ऐसा क्या हुआ कि अचानक अंग्रेजी के मुरीद हो गये राहुल गांधी
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। राहुल गांधी कल कांग्रेस के मंच से पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर अंग्रेजी की वकालत करते रहे। मौका था पंडित नेहरु की याद में आयोजित कार्यक्रम। बहुत से लोगों को यह समझ नहीं आया कि वे अंग्रेजी के पक्ष में इतना खुलकर क्यों बोल रहे हैं। वहां पर उपस्थित एक कांग्रेसी नेता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि राहुल का अंग्रेजी जुबान के हक में अकारण बोलने से साबित हो गया कि उन्हें देश के बारे में कोई जानकारी नहीं।

वरिष्ठ लेखक और पत्रकार अवधेश कुमार ने कहा कि मैंने अपने जीवन में इस तरह किसी नेता को अंग्रेजी की वकालत करते तथा अंग्रेजों के जाने के बाद उस विरासत को बचाने की अपरिहार्यता बताते और वह भी पार्टी मंच से नहीं सुना था। अगर कांग्रेस की यही सोच है तो फिर देश के उन सारे लोगों को, जिनको अपनी मातृभाषा से प्रेम है, जो हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलाना चाहते हैं, जो हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के समन्वय की मणिका माला बनाकर देश की सोच और अभिव्यक्ति को स्वाभाविक सौंदर्य देना चाहते हैं, जो अंग्रेजी के वर्चस्व का हर हाल में अंत करने की चाहते रखते हैं.... उन्हें सोचना पड़ेगा कि राजनीति में उनका हस्तक्षेप किधर होगा।
चारों तरफ हो रहा राहुल गांधी का विरोध
हिन्दी और पंजाबी के कथाकार डा. प्रताप सहगल ने भी राहुल गांधी के अंग्रेजी की वकालत करते बयान की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह निंदनीय वक्तव्य था। इसका हर स्तर पर पुरजोर विरोध होना चाहिए। कांग्रेस, स्वयं हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत करने वाली पार्टी थी। वे सूचना क्षेत्र में रोजगार की बात कर रहे थे ।
अवधेश कुमार ने सवाल किया कि भाषा और देश के संस्कार से बड़ा किसी नेता की सोच में कुछ नौकरियां हो और उसके लिए गुलामी की भाषा को अनिवार्य बनाए रखने की वकालत करे तो फिर उसके साथ देश को कैसा व्यवहार करना चाहिए यह देशवासी तय करें। कांग्रेस के उपाध्यक्ष जिस तरह अंग्रेजी की वकालत कर रहे थे, वह शर्मनाक था।












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