ब्राह्मण वैज्ञानिक को क्यों चाहिए ब्राह्मण नौकरानी?
पुणे में भारतीय मौसम विभाग की वैज्ञानिक मेधा खोले को जब अपनी 60 वर्षीय नौकरानी के बारे में यह पता चला कि वह ब्राह्मण नहीं हैं तब उनके ख़िलाफ़ पुलिस में धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला दर्ज कराया है.
एक पढ़ी-लिखी महिला ने दूसरी महिला के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की. उसकी यह ग़लती थी की वह भगवान को भोग चढ़ाने के लिए पात्र नहीं थी. यह ख़बर सुनकर मैं दंग रह गई.
एक महिला दूसरी महिला के बारे में ऐसा कैसे सोच सकती है. यह सवाल मेरे मन में घर कर गया. मुझे इस बात की हैरानी नहीं है क्योंकि मेरे यहां ऐसी बातें आम हैं. रिवाजों को धर्म से भी बढ़कर देखा जा रहा है. धर्म, धार्मिक भावनाएं रीति-रिवाजों से जुड़ी हुई हैं.
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रीति-रिवाज़ नहीं रह सकते
हम घर में अलग बर्ताव करते हैं और बाहर अलग. शिक्षा से आपके मन के दरवाज़े खुलने चाहिए पर अगर आपने आंखो पर पट्टी ही बांध रखी हो तो यह असंभव है. खुली सोच वाली शिक्षा महत्वपूर्ण है. अगर ऐसा हुआ तो ये चीज़ें कभी नहीं होंगी. मुझसे पूछें तो पुराने रीती-रिवाज़ और खुली सोच ये दोनो चीज़ें साथ में रह ही नहीं सकतीं.
धर्म, आध्यात्म और रीति-रिवाज़ परंपरा के बारे में चुप्पी साधना ही बेहतर है. ऐसा बहुत लोगों को लगता है. यह एक निजी बात है. यह भी मैं मानती हूं. पर समाज का हिस्सा होने के नाते इस पर बोलना मैं अनिवार्य समझती हूं. इस पर चर्चा होनी चाहिए.
धर्म और आध्यात्म जीवन का एक अंग है और यह निजी श्रद्धा का विषय है पर इससे कोई रीति-रिवाज़ों को जोड़ देता है तो यह एक सामाजिक समस्या बन जाती है क्योंकि रूढ़िवादी परंपराओं के बारे में आप सवाल ही नहीं उठा सकते.
और सच कहें तो ज़्यादा से ज़्यादा रीति-रिवाज़ महिलाओं के ख़िलाफ़ ही है. अगर पति का निधन हो जाता है तो महिला का अस्तित्व मानो ख़त्म ही हो जाता है. सुहागन नहीं है इसलिए किसी के ऊपर बहिष्कार डालना यह डरावनी बात है.
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समाज कैशलेस होने से पहले कास्टलेस हो
रहा सवाल जाति का. मुझे लगता है की समाज कैशलेस होने से पहले कास्टलेस होना ज़रूरी है. जात-पात मानो सभी के ख़ून में ही है. यह भी कड़वा सच है.
हर जगह आपको आपकी जात बतानी पड़ती है. आपके कुलनाम से ही लोग आपकी जाति का अंदाज़ा लगाते हैं और आपके साथ कितने संबंध बनाने हैं उस पर विचार करते है. जाति को ख़त्म करने के लिए आधार नंबर बताना पड़ेगा क्या?
'जाति को ख़त्म करो' कहने वाले भी आरक्षण के मुद्दे में उलझ गए हैं. किसी की तरफ़ आदर भाव से देखा जा सके ऐसे नेता भी आज कल नहीं रहे. उसी वजह से समाज में परिवर्तन नहीं हो रहा.
समाज का नेतृत्व धर्म के ठेकेदारों के हाथ में चला गया है. धर्म के नाम पर लोगों को इकठ्ठा करके बहिष्कार कर डाला जाता है. इसलिए इस पर चुप बैठना अनुचित है. इस पर चर्चा होनी चाहिए.
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