AAP, कांग्रेस या बीजेपी किसके सिर सजेगा दिल्ली की सत्ता का ताज, पूर्वांचली और पंजाबी मतदाता तय करेंगे

नई दिल्ली। नए साल के आगाज के साथ ही दिल्ली विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती भी शुरू हो गई है। चुनाव की तारीखों का ऐलान कभी भी हो सकता है, सूत्रों के मुताबिक अगले महीने फरवरी में दिल्ली में मतदान हो सकता है। राजधानी में सत्ता के तीनों दावेदार आम आदमी पार्टी (आप), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस ने मतदाताओं को लुभाने के लिए मैदान में उतर चुके हैं। लेकिन सत्ता पर कौन काबिज होगा इसका जवाब तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा।

दिल्ली में करीब 1.43 करोड़ मतदाता

दिल्ली में करीब 1.43 करोड़ मतदाता

देश की राजधानी दिल्ली में लोकसभा चुनाव 2019 के चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 1.43 करोड़ मतदाता हैं। महिलाओं को मुकाबले दिल्ली में पुरुष वोटरों की संख्या 14 लाख से अधिक है। रिकॉर्ड के मुताबिक यहां पूर्वांचली मतदाता जो कि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में मूल निवासी दिल्ली में रहते हैं उनकी संख्या कुल मतदाताओं में लगभग 25-30 प्रतिशत है। सभी मतदान ब्लाकों में, पूर्वांचलियों, पंजाबियों और मुसलमानों को उनकी संख्या के आधार पर सबसे महत्वपूर्ण वोटर माना जाता है। सभी पार्टियों में क्षेत्र के आधार पर चुनाव लड़ने की होड़ लगी रहती है।

पूर्वांचलियों ने बदला दिल्ली का समीकरण

पूर्वांचलियों ने बदला दिल्ली का समीकरण

कांग्रेस और बीजेपी को हमेशा से अलग-अलग वोटरों की पार्टी माना जाता रहा है। जब तक दिवंगत शीला दीक्षित सत्ता रहीं तब तक कांग्रेस को पूर्वांचली मतदाताओं का प्यार मिला। शीला दीक्षित के बाद कांग्रेस ने महाबल मिश्रा जैसे नेताओं पर दांव खेला लेकिन वह ज्यादा सफल नहीं हो सके। वहीं, बीजेपी को उस समय तक दिल्ली के उच्च जाति निवासियों और बनिया समुदाय की पार्टी माना जाता था। लेकिन आम आदमी पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद दिल्ली की राजनीति का आंकड़ा ही बदल गया।

केजरीवाल को दो बार बनाया सीएम

केजरीवाल को दो बार बनाया सीएम

साल 2013 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए शक्तिशाली भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का गठन किया। केजरीवाल की पार्टी ने जब भ्रष्टाचार विरोधी पार्टी के रूप में अपनी छवि बनाई तो पूर्वांचली मतदाताओं ने दल बदल दिया और अरविंद केजरीवाल को दो बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया। अरविंद केजरीवाल की पहली सरकार केवल 49 दिन चली थी। रिपोर्ट के मुताबिक इस बार के विधानसभा चुनाव में भी पूर्वांचली मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

पंजाबी मतदाताओं की संख्या कम नहीं

पंजाबी मतदाताओं की संख्या कम नहीं

प्राप्त जानकारी के मुताबिक पूर्वांचली मतदाता वर्तमान में 25 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने पसंद की सरकार बना सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर पूर्वांचली सामूहिक वोट करते हैं तो वह दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में दो-तिहाई सीटें तय कर सकते हैं। दूसरी तरफ पंजाबी मतदाताओं की बात करें तो वह दिल्ली के मतदाताओं का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन वह अलग-अलग स्थानों पर बिखरे हुए हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में पंजाबी मतदाता 28-30 सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। लगभग 20 दिल्ली विधानसभा क्षेत्रों में पंजाबियों में कुल मतदाताओं का लगभग 20 प्रतिशत शामिल है।

पंजाबी और पूर्वांचली तय करेंगे सरकार

पंजाबी और पूर्वांचली तय करेंगे सरकार

अन्य आठ निर्वाचन क्षेत्रों में पंजाबी मतदाता संख्या में 20 प्रतिशत से अधिक हैं। इसका मतलब यह है कि पंजाबी भी पूर्वांचलियों के रूप में दिल्ली चुनाव पर लगभग समान प्रभाव डाल सकते हैं। मुस्लिम मतदाताओं की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार दिल्ली में मुस्लिम कुल आबादी का 12-13 प्रतिशत हैं। अगर मुस्लिम मतदाता भी एक ही पार्टी को वोट देते हैं तो वह लगभग 10 सीटों पर दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

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