भारत की जीडीपी में बड़ा उछाल भी चिंताजनक क्यों?

निर्मला सीतारमण
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निर्मला सीतारमण

इस साल अप्रैल से जून के बीच भारत की जीडीपी में 20.1 फ़ीसदी का उछाल आया है. यह भारत में ग्रोथ का नया रिकॉर्ड भी है और इस बात का संकेत भी कि भारत अब दुनिया में सबसे तेज़ रफ़्तार से ग्रोथ की तरफ़ बढ़ रहा है.

कोरोना की मार से बदहाल अर्थव्यवस्था के लिए, कोरोना से परेशान आम आदमी के लिए और देश की सरकार के साथ शेयर बाज़ार के लिए भी यह एक बड़ी ख़ुशख़बरी है.

यह ख़ुशख़बरी अचानक नहीं आई है. तमाम अर्थशास्त्री महीनों से बता रहे थे कि ऐसी ही ख़बर आनेवाली है. ज़्यादातर अनुमान यही थे कि यह आँकड़ा 18 से 22 फ़ीसदी के बीच आएगा.

शेयर बाज़ार को तो इस आँकड़े का ऐसा इंतज़ार था कि वो पिछले कई दिनों से ही ऊपर की तरफ़ भागने में लगा था. आँकड़ा आने के बाद भी तेजड़िए बेलगाम भागते रहे और सेंसेक्स पहली बार 57 हज़ार 550 के पार पहुँच गया. निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही इंडेक्स रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुए हैं.

लेकिन बाज़ार की ख़ुशी के बावजूद सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अर्थव्यवस्था में या जीडीपी में इस तेज़ उछाल का मतलब सीधे-सीधे यह नहीं मान लेना चाहिए कि अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से पटरी पर आ रही है और कारोबार में तेज़ उछाल आ चुका है.

भारतीय अर्थव्यवस्था
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आंकड़ों को बताने की बाज़ीगरी

जीडीपी में तेज़ बढ़त के इस आँकड़े की सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले साल इसी तिमाही में देश की जीडीपी 24.4% कम हुई थी यानी देश बहुत बड़ी मंदी की चपेट में आया था. वहाँ से बीस फ़ीसदी के उछाल का भी मतलब यही है कि अभी यह पुराने स्तर से भी कुछ नीचे ही है.

यह चर्चा तो जीडीपी में बढ़त के आँकड़े पर चल रही है, लेकिन अगर ग्रोथ की असलियत को समझना हो तो यह देखना होगा कि भारत की जीडीपी यानी देश में होनेवाले कुल लेनदेन का आँकड़ा क्या है.

जीडीपी के आँकड़े की सरकारी विज्ञप्ति में ही बताया गया है कि पिछले साल अप्रैल से जून के बीच देश की जीडीपी 26.95 लाख करोड़ रुपए थी जो इस साल अप्रैल से जून की तिमाही में बीस परसेंट बढ़कर 32.38 लाख करोड़ हो गई है.

लेकिन यहाँ यह बात नहीं लिखी हुई है कि पिछले साल इस तिमाही की जीडीपी उसके पिछले साल के मुक़ाबले 24.4%कम थी. यानी 2019 में अप्रैल से जून के बीच भारत की जीडीपी थी 35.85 लाख करोड़ रुपए. इन तीन आँकड़ों को साथ रखकर देखें तब तस्वीर साफ़ होती है कि अभी देश की अर्थव्यवस्था वहाँ भी नहीं पहुँच पाई है, जहाँ अब से दो साल पहले थी.

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कंस्ट्रक्शन सेक्टर में कामयाबी

एक आँकड़ा और देखने लायक है. हालाँकि सरकार की तरफ़ से तिमाही दर तिमाही आँकड़े भी जारी नहीं होते हैं यानी इस तिमाही में पिछली तिमाही से तुलना नहीं की जाती. इसमें सरकार का कोई दोष नहीं है, अर्थशास्त्र में यह हिसाब एक साल पहले के आँकड़े से तुलना करके ही लगाया जाता है.

लेकिन फिर भी उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर यह जानकारी भी सामने आती है कि इसी साल जनवरी से मार्च के मुक़ाबले अप्रैल से जून के बीच तीन महीनों में उत्पादन में क़रीब 17 फ़ीसदी की गिरावट आई है. यानी हालात ऐसे नहीं हैं कि ढोल-नगाड़े पीटने शुरू कर दिए जाएं.

फिर इन आँकड़ो में ख़ुश होने वाली बात क्या है? तो ऐसी सबसे बड़ी ख़बर निर्माण क्षेत्र यानी कंस्ट्रक्शन सेक्टर में है, जहाँ पिछले साल इसी वक़्त क़रीब 50 फ़ीसदी की गिरावट आई थी. वहाँ इन तीन महीनों में 68.3% का उछाल आया है यानी यहाँ मंदी को पूरी तरह धोने में कामयाबी मिली है.

यह बड़ी ख़ुशख़बरी इसलिए भी है क्योंकि इस कारोबार में बहुत से लोगों को रोज़गार मिलता है और कंस्ट्रक्शन का काम तेज़ होने से लोहे, सीमेंट जैसी चीज़ों की खपत बढ़ने के साथ ही माल ढुलाई का काम बढ़ता है और उससे तमाम तरह के छोटे-बड़े धंधों को सीधे या परोक्ष रूप से फ़ायदा पहुँचता है.

इसी तरह का दूसरा तगड़ा उछाल मैन्युफै़क्चरिंग में है, जो पिछले साल अप्रैल से जून के बीच 36 फ़ीसदी की गिरावट के मुक़ाबले इस साल की इसी तिमाही में 49.6% बढ़ी है.

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चिंताएं कहां हैं?

मैन्युफै़क्चरिेंग यानी औद्योगिक उत्पादन भी रोज़गार बढ़ाने में मदद करता है और साथ ही उसमें बढ़त इस बात का भी संकेत है कि देश में ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ी है यानी अर्थतंत्र का चक्का चल रहा है.

अन्य कई सेक्टरों के आँकड़े कुछ कुछ बढ़े हैं, लेकिन वो उतना उत्साह नहीं जगाते. बल्कि यह चिंता ही बढ़ाते हैं कि जितनी तेजी से पिछले साल अर्थव्यवस्था सिकुड़ी थी उसमें उसी रफ़्तार से बढ़त नहीं हो रही है.

हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार ने जीडीपी के ताज़ा आँकड़ों के सहारे यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पिछले साल उन्होंने अर्थव्यवस्था में 'वी शेप' रिकवरी का जो दावा किया था वो सही साबित हो रहा है. लेकिन यह रिकवरी कितनी सच और कितनी काग़ज़ी है, ऊपर देखा ही जा चुका है. इसके साथ ही जिन अर्थशास्त्रियों ने 'के शेप' रिकवरी यानी कहीं ख़ुशी कहीं ग़म की आशंका जताई थी, उनकी चेतावनी भी सच होती दिख रही है.

जहाँ मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ उछाल दिख रहा है, वहीं सर्विसेज़ में बहुत हल्का सुधार है. यह भी चिंता की बात है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था अब बड़े पैमाने पर सेवा क्षेत्र या सर्विसेज़ पर टिकी हुई है.

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तीसरी लहर आई तो क्या होगा?

जीडीपी में सर्विस क्षेत्र का हिस्सा 50 फ़ीसदी से ऊपर है जबकि मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और साथ में बिजली, पानी, गैस और बाकी ज़रूरी सेवाओं को भी जोड़ दें तो उनका हिस्सा पच्चीस फ़ीसदी के आसपास ही पहुँचता है.

यहीं 'के शेप्ड' रिकवरी का एक दूसरा पहलू भी आता है. इस सरकार के राज में भारत में ग़रीब-अमीर की खाई बहुत तेज़ी से बढ़ी है. कोरोना संकट के बावजूद अमीरों की संपत्ति जिस तेज़ी से बढ़ी वो अपने आप में एक पहेली है.

पिछले साल मार्च के बाद से ही देश के 100 अरबपतियों की संपत्ति में 12 लाख 97 हज़ार 822 करोड़ का इज़ाफ़ा हो चुका है. अगर देश के 13 करोड़ 80 लाख सबसे ग़रीब लोगों में यही रक़म बाँटी जाती तो उनमें से हरेक को 94 हज़ार रुपए मिल सकते थे. यह आँकड़ा ऑक्सफै़म की इनइक्वलिटी वायरस रिपोर्ट में सामने आया है.

लेकिन जीडीपी में बढ़ोतरी यह भरोसा क्यों नहीं जगाते कि अर्थव्यवस्था में रिकवरी उसी तेज़ी से हो रही है, जिस तेज़ी से उसमें पिछले साल गिरावट आई थी, इसे समझने के लिए इन आँकड़ों में सबसे सटीक उदाहरण है, हमारे आपके घरों का ख़र्च यानी हाउसहोल्ड कंजंप्शन का आँकड़ा.

इस तिमाही में यह जीडीपी का 55.1% हिस्सा रहा है जबकि पिछले साल जिस वक़्त पूरा देश लॉकडाउन की चपेट में था और देश मंदी झेल रहा था तब भी भारत की जीडीपी में घरेलू खर्च का हिस्सा 55.4% था.

यानी इस मामले में हालात क़रीब-क़रीब वहीं हैं, जहाँ थे. हाँ पिछले साल इस तिमाही में सरकार का खर्च जीडीपी का 16.4% हिस्सा था जबकि इस बार जीडीपी में उसका हिस्सा 13 फ़ीसदी ही रह गया है.

यह दिखाता है कि सरकार के अलावा दूसरे लोगों का लेन-देन ज़्यादा बढ़ा है, जिसकी वजह से सरकारी खर्च की हिस्सेदारी कम हो गई है.

यह मानना चाहिए कि जीडीपी ग्रोथ का आँकड़ा शायद इससे कहीं बेहतर होता, अगर कोरोना की दूसरी लहर न आई होती. अब सबसे बड़ी फ़िक्र यह है कि कहीं तीसरी लहर आ गई तो रिकवरी का क्या होगा और इस वक्त शायद उसी मोर्चे पर सावधानी सबसे ज़रूरी है.

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