बाढ़ का पूर्वानुमान करना मुश्किल क्यों है
दक्षिण भारतीय राज्य केरल के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में पानी का स्तर धीरे-धीरे कम हो रहा है. स्थानीय लोग एक बार फिर अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिशों में अपने घरों की लौटने की कोशिश कर रहे हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, केरल में अब तक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से 443 लोगों की मौत हुई है. इसके साथ ही दूसरे राज्यों में मरने वालों की कुल संख्या 1276 है.
केरल में बीते 100 सालों में आई इस सबसे भयानक बाढ़ ने दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा है. दुनिया भर में लोग ये जानना चाहते हैं कि ये बाढ़ इतनी ख़तरनाक क्यों थी.
इस भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद एक बार फ़िर वही सवाल खड़ा हुआ है कि आख़िर इंसान बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम क्यों नहीं है.
सयुंक्त राष्ट्र के मुताबिक़, दुनिया में हर साल पांच हज़ार लोगों की मौत बाढ़ की वजह से होती है.
केरल में बाढ़ की वजह क्या थी?
भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक़, इस साल अगस्त के महीने में केरल में बीते कई सालों की औसत बारिश के हिसाब से 150% ज़्यादा बारिश हुई है.
ऐसे में इस अतिरिक्त पानी को बांधों की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन बारिश शुरू होने से पहले ही केरल के जलाशयों का स्तर बढ़ा हुआ था.
हालांकि, बाढ़ आने की वजह सिर्फ़ बारिश नहीं है.
भारतीय मौसम विभाग से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर मृत्युंजय मोहापात्रा कहते हैं, "बाढ़ के लिए कई कारक ज़िम्मेदार होते हैं. इनमें जलाशयों की संचयन क्षमता, ज़मीन में नमी की मात्रा, नदी में अलग-अलग जगहों पर पानी का स्तर, नदी रोकने के लिए बनाए गए बांधों की मज़बूती और नदी के तंत्र में आने वाली कृत्रिम रुकावटें शामिल हैं."
जानकारी का अभाव भी एक वजह
मौसम का पूर्वानुमान करने के मामले में भारत की क्षमता अपने पड़ोसी देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा है.
भारतीय मौसम विभाग अपने उपग्रहों और रडार स्टेशनों की मदद से आगामी पांच दिनों तक के मौसम का पूर्वानुमान करने में सक्षम है.
इसके साथ ही बारिश की मात्रा से जुड़े आंकड़े भी हासिल हो जाते हैं.
सरकार के पूर्वानुमान और निगरानी विभाग के अंतर्गत 226 फील्ड स्टेशन हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों के जलस्तर पर नज़र रखते हैं.
लेकिन इन विभागों का ज़्यादातर काम 19 बड़ी नदी घाटियों पर केंद्रित है, जिनमें से कोई भी नदी घाटी केरल में नहीं है.
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भौगोलिक स्थिति एक बड़ा कारण
इस बाढ़ के कारणों को समझने के लिए केरल की भौगोलिक स्थिति को समझना ज़रूरी है. केरल में एक ओर पश्चिमी घाट नाम की पहाड़ियां हैं, तो दूसरी ओर अरब सागर है.
ऐसे में जब पहाड़ों पर बारिश शुरू होती है, तो वह तेज़ी से बड़ी धाराओं का रूप लेकर अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को बहाकर ले जाती है. इसके साथ ही बारिश होने वाली जगहों और आबादी वाली जगहों के बीच दूरी भी काफ़ी कम है.
बाढ़ पूर्वानुमान और निगरानी विभाग के एक अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताते हैं, "केरल में आबादी वाली जगह और पानी के कैचमेंट एरिया के बीच जगह काफ़ी कम है. भारी बारिश के समय शहरों तक इस पानी के पहुंचने में सिर्फ तीन से चार घंटे लगते हैं. ऐसे में तैयारी के लिए कोई समय नहीं मिलता है. लेकिन हिमालय की नदी घाटियों में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने की हमारी क्षमताएं काफ़ी विकसित हो चुकी हैं."
लेकिन बाढ़ का पूर्वानुमान लगाना अभी भी एक चुनौती है.
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मानवीय गतिविधियों की भूमिका
स्थानीय समाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़, अगर सरकार फ़्लड प्लेन यानी बाढ़ के रास्ते में अवैध निर्माण रोक पाती तो केरल में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या काफ़ी कम होती.
इसके पीछे तर्क ये है कि नदी क्षेत्र में होने वाले अवैध निर्माण यहां रहने वाले लोगों को बाढ़ के रास्ते में छोड़ देते हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, 44 नदियों वाले केरल में अगर बांधों से पानी धीरे-धीरे छोड़ा जाता तो बाढ़ इतना विकराल स्वरूप न लेती.
इसके साथ ही बाढ़ जब अगस्त के तीसरे हफ़्ते में अपने चरम पर पहुंच गई, तो सरकार ने 80 बांधों से पानी छोड़ दिया जिससे स्थिति बेहद ख़राब हो गई.
आंकड़ों की कमी भी एक वजह
आंकड़ों को हासिल करने की क्षमताएं हर देश में अलग-अलग होती हैं और कुछ देश सामान्य नियमों का पालन भी नहीं करते हैं.
इसके साथ ही कुछ देशों के पास ऊंची क्षमता वाले कंप्यूटर भी नहीं होते हैं, जिससे वह ठीक-ठीक पूर्वानुमान लगा सकें.
हालांकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक़, ज़्यादातर देशों के पास मौसम, हाइड्रोलॉजी और इंसानी गतिविधियों के प्रभाव से जुड़ी जानकारी होती है लेकिन वे हमेशा इन सभी पहलुओं को मिलाकर एक बड़ी तस्वीर नहीं देखते हैं.
क्या कहते हैं दुनिया के वैज्ञानिक?
सयुंक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 1995 से 2015 तक प्राकृतिक आपदाओं से मारे गए 1,57,000 लोगों में से आधे लोगों की मौत के लिए बाढ़ ज़िम्मेदार थी.
ऐसे में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं, जिससे बाढ़ प्रभावित देशों की मदद की जा सके.
विश्व मौसम विभाग इस समय 60 देशों के साथ मिलकर बाढ़ पूर्वानुमान क्षमताओं का विकास करने के काम पर लगा हुआ है. हर साल बाढ़ की वजह से पांच हज़ार लोगों की जान जाती है.
विश्व मौसम विभाग की हाइड्रोलॉजिकल फोरकास्टिंग एंड रिसोर्स डिविज़न के प्रमुख अधिकारी पॉल पिलन कहते हैं, "हम कई उपग्रहों से बारिश के आंकड़े और मौसम का पूर्वानुमान देंगे और हमारी इस परियोजना से जुड़े सदस्य देश इस जानकारी को स्थानीय स्तर पर हासिल किए गए आंकड़ों से मिला सकते हैं, ताकि ठीक आकलन किया जा सके. हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें स्थानीय प्रशासन को नदी के रास्ते में हो रहे परिवर्तन की जानकारी देंगी."
इस परियोजना का उद्देश्य बारिश, तापमान, जल के बहाव, मिट्टी में नमी के स्तर और दूसरे कारकों से जुड़े आंकड़े देना और सदस्य देशों से ट्रांसनेशनल नदियों से जुड़ी जानकारी साझा करना है.
इस परियोजना पर अभी काम चल रहे है और ये छह महीने में शुरू होगी.
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