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असम में सर्वानंद रहेंगे या जाएंगे ? असमंजस में फंसी भाजपा

दिसपुर, मई 5: असम में बहुमत मिलने के बाद भी भाजपा पसोपेश में फंस गयी है। मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को बरकरार रखा जाया या फिर पार्टी में तेजी से उभरे हिमंत बिस्वा सरमा को नया मुख्यमंत्री बनाया जाए? या फिर पार्टी को गुटबाजी से बचाने के लिए किसी नये चेहरे को कुर्सी सौंप दी जाए? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। हिमंत मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में ही कांग्रेस से भाजपा में आये थे। 2016 में उनकी ये आस पूरी नहीं हुई थी। इस बार वे पिछड़ना नहीं चाहेंगे। हाल में जब उनसे पूछा गया कि क्या आप असम के नये मुख्यमंत्री बनने वाले हैं ? तो उन्होंने सवाल को टालते हुए कहा, इस बात का फैसला पार्टी के संसदीय बोर्ड को करना है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने पार्टी को एकता के सूत्र में बांध कर दोबारा जीत दिलायी। चूंकि भाजपा ने 2021 के चुनाव में किसी को सीएम प्रोजेक्ट नहीं किया था। इसलिए दोनों में से कोई भी सीएम पद के लिए जिद नहीं कर सकते। भाजपा में मंथन जारी है। माना जा रहा है कि अगर विधायक दल का नेता चुनने में कोई आंतरिक मतभेद पैदा होता है तो किसी नये चेहरे पर दांव खेला जा सकता है।

सर्वानंद बनाम हिमंत

सर्वानंद बनाम हिमंत

भाजपा की दोबारा जीत में सर्वानंद सोनोवाल और हिमंत बिस्वा सरमा का समान योगदान है। हिमंत ने अगर भाजपा के संगठन को मजबूत किया है तो सोनोवाल ने प्रतिकूल स्थितियों में भी वोटरों को पार्टी से विमुख नहीं होने दिया। हिमंत निचले असम से आते हैं तो सोनोवाल ऊपरी असम से। ऊपरी असम में सीएए को लेकर हिंदू वोटरों में गहरी नाराजगी थी। लेकिन सोनोवाल ने धैर्य के साथ नाराजगी को झेलते हुए भाजपा वोट बैंक को छिटकने नहीं दिया। हिमंत की राजनीतिक शैली योगी आदित्यनाथ की तरह बहुत आक्रामक है। वे निचले असम में राजनीति करते हैं और बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों के घोर विरोधी है। वे बिना किसी हिचक के कहते रहे हैं कि बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों के कारण असम की संस्कृति को बहुत नुकसान हुआ है। जिस बदरुद्दीन अजमल को निचले असम में बहुत बड़ी ताकत माना जाता है हिमंत उनसे भी लड़ने-भिड़ने में पीछे नहीं रहते। वे अजमल को असम का दुश्मन कहते रहे हैं। चुनाव से पहले उनके एक विवादास्पद बयान से खलबली मच गयी थी। उन्होंने कहा था कि हमें 'मियां मुस्लमानों' के वोट नहीं चाहिए। वे साम्प्रदायिक होते हैं। वे असम की भाषा और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। असम में बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को मियां मुसमान कहा जाता है। यानी हिमंत, योगी आदित्यनाथ शैली की राजनीति करते हैं। दूसरी तरफ सर्वानंद सोनोवाल की राजनीतिक शैली सहज और विनम्र है। वे सबको साथ लेकर चलने वाले नेता हैं। अब पार्टी को तय करना है कि उसे असम में किस शैली की राजनीति करनी है।

सर्वानंद को हटाना आसान नहीं

सर्वानंद को हटाना आसान नहीं

सर्वानंद को मुख्यमंत्री पद से हटना भाजपा के लिए लोहे के चने चबाने की तरह है। सर्वानंद आदिवासी समुदाय से आते हैं और वे असम के सिर्फ दूसरे आदिवासी मुख्यमंत्री हैं। जब कि हिमंत बिस्वा सरमा असमी ब्राह्मण हैं। अगर एक आदिवासी से सत्ता छीन कर ब्राह्मण को दी जाती है तो पार्टी के सामाजिक समीकरण पर असर पड़ सकता है। सर्वानंद ऊपरी असम के प्रभावशाली नेता हैं। ऊपरी असम में विधानसभा की 28 सीटें हैं। 2021 के चुनाव में एनडीए को 28 में से 23 सीटें मिली हैं। यह कामयाबी तब मिली है जब ऊपरी असम में भाजपा को सीएए के खिलाफ विरोध झेलना पड़ा था। दूसरी तरफ हिमंत बिस्वा सरमा कामरूप महानगर जिला के रहने वाले हैं। इस जिले में चार सीटें हैं। चारों एनडीए के खाते में आयी हैं। तीन भाजपा को और एक अगप को मिली है। हिमंत इस जिले की जालुकबरी सीट से जीते हैं। वह भी एक लाख से अधिक वोटों से। यानी ताकत और प्रभाव के मामले में दोनों की हैसियत एक जैसी दिखती है। ऐसे में पलड़ा किसकी तरफ झुकेगा, कहना मुश्किल है।

मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण से भाजपा को चिंता

मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण से भाजपा को चिंता

कुल आबादी के अनुपात में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या असम में निवास करती है। पहला नम्बर जम्मू-कश्मीर का है। एआइयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल बांग्लाभाषी मुसलमानों की राजनीति करते हैं। उनकी राजनीतिक स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। इस चुनाव में एआइयूडीएफ ने कांग्रेस के सहयोग से 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 16 पर जीत मिली। पिछली बार से तीन सीटें अधिक आयीं। मुसलमानों ने एआइयूडीएफ के पक्ष में एकतरफा वोट दिया। इस पार्टी के उम्मीदवार रफीकुल इस्लाम ने जानिया सीट पर 1 लाख 44 हजार से अधिक वोटों से जीत हासिल की। यह 2021 विधानसभा चुनाव की सबसे बड़ी जीत है। इतने विशाल मतों के अंतर से कोई नहीं जीता है। इस सीट पर भाजपा ने शहीदुल इस्लाम को मैदान में उतार कर मुस्लिम समुदाय में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की थी। लेकिन शहीदुल को केवल 11 हजार 408 वोट ही मिले और उनकी करारी हार हुई। इस वोटिंग पैटर्न से असम में ध्रुवीकरण की राजनीति को समझा जा सकता है। ऐसे में भाजपा को अब अपनी रणनीति पर नये सिरे से विचार करना पड़ रहा है। अगर एआइयूडीएफ की काट में किसी मजबूत चेहरे की तलाश हुई तो हिमंत बिस्वा सरमा की लॉटरी लग सकती है।

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