दिल्ली की हवा से सरकारें परेशान क्यों नहीं होतीं

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अगर दुनिया में प्रदूषित हवा के लिए गोल्ड मेडल दिया जाए तो किसी भी शहर के लिए दिल्ली को हराना मुश्किल होगा.

इसके बावजूद बीते रविवार को दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ने के बावजूद लगभग तीस हज़ार लोगों ने मास्क पहनकर हाफ़ मैराथन में हिस्सा लिया.

हाफ़ मैराथन का आयोजन करने वालों के मुताबिक़, उन्होंने मैराथन के मार्ग में रेडियो फ्रिक्वेंसी तरंगों को प्रसारित करके हवा को साफ़ करने की कोशिश की थी.

लेकिन वैज्ञानिक ऐसे दावों को शक की निगाह से देखते हैं.

विडंबना है कि दिल्ली की हाफ़ मैराथन से ही स्मॉग वाले मौसम की शुरुआत हुई है. लेकिन बीते कुछ हफ़्तों से ये स्मॉग धीरे धीरे इस शहर की ओर बढ़ रहा था.

अब से कुछ पंद्रह दिन पहले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के सलाहकार नागेंद्र शर्मा जब शिमला से लौट रहे थे तो उन्होंने हाइवे के साथ लगे खेतों में से धुआं उड़ते हुए देखा.

पराली जलाने से उठता ख़तरनाक धुआं

ऐसा लग रहा था कि किसी ने माचिस की तीली उठाकर धरती को आग लगा दी हो. इसके साथ ही हवा न चलने की वजह से धुआं हवा में अटककर रह जाता है.

नागेंद्र शर्मा हरियाणा से होकर दिल्ली आ रहे थे. उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सिर्फ़ 70 किलोमीटर दूर ये मंजर देखा.

जब उन्होंने अपनी गाड़ी रोककर इसकी वजह जानने की कोशिश की तो उन्हें पता चला कि धान की खेती करने वाले किसानों ने अपने खेतों से पराली को ख़त्म करने के लिए आग लगाई है.

यहां मौजूद किसानों ने नागेंद्र शर्मा को बताया कि पराली को हटाने के लिए वे महंगी मशीने नहीं ख़रीद सकते हैं. ऐसे में उनके पास इन्हें जलाने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है.

शर्मा कहते हैं, "ये वही पुरानी कहानी है."

हर साल इन महीनों के दौरान देश की राजधानी दिल्ली स्मॉग के चपेट में आ जाती है, जिसके बाद कई महीनों तक ये दिल्ली की हवा में बना रहता है.



दिल्ली में मेडिकल इमर्जेंसी

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 24 घंटों में प्रति क्युबिक मीटर हवा में ख़तरनाक PM 2.5 की मात्रा 25 माइक्रोग्राम से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.

लेकिन पिछले ही साल दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर 700 माइक्रोग्राम के स्तर तक पहुंच गया. इसकी वजह से अस्पतालों में लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गई और डॉक्टरों ने मेडिकल इमर्जेंसी की घोषणा की.

पिछले साल कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स ने बार-बार 999 का आंकड़ा छुआ.

ऊर्जा मामलों के जानकार और एक आगामी किताब 'द ग्रेट स्मॉग ऑफ़ इंडिया' के लेखक सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "ये स्मॉग के मौसम की शुरुआत है जो कि अब से लगभग तीन महीनों तक चलेगा. हालांकि, पराली को कुछ दिनों के लिए ही जलाया जाता है. लेकिन इस दौरान ही हवा की गुणवत्ता अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाती है. इस दौरान विज़िबिलिटी भी काफ़ी कम हो जाती है. दिल्ली में जलती हुई गैस जैसी बदबू होती है."

हालांकि, इसके लिए कई दूसरे कारण भी मौजूद हैं. जैसे इमारतों के निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल, फैक्ट्री और गाड़ियों से निकलने वाला धुआं.

लेकिन पराली का जलना स्मॉग की एक मुख्य वजह बन जाता है.

स्मॉग के लिए पराली ज़िम्मेदार?

उत्तर भारत की अस्सी हज़ार वर्ग किलोमीटर की खेती योग्य भूमि में लगभग बीस लाख किसान हर साल सर्दियों के मौसम में 2.2 करोड़ टन पराली जलाते हैं.

पराली से उठने वाले धुएं में पर्टिकुलेट मैटर, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोज़न डाइऑक्साइड और सल्फ़र डाइऑक्साइड शामिल होता है.

सैटलाइट डेटा के आधार पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने आकलन किया है कि साल 2012 से 2016 के बीच दिल्ली में लगभग आधे प्रदूषण की वजह पराली को जलाना था.

एक दूसरे अध्ययन में सामने आया था कि साल 2011 में 40 हज़ार अकाल मृत्यु की वजह पराली जलने से उठने वाला वायु प्रदूषण है.

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सिद्धार्थ सिंह बताते हैं ये पीला धुआं यानी स्मॉग साल 1960 से 1970 के बीच शुरू हुई हरित क्रांति की वजह से खेती के क्षेत्र में आई क्रांति, सरकारी नीति और बदलते हुए लेबर मार्केट का नतीज़ा है.

हरित क्रांति की वजह से एक ऐसे देश ने अपने लोगों के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री पैदा की जो कि भुखमरी का शिकार रहा था.

पंजाब और हरियाणा ने देश में चावल और गेंहूं की कुल पैदावार में बड़ा योगदान किया.

हरित क्रांति की सफलता

गेहूं की फसल सर्दियों में बोई जाती है. वहीं, चावल की फसल जुलाई-अगस्त में बोई जाती है ताकि मॉनसून का लाभ मिल सके.

खेती के क्षेत्र में आई इस क्रांति में उन मशीनों का योगदान है जिनकी वजह से फसल को काटने और अनाज के दानों को तेज़ी से निकाला जा सकता है.

इसके साथ ही फसल समर्थन मूल्य, भारी पैदावार वाले बीज, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और समयबद्ध ढंग से खेती किए जाने से हरित क्रांति को फायदा मिला.

हालांकि, भारत के मामले में हरित क्रांति को एक संपूर्ण क्रांति नहीं कहा जा सकता है.

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इससे एक ओर भारत में गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ा. वहीं, दूसरी ओर इसकी वजह से वायु प्रदूषण और भूगर्भ जल संकट पैदा हुआ है.

सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "इस बात में कोई दो राय नहीं है कि खेती के क्षेत्र में एक क्रांति की ज़रूरत थी. इस क्रांति और इसके बाद जो नीतियां सामने आईं उनकी वजह से वायु प्रदूषण का संकट पैदा हुआ और भूजल जल संकट भी पैदा हुआ. इसे ही एग्रो-ईकोलॉजिकल संकट कहा जा रहा है."



मशीनों का महंगा होना एक समस्या

किसानों के सामने पराली को जलाने की मज़बूरी होती है क्योंकि कंबाइन हार्वेस्टर से फसल काटे जाने के बाद जो हिस्सा बचता है वह जानवरों के चारे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.

ऐसे में अगर पराली न जलाई जाए तो वह चावल की फसल बोने वाली मशीनों में फंस जाती है.

इस वजह से किसान पराली को जलाकर अपने खेत को अगली फसल के लिए तैयार करते हैं जैसा कि नागेंद्र शर्मा ने शिमला से वापस आते हुए देखा.

सिद्धार्थ सिंह के अनुसार, भारत में कुछ 26,000 कंबाइन हार्वेस्टर हैं जिनमें से अधिकांश उत्तर भारत में हैं. इन मशीनों से फसल काटे जाने के बाद जो पराली बचती है उसे जलाने की वजह से वायु प्रदूषण में भारी बढ़ोतरी होती है.

सरकार इस समस्या के समाधान के लिए "हैप्पी सीडर्स" नाम की मशीन सामने लाई है. ये ट्रैक्टरों पर लगाई जाती है जो चावल की पिछली फसल से बची हुई पराली में फंसे बिना गेहूं की फसल बोने में मदद करती है.

एक हरित क्रांति की ज़रूरत

लेकिन इन मशीनों की क़ीमत 130,000 रुपए से ज़्यादा होती है. इसके बाद इन मशीनों को चलाने में डीज़ल की ख़पत बहुत ज़्यादा होती है जिससे ये ज़्यादातर किसानों की पहुंच से दूर हो जाती है.

सिद्धार्थ सिंह के अनुसार, पिछले साल स्मॉग सीज़न के दौरान पंजाब और हरियाणा में 21,000 मशीनों की जगह लगभग 2,150 थीं.

ऐसी ही एक मशीन है जिसे "सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम" कहा जाता है, जो समान रूप से पराली को काटकर खेत में बराबर फैला देता है. लेकिन ये मशीन भी ज़्यादातर किसानों के लिए महंगी साबित होती है.

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सिद्धार्थ सिंह मानते ​​हैं कि अगर पराली जलने को पांच साल के भीतर पूरी तरह बंद करना है तो 12,000 "हैप्पी सीडर्स" हर साल ख़रीदे जाने होंगे.

इसके साथ ही भारत को एक और हरित क्रांति की ज़रूरत है जो कि एक तकनीक आधारित होनी चाहिए.

जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक दिल्ली की प्रदूषित हवा यहां रहने वाले 1.8 करोड़ लोगों को परेशान करती रहेगी.


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