बच्चों के मामले में चीन की राह पर क्यों चल पड़े तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री?
Population Growth: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन दोनों ही अब अपने राज्य के युवा जोड़ों से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। देश में पिछले कई दशकों से 'हम दो, हमारे दो' वाली सोच को बढ़ावा मिल रहा था, लेकिन ये दोनों राज्य अब चीन की तरह आबादी बढ़ाने की बात करने लहे हैं। हालांकि, इन दोनों राज्यों का इरादा चीन की मजबूरियों से पूरी तरह से अलग है।
चीन अपनी वन चाइल्ड पॉलिसी (एक बच्चे वाली नीति) की वजह से आज बैकफुट पर है। वहां के युवा आज एक तरह से बच्चे पैदा करने से बचने लगे हैं। इसकी वजह से चीन की युवा आबादी तेजी से घट रही है। लोग जितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं, उनकी भरपाई उस पैमाने से युवाओं से नहीं हो रही है। चीन को डर है कि उसकी सेना इस तरह से तो कुछ वर्षों बाद 'बूढ़ों की फौज' बन जाएगी!

ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए छटपटा रहा है चीन
लिहाजा चीन अब युवा जोड़ों से कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की अपील कर रहा है। इसके लिए सरकारी स्तर पर बड़े पैमाने पर अभियान चलाए जा रहे हैं। जो चीन पहले कभी एक बच्चे की नीति को लेकर सख्त था, अब बच्चे पैदा करने वाले उम्र के युवाओं को तरह-तरह के प्रलोभन दे रहा है।
लेकिन, रिपोर्ट से पता चलता है कि अब वहां के युवाओं का बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी ही नहीं रह गई है। वह जीवन-यापन का खर्च बढ़ने और सोच में बदलाव की वजह से बच्चे पैदा करने से परहेज करने लगे हैं।
आबादी बढ़ाने की अपील कर रहे हैं आंध्र और तमिलनाडु के सीएम
लेकिन, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सरकारों के मुखिया की चिंता चीन से पूरी तरह से अलग है। ज्यादा बच्चे पैदा करने की इनकी बदली हुई सोच की वजह पूरी तरह से अलग है। आंध्र के सीएम नायडू का कहना है, 'एक समय, मैंने परिवार नियोजन अपनाने को कहा था, लेकिन अब मैं लोगों से अपील कर रहा हूं कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करके जनसंख्या बढ़ाएं।'
वहीं एक सामूहिक विवाह समारोह में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने नव दंपतियों को '16 बच्चे' पैदा करने का सुझाव देकर सबको चौंका दिया। वैसे यह तमिल संस्कृति से जुड़ा एक पारंपरिक आशीर्वाद है, लेकिन उनके मौजूदा बयान का संदर्भ राज्य के राजनीतिक और आर्थिक वजहों से जुड़ा हुआ है।
क्यों ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं नायडू और स्टालिन?
दरअसल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु समेत सभी दक्षिण भारतीय राज्यों को लग रहा है कि बढ़ती जनसंख्या पर सफल नियंत्रण की वजह से उन्हें राजनीतिक और आर्थिक तौर पर नुकसाने उठाना पड़ रहा है। इस वजह से ये अब जनसंख्या बढ़ाने की बात कहने लगे हैं। हालांकि,उनका यह दृष्टिकोण कितना वैज्ञानिक है, यह कहना बहुत मुश्किल है।
दोनों मुख्यमंत्रियों की पहली चिंता लोकसभा सीटों के संदर्भ में 2029 से पहले होने वाले संभावित परिसीमन को लेकर है। संभावना है कि इसके बाद लोकसभा की सीटों की मौजूदा संख्या 543 से बढ़कर 790 हो सकती है।
परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटों में बदलाव की क्या संभावनाएं हैं?
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी स्थिति में अगर जनसंख्या में बदलाव के आधार पर लोकसभा की सीटें तय की गईं और हर राज्य को प्रतिनिधित्व मिला तो, पांच दक्षिण भारतीय राज्यों की 23 सीटें कम हो सकती हैं। वहीं, यूपी, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीटों की संख्या में 35 की बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि इन पांच राज्यों में ही भारत की करीब आधी आबादी है।
अगर परिसीमन आयोग सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं करता तो भी जनसंख्या के आधार पर पांच दक्षिणी राज्यों की 25 सीटें घट सकती हैं और ज्यादा जनसंख्या वाले पांचों राज्यों के खाते में 33 सीटें अधिक जुड़ सकती हैं।
अगर परिसीमन आयोग तय करता है कि किसी भी राज्य की मौजूदा सीटों की संख्या कम नहीं होगी, लेकिन बड़ी आबादी वाले राज्यों को भी उसी के मुताबिक सीटें दी जाएंगी तो भी आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और तेलंगाना को जहां 23 सीटें ही और मिलेंगी और केरल की सीट 20 पर ही सीमित रहेगी। लेकिन, पांच बड़े राज्यों की सीटों की मौजूदा संख्या में 150 सीटों की बढ़ोतरी हो जाएगी।
केंद्रीय फंड में हिस्सेदारी घटने की चिंता!
जहां तक राज्यों की जनसंख्या और केंद्रीय फंड में उनकी हिस्सेदारी का सवाल है तो 13वें वित्त आयोग (2010-15) से लेकर 15वें वित्त आयोग (2021-26) की सिफारिशों के अनुसार दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी घटी जरूर है, लेकिन इसमें बिहार और यूपी जैसे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य भी शामिल हैं।
जैसे तमिलनाडु का शेयर इन दो वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार घटकर 5% से घटकर 4.1%, आंध्र का 6.9% से 4%, कर्नाटक का 4.3% से 3.6% और केरल का 2.3% से 1.9% हुआ है। वहीं यूपी का 19.7% से 17.9% और बिहार का 10.9% से 10.1% हुआ है। ज्यादा आबादी वाले राज्यों में सिर्फ मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और राजस्थान के केंद्रीय फंड में ही इजाफा हुआ है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें अगले वित्त वर्ष से लागू होनी हैं।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता का सच!
ऑटोमोबाइल से लेकर सॉफ्ट ड्रिंग, स्मार्ट फोन से लेकर कपड़े के उत्पादन में अगर दक्षिण भारत का बड़ा योगदान है तो उसकी खपत भी सबसे ज्यादा उत्तर भारतीय बाजारों पर ही निर्भर है, जिससे उनके राजस्व में बढ़ोतरी ही तो हो रही है।
यही नहीं दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए उत्तर भारत के ज्यादा आबादी वाले राज्य मजदूरों के आपूर्तिकर्ता का भी रोल निभा रहे हैं और ये मजदूर भी वहां जाकर उनके राजस्व में ही योगदान दे रहे हैं। इसलिए दक्षिण भारतीय राज्यों का आबादी बढ़ाने पर जो जोर है, उसके तात्कालिक फायदे तो हो सकते हैं, लेकिन लंबे समय में ज्यादा आबादी की जो परेशानियां बड़े राज्य झेल रहे हैं, उससे मुंह मोड़ना भी भारी जोखिम से कम नहीं है।
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