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इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शुक्ला से काम क्यों छीना गया?

किसी न्यायाधीश को 90 दिनों की छुट्टी पर भेजा जाना और उनसे अदालत का काम छीन लिया जाना मामूली बात नहीं होती.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस श्रीनारायण शुक्ला को पिछले कई दिनों से किसी भी मुक़द्दमे की सुनवाई का काम नहीं दिया गया है.

दरअसल जस्टिस शुक्ला ने उत्तर प्रदेश में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के दाख़िले में हुए कथित घोटाले से जुड़े एक मामले पर फ़ैसला सुनाया था. पर ये फ़ैसला ख़ुद उन पर ही भारी पड़ गया.

आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की आंतरिक जाँच के आदेश दिए.

आंतरिक जांच में इस फ़ैसले को न्यायिक मानदंडों के हिसाब से अनैतिक पाया गया. ये मामला लखनऊ के जीसीआरजी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस में हुई कथित गड़ब़ड़ी से जुड़ा था.

जांच के बाद जस्टिस श्रीनारायण शुक्ला को सभी न्यायिक कामों से फ़ारिग कर दिया गया. चीफ़ जस्टिस की इस कार्रवाई के बाद जस्टिस शुक्ला ने छुट्टी की अर्ज़ी लगाई.

सुप्रीम कोर्ट के हवाले से ये ख़बरें आईं, "इस्तीफ़ा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने से जस्टिस शुक्ला के इनकार के बाद चीफ़ जस्टिस ने उन्हें पद से हटाए जाने की सिफारिश की है."

सुप्रीम कोर्ट
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क्या है मामला?

जीसीआरजी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस का मामला प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट वाले चर्चित आपराधिक मामले से अलग है.

उसमें प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले की सीबीआई जांच कर रही है और इस मामले में जाँच एजेंसी जस्टिस शुक्ला का नाम भी एफ़आईआर में दर्ज करना चाहती थी.

मगर भारत के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी.

आपकी जानकारी के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया गहन जाँच के बाद प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में हुए दाख़िलों पर रोक लगा चुकी है. प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट और जीसीआरजी मेडिकल कॉलेज भी इनमें से थे.

दोनों मामले जब हाई कोर्ट गए तो जस्टिस शुक्ला की कोर्ट ने इन पर फ़ैसला दिया था और इस समय दोनों मामलों की अपील सुप्रीम कोर्ट में चीफ़ जस्टिस की कोर्ट में होनी है.

क्या ये है जजों के 'बग़ावत' करने की असली वजह?

इलाहाबाद हाई कोर्ट
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इलाहाबाद हाई कोर्ट

देश के सभी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए 2017-18 के सत्र में सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त की डेडलाइन तय की थी.

लेकिन एक सितंबर को जस्टिस शुक्ला और जस्टिस वीरेंद्र कुमार की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को दरकिनार करते हुए जीसीआरजीआईएमएस में इच्छुक छात्रों के दाखिले के लिए मेडिकल काउंसिल और राज्य सरकार को मंज़ूरी देने को कहा.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ चार सितंबर को जस्टिस शुक्ला ने अपने इसी फ़ैसले में हाथ से करेक्शन करके नई डेडलाइन पाँच सितंबर तय कर दी.

लेकिन 23 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एमसीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया.

साथ ही जीसीआरजीआईएमएस पर 25 लाख का जुर्माना लगाया और यहां तक कि कॉलेज से दाखिला लेने वाले हर छात्र को उनकी फ़ीस के अलावा 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने को कहा गया.

कौन हैं जस्टिस शुक्ला?

साल 1983 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने वाले जस्टिस शुक्ला ने लंबे समय तक दीवानी मुक़दमों में पैरवी की है.

अक्टूबर, 2005 में उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट में एडिशनल जज बनने का मौका मिला और दो साल बाद 10 अगस्त, 2007 को उन्हें स्थाई जज के तौर पर शपथ दिलाई गई.

हालांकि उनके सेवानिवृत्त होने की तारीख़ 17 जुलाई 2020 है, लेकिन चीफ़ जस्टिस की सिफ़ारिश के बाद ये लगता नहीं कि वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे.

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