जानिए क्यों आर्मी-एयरफोर्स मिलकर भी नहीं हरा सकतीं नक्सलियों को

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पिछले 20 वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए नक्सल हमले में 20,000 से ज्यादा लोगों की मौतें हुई हैं। चीन और पाकिस्तान से मिलती चुनौतियों से जूझने वाले इस देश के लिए नक्सलवाद अब एक नासूर बनता जा रहा है। एक ऐसा नासूर जो न तो ठीक होने की हालत में है और न ही इसके कभी खत्म होने के आसार नजर आते हैं। पहले से ही पैरामिलिट्री फोर्सेज इन नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात हैं। अब आर्मी और एयरफोर्स को भी इन इलाकों में डेप्लॉय किया गया है, लेकिन कई योजनाओं के बाद भी यह खतरा और समस्या बढ़ती ही जा रही है। वनइंडिया हिंदी के साथ एक सीनियर आर्मी ऑफिसर ने न केवल इस समस्या पर अपनी राय दी बल्कि उन्होंने बताया कि आर्मी और एयरफोर्स मिलकर भी क्यों इस समस्या से अकेले जूझ नहीं सकती हैं।
जरूरी स्ट्रेंथ की कमी बड़ी समस्या
सेना में वरिष्ठ अधिकारी की मानें इंडियन आर्मी और एयरफोर्स में पहले से ही ऑफिसर और जवानों की कमी है। आर्मी में जहां 24 प्रतिशत कमी से जूझ रही है तो वहीं एयरफोर्स का भी यही हाल है। आर्मी और एयरफोर्स जहां बॉर्ड्स को चाक चौबंद करने में लगी है तो वहीं वह नक्सल इलाकों की जिम्मेदारी को भी निभा रही है। इन सबके बाद भी अगर देश में कोई भी आपदा आती है तो वहां आर्मी और एयरफोर्स को बुला लिया जाता है।
अधिकारी के मुताबिक हमें फिर से शुरुआत करने की जरूरत है। जब तक आर्मी और एयरफोर्स में जरूरी स्ट्रेंथ नहीं होगी तब तक नक्सलवाद के भी खत्म होने के आसार नजर नहीं आते हैं। जब ऑफिसर और जवानों की संख्या ही पूरी नहीं होने का पेट्रोलिंग पर खासा असर पड़ता है। एक ही एयरफोर्स पायलट और आर्मी ऑफिसर को अगर कई घंटों की सॉर्टीज और पेट्रोलिंग पर तैनात किया जाएगा तो वह ज्यादा समय तक अपनी ड्यूटी नहीं कर पाएंगे। पैरामिलिट्री फोर्सेज और पुलिस फोर्स के साथ भी यही समस्या है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की बुरी हालत और पुरानी तकनीक
ऑर्म्ड फोर्सेज आपसी तालमेल के जरिए अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम दे रही हैं। लेकिन इसके बाद भी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी इनके लिए एक विकराल सकंट की तरह है। पुराने हथियारों और एयरक्राफ्ट्स के दम पर भला कब तक नक्सलियों का सामना किया जाएगा। इस वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया कि आज आर्म्ड फोर्सेज और पैरामिलिट्री फोर्सेज जिन तकनीक का प्रयोग कर रही हैं वह चीन और पाक के मुकाबले काफी पुरानी हो चुकी हैं।
न सिर्फ आर्म्ड फोर्सेज और पैरामिलिट्री फोर्सेज बल्कि इन इलाकों में तैनात पुलिस बल के पास भी जरूरी हथियार नहीं होते हैं। ऐसे में भला कैसे नक्सल हमलों को रोका जा सकेगा। सरकार अपनी ही परेशानियों में घिरी हुई है और वह शायद इस ओर ठीक से ध्यान ही नहीं दे पा रही है। सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी मानने लगे हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से जूझतीं आर्म्ड फोर्सेज कैसे इन सबका सामना करेंगी।
कमजोर इंटेलीजेंस
जिस जगह पर शायद सुरक्षा एजेंसिया और इंटेलीजेंस सोचना बंद कर देती है नक्सलियों की सोच वहीं से शुरू होती है। आज नक्सली इंटेलीजेंस एजेंसियों से भी ज्यादा हाइटेक हो चुके हैं। इसके अलावा देश का इंटेलीजेंस भी कमजोर हालत में है। पड़ोसी मुल्कों चीन, नेपाल और पाकिस्तान से इन नक्सलियों को हथियारों की खेप और पैसा पहुंचता है लेकिन फिर भी सुरक्षा और इंटेलीजेंस एजेंसियों को इसकी भनक ही नहीं है। सिर्फ इतना ही नहीं कई नक्सली नेताओं ने स्थानीय लोगों की मदद से अपना एक मजबूत नेटवर्क भी तैयार कर लिया है।
इस अधिकारी के मुताबिक हम सिर्फ सोचते रहते हैं कि हमें इस योजना और इस प्लान के तहत आगे बढ़ना है लेकिन नक्सली एक कदम आगे जाकर उस योजना को अंजाम दे डालते हैं। यहां पर उन्होंने 10 जनवरी 2013 को लातेहार में हुए एक नक्सली हमले का उदाहरण दिया जिसमें नक्सलियों ने सुरक्षा बल के जवान के पेट में ढाई किलो का बम फिट कर उसके जरिए एक बड़े हमले की योजना तैयार कर डाली थी। लेकिन यह बम एक्टिव नहीं हो सका और एक बहुत बड़ा हादसा होने से बच गया। इस अधिकारी की मानें तो तालिबान के आतंकवादियों की यह तकनीक नक्सलियों ने प्रयोग की थी और अब आप खुद ही अंदाजा लगाइए कि भला कैसे आगे आने वाले समय में इसका सामना किया जाएगा।












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