जानिए, कैसे मुलायम का किला ही महागठबंधन को सबसे बड़ी चुनौती दे रहा है?

नई दिल्ली- अगर 2019 में नरेंद्र मोदी को सबसे बड़ी चुनौती कोई दे रहा है, तो वह है उत्तर प्रदेश में बुआ और बबुआ का महागठबंधन। हालांकि, बीजेपी और उसके अध्यक्ष अमित शाह इस बार भी 2014 जैसा प्रदर्शन दोहराने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आते हैं। वो तो बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि यूपी में भाजपा को पिछली बार की 73 के बदले 74 सीट तो मिल सकती है, लेकिन 72 पर भी सिमट जाने की कोई गुंजाइश नहीं है। इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि 2014 में अगर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक पंडितों के कयासों की हवा निकाल दी थी, तो उसके पीछे अमित शाह का सियासी दिमाग था। इसलिए, अमित शाह की बातों को सिरे से खारिज करने के बजाय इस लाइन पर भी विश्लेषण करने की दरकार है कि क्या मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के बीच उन्हें मुलायम परिवार से ही अंदरूनी सहयोग मिलने की उम्मीद तो नहीं है?

मुलायम के गढ़ में खलबली के संकेत को समझिए

मुलायम के गढ़ में खलबली के संकेत को समझिए

समाजवादी पार्टी की धुरी मुलायम सिंह को मैनपुरी से टिकट देने की घोषणा उस वक्त हुई, जब वहां समाजवादी पार्टी के भीतर ही घमासान मचा हुआ था। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबरों के मुताबिक वहां से मौजूदा सांसद तेज प्रताप यादव का टिकट कटने की खबर ने सियासी भूचाल पैदा कर दिया। उनके गुस्साए समर्थकों ने पार्टी महासचिव और अखिलेश यादव के करीबी चाचा रामगोपाल यादव के पुतले भी फूंके। स्थिति ऐसी थी कि मुलायम को मैनपुरी से टिकट की घोषणा से ठीक पहले वहां की 51-सदस्यीय जिला इकाई भंग करनी पड़ गई। बाद में तेज प्रताप ने कहा कि ये उनके समर्थकों का गुस्सा था और उन्हें पड़ोस की किसी सीट से टिकट मिलने का भरोसा है। सवाल उठता है कि अगर सब कुछ इतना ही सहज है, तो क्या दूसरी सीट पर परिवार के दूसरे दावेदार उनका विरोध नहीं करेंगे? जब नेताजी की सीट के लिए विरोध हो सकता है, तो कुनबे में कौन बच जाएगा, जिसका विरोध न हो?

हालांकि, समाजवादी पार्टी के मुख्य परिवार में अंदरूनी घमासान 2016 से ही मचा हुआ है, लेकिन नेताजी के क्षेत्र में ऐसी स्थिति साधारण घटना नहीं है। 2014 में मोदी लहर में जब पार्टी पूरे प्रदेश से साफ हो गई थी, फिर भी यादवों के प्रभाव वाले मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद, बदायूं, कन्नैज और संभल पर परिवार के सदस्यों को ही जीत मिली थी। लेकिन, इस बार आग घर में ही लगी हुई है। परिवार में सब कुछ ठीक रहता तो मुलायम के छोटे भाई शिवपाल यादव को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (PSPL)बनाकर सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा क्यों करनी पड़ती?

'37 पर लाल,बाकी शिवपाल' का मतलब समझिए

'37 पर लाल,बाकी शिवपाल' का मतलब समझिए

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया की ओर से शिवपाल यादव खुद फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां उनका मुकाबला रामगोपाल के बेटे अक्षय यादव से होना तय है। शिवपाल ने पहले ही तय कर रखा है कि वो मुलायम की सीट छोड़कर हर सीट पर अपना प्रत्याशी उतारेंगे। यानी उत्तर प्रदेश की बाकी सीटों के अलावा परिवार की सभी सीटों पर भी परिवार के समर्थकों के बीच ही मुकाबला होना तय है। राजनीति के जानकारों की मानें तो शिवपाल की ओर से सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का मकसद खुद की जीत से ज्यादा अखिलेश यादव को 'असफल' नेता साबित करना है। यह बात सच भी है कि शिवपाल राज्य के बाकी हिस्सों में ज्यादा प्रभाव डाल पाएं या नहीं, यादवों के गढ़ में तो बुआ और बबुआ के लिए मुश्किलें खड़ी कर ही सकते हैं। स्थानीय स्तर पर परिवार के कुछ करीबी नेता ये भी कहते सुने जा रहे हैं कि योजना तो यह लगती है कि 'हम तो डूबेंगे सनम.........तुमको भी.....।'

यादवों के गढ़ में यह बात भी महसूस की जा रही है कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का एक वर्ग एसपी-बीएसपी के तालमेल से खुश नहीं है। मुलायम परिवार के पुश्तैनी गांव सैफई के एक वरिष्ठ समाजवादी पार्टी नेता ने यहां तक कहा है कि यह गठबंधन दो नेताओं (बुआ-बबुआ) के बीच का गठबंधन है, जमीनी कार्यकर्ताओं का नहीं। इस इलाके में आजकल एक नारा बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है- 'सैंतीस(37) पर लाल, बाकी पर शिवपाल'। यानी यादव मतदाता अगर 37 सीटों पर सपा उम्मीदवारों का समर्थन कर भी दें, तो बाकी 43 सीटों पर वह मायावती की पार्टी के बजाय शिवपाल की पार्टी को चुनना ज्यादा पसंद करेंगे। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलने की आशंका है, वे शिवपाल की पार्टी या बीजेपी में अपने लिए जुगत भिड़ाने में लगे हैं।

पिछले दो चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण

पिछले दो चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण

समाजवादी पार्टी,बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन को यूपी में अबकी बार 47 सीटें से ज्यादा मिलने तक का अनुमान जताया जा रहा है, तो उसके पीछे आंकड़ों का गणित है। पिछले दो चुनावों में उत्तर प्रदेश में इनका गठबंधन नहीं था, लिहाजा बीजेपी ने बहुत आसानी से मैदान मार ली थी। मसलन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मोदी लहर में यूपी में 42.63 फीसदी वोट मिले थे। जबकि, एसपी को 22.35, बीएसपी को 19.77 और आरएलडी को .86 फीसदी वोट मिले थे। अगर इन तीनों को इकट्ठे जोड़ें तो यह आंकड़ा 48.12% तक पहुंचता है। इसी तरह 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 39.67फीसदी वोट मिले थे। जबकि, बीएसपी को 22.23, एसपी को 21.82 और आरएलडी को 1.78 प्रतिशत। इन तीनों का कुल आंकड़ा 45.83% होता है, जो बीजेपी की राह मुश्किल करता दिख रहा है।

महागठबंधन को यूपी में जो भी बढ़त दिखाई जा रही है, उसके पीछे यही आंकड़े बहुत बड़े आधार का काम कर रहे हैं। लेकिन, अगर इसमें यादवों के वोट बंटे और वो पूरी तरह बीएसपी में ट्रांसफर नहीं हुए, तो यूपी की नई राजनीति क्या गुल खिलाएगी कहना बहुत मुश्किल है।

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