कांग्रेस) पीछे नहीं चलेगी। वह यह नहीं कह रही है कि कोई (कांग्रेस) उसके पीछे नहीं चल सकता। टीएमसी की यह लाइन और पवार की बिना कांग्रेस के भाजपा-विरोधी विकल्प नहीं वाली लाइन को मिलाएं तो एक विकल्प यही उभरता है कि मराठा नेता कांग्रेस नेतृत्व को मोदी-विरोधी सशक्त विपक्षी एकता के लिए राजी करने की कोशिश करें! लेकिन, यहां दो प्रश्न खड़े होते हैं। पहला, क्या कांग्रेस आलाकमान इसके लिए तैयार होगा ? दूसरा, क्या पवार ममता के नेतृत्व में काम करने के लिए राजी होंगे ? एक कांग्रेस सूत्र का कहना है कि 'हमें लगता है कि पवार को ममता-बनर्जी की अगुवाई वाले गठबंधन में संयोजक या अध्यक्ष का पद ऑफर किया जा सकता है।' कांग्रेस खेमे में यह भी चर्चा है कि ममता ने पवार को राजी किया तो वह शिवसेना को भी आसानी से भाजपा-विरोधr मोर्चे में जोड़ सकते हैं। यानी कांग्रेस पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या ममता बनर्जी की लीडरशिप में चलेगी कांग्रेस ?

क्या ममता बनर्जी की लीडरशिप में चलेगी कांग्रेस ?

तृणमूल कांग्रेस ने हाल के समय में जिस तरह से कांग्रेस को कमजोर किया है, उसके बाद पार्टी ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी है। ममता की पार्टी गोवा विधानसभा चुनाव में खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है तो कांग्रेस ने मंगलवार को गोवा फॉर्वर्ड पार्टी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान करके अपना इरादा साफ कर दिया है। हालांकि, पार्टी नेता और बंगाल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के अलावा टीएमसी सुप्रीमो के खिलाफ सीधा और तल्ख अंदाज में अभी भी कोई कुछ नहीं बोल रहा है। लेकिन, दिल्ली पहुंचने की ममता की जल्दीबाजी पर कांग्रेस कब तक चुप रहेगी यह बड़ा सवाल है! वनइंडिया से बातचीत में प्रेम कुमार ने कहा है, "राजनीतिक रूप से देखा जाए तो देश में जो सब से ज्यादा प्रभाव वाले लोग हैं तो वो बीजेपी के बाद दूसरी पार्टी कांग्रेस के साथ हैं...इन दोनों को छोड़कर तीसरा विकल्प आज भी दूर की कौड़ी है, जो न तो पिछलीबार चंद्रबाबू नायडू कर पाए थे और ना ही इसबार ममता बनर्जी कर पाएंगी।" यानी फिलहाल तक तो यही लग रहा है कि पवार और ममता के बीच चाहे जो भी खिचड़ी पके, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ममता बनर्जी की लीडरशिप मानने के लिए राजी हो जाएगा, इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं नजर आती है।

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो देश में जो सबसे ज्यादा प्रभाव वाले लोग हैं तो वो बीजेपी के बाद दूसरी पार्टी कांग्रेस के साथ हैं...इन दोनों को छोड़कर तीसरा विकल्प आज भी दूर की कौड़ी है, जो न तो पिछलीबार चंद्रबाबू नायडू कर पाए थे और ना ही इसबार ममता बनर्जी कर पाएंगी-प्रेम कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

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