ईरान के साथ खुलकर क्यों नहीं आता भारत ?

भारत और ईरान
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भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसी हफ़्ते अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईरान से जुड़े एक सवाल पर कहा कि भारत ईरान पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों को मानेगा न कि अमरीका के प्रतिबंधों को.

सुषमा के इस बयान को ईरान पर अमरीकी रुख़ के ख़िलाफ़ कड़े तेवर के रूप में देखा जा रहा है.

आख़िर भारत के लिए ईरान इतना अहम क्यों है कि वो अमरीका की भी नहीं सुनना चाहता? भारत अब ईरान पर यूरोपीय संघ के रुख़ के साथ बढ़ना चाहता है न कि अमरीकी प्रतिबंधों के साथ.

ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से पीछे हटने के बाद अगर भारत अमरीकी लाइन का समर्थन करता है तो तेल आयात करना आसान नहीं रहेगा. भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए ईरान एक अहम देश है.

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ईरान के ख़िलाफ़ ट्रंप

डोनल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के समय से ही ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते का विरोध करना शुरू कर दिया था और राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने ऐसा किया भी.

हालांकि, ट्रंप के रुख़ का यूरोपीय यूनियन भी विरोध कर रहा है और उसका कहना है कि वो ईरान से तेल आयात जारी रखने के लिए अन्य तरीक़ों पर विचार कर रहा है.

ओबामा ने अपने कार्यकाल में ईरान के साथ जिस परमाणु समझौते को लागू किया था उस पर ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस, चीन और यूरोपीय यूनियन की भी सहमति थी, लेकिन ट्रंप ने इसे एकतरफ़ा रद्द कर दिया. ट्रंप के अलावा सारे देश इस समझौते को रद्द करने के फ़ैसले से असहमत हैं.

इस परमाणु समझौते के ख़त्म होने से 6 अगस्त से ईरान पर और प्रतिबंध लग जाएंगे. इसके अलावा नवंबर महीने में ईरान के तेल सेक्टर पर भी प्रतिबंध लागू हो जाएगा. ऐसे में ईरान से भारत के लिए पेट्रोलियम का आयात आसान नहीं होगा.

ईरान भारत के लिए तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है. कहा जा रहा है कि भारत सरकार भी ईरान से तेल आयात को जारी रखने के लिए कई राजनयिक विकल्पों पर विचार कर रही है. सरकार एक प्रतिनिधिमंडल को ईरान भेज सकती है.

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ऊर्जा ज़रूरतें और शिया

भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुस्लिम भारत में होना.

ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए.

भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.

भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.

इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था.

अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

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भारत-इसराइल मित्र तो ईरान कहां?

इसराइल और ईरान की दुश्मनी भी किसी से छिपी नहीं है. ईरान में 1979 की क्रांति के बाद ईरान और इसराइल में दुश्मनी और बढ़ी. इतने सालों बाद भी इसराइल और ईरान की दुश्मनी कम नहीं हुई है बल्कि और बढ़ी ही है.

दूसरी तरफ़ इसराइल और भारत क़रीब आते गए. भारत हार्डवेयर और सैन्य तकनीक के मामले में इसराइल पर निर्भर है. ऐसे में ईरान के साथ भारत के रिश्ते उस स्तर तक सामान्य नहीं हो पाए.

14 जुलाई, 2015 को जब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ परमाणु समझौते को अंजाम तक पहुंचाया तो भारत के लिए रिश्तों को आगे बढ़ाने का एक मौक़ा मिला. ओबामा का यह क़दम उन देशों के लिए मौक़ा था जो ईरान के साथ तेल व्यापार को बढ़ाना चाहते थे.

2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान गए थे. मोदी के दौरे को चाबाहार पोर्ट से जोड़ा गया. भारत के लिए यह पोर्ट चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती की काट के रूप में देखा जा रहा है.

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स्वतंत्र विदेश नीति

भारत इस पोर्ट को लंबे समय से विकसित करना चाह रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह लटकता रहा. चाबाहार ट्रांसपोर्ट और ट्रांज़िट कॉरिडोर समझौते में भारत और ईरान के साथ अफ़ग़ानिस्तान भी शामिल है.

2016 में एक नवंबर को इंडियन बैंक ईरान में ब्रांच खोलने वाला तीसरा विदेशी बैंक बना था. इंडियन बैंक के अलावा ईरान में ओमान और दक्षिण कोरिया के बैंक हैं. इसके साथ ही एयर इंडिया ने नई दिल्ली से सीधे तेहरान के लिए उड़ान की घोषणा की थी.

मार्च 2017 में भारत और ईरान के बीच कई बड़े ऊर्जा समझौते हुए थे. ईरान के साथ भारत ने फ़रज़ाद बी समझौते को भी अंजाम तक पहुंचाया था. अरब की खाड़ी में एक समुद्री ईरानी प्राकृतिक गैस की खोज 2008 में एक भारतीय टीम ने की थी.

ईरान को लेकर सुषमा स्वराज का बयान उस संदेश को दर्शाता है कि भारत विदेश नीति को आगे बढ़ाने में किसी भी देश के दख़ल को बर्दाश्त नहीं करेगा.

हालांकि, 2009 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर ईरान के ख़िलाफ़ वोट किया था और कहा जाता है कि भारत ने ऐसा अमरीकी दबाव में किया था.

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