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Tirupati Laddu History: कौन हैं तिरुपति लड्डू 'किंग'? 1715 में चढ़ा था पहला प्रसाद, फिर 6 बार बदला स्वरूप

Tirupati Laddu History: मुंह में पानी लाने वाला, तिरुपति बालाजी मंदिर का स्वादिष्ट 'प्रसादम' लड्डू देशभर में बहुत प्रसिद्ध है। इसे भगवान वेंकटेश्वर का प्रमुख प्रसाद माना जाता है, जो हर भक्त को दर्शन के बाद मिलता है। लेकिन, हाल ही में इस लड्डू को लेकर विवाद सामने आया, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान लड्डू बनाने में जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल किया गया था।

इससे पूरे देश में आक्रोश पैदा हो गया। हालांकि, सरकार ने इस मामले पर सफाई देते हुए बताया कि लड्डू की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं किया गया था। यह लड्डू भक्तों के बीच इतना लोकप्रिय है कि तिरुपति की यात्रा इसके बिना अधूरी मानी जाती है। इसके अद्वितीय स्वाद और गुणवत्ता ने इसे दुनिया भर में प्रसिद्ध बना दिया है। आइए जानते हैं कौन हैं लड्डू के जनक?

Tirupati Laddu History

तिरुपति लड्डू की तीन शताब्दियों की यात्रा
तिरुपति लड्डू का इतिहास 300 साल पुराना है। इस दिव्य प्रसाद को पहली बार 2 अगस्त, 1715 को चढ़ाया गया था। इसके बाद से इसका स्वरूप 6 बार बदला गया, और वर्तमान में जो लड्डू हम देखते हैं, उसका वर्तमान रूप 1940 में मद्रास सरकार के समय तय हुआ। हालांकि, तिरुपति के प्राचीन शिलालेखों में 1480 में इस मिठाई का उल्लेख 'मनोहरम' नाम से भी मिलता है।

कौन है तिरुपति लड्डू का जनक?
तिरुपति लड्डू को प्रसिद्धि दिलाने का श्रेय कल्याणम अयंगर को जाता है। उन्होंने लड्डू को तिरुपति का पर्याय बना दिया और उनके नेतृत्व में इसे दिव्य प्रसाद के रूप में लाखों भक्तों तक पहुंचाया गया। वे 1940 के दशक में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के मुख्य पुजारी थे। अयंगर को समाज सेवा और कल्याण के कार्यों के लिए भी जाना जाता था। उन्हें राजनेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने 'कल्याणम अयंगर' नाम दिया, क्योंकि उन्होंने अपनी शादी के आभूषण और वस्त्र गरीबों को दान कर दिए थे।

लड्डू बनाने की मीरासिदारी प्रणाली
अयंगर ने लड्डू बनाने के लिए 'मीरासिदारी प्रणाली' की शुरुआत की, जो एक वंशानुगत प्रणाली थी। इसमें लड्डू तैयार करने वाले लोगों को 'गामेकर मीरासीदार' कहा जाता था, जिन्हें लड्डू बनाने के बदले कुछ हिस्सा भी मिलता था। 2001 तक इस प्रणाली के तहत लड्डू बनाए जाते थे।

2001 के बाद का सफर
2001 तक तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के कर्मचारी खुद ही लड्डू तैयार करते थे। लेकिन समय के साथ-साथ भक्तों की संख्या बढ़ने लगी और हर दिन बनने वाले लड्डूओं की संख्या बढ़ानी पड़ी। कई वर्षों बाद, मंदिर के अधिकारियों ने एक 'पोटू' की स्थापना की, जिसे आम तौर पर 'भगवान की रसोई' कहा जाता है, जहां प्रसाद लकड़ी जलाकर तैयार किया जाता था। फिर भी, लड्डुओं की संख्या भक्तों की मांग के आधे से भी कम थी।

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लड्डू निर्माण: सामग्री और मात्रा
तिरुपति लड्डू को बेसन, चीनी, घी, इलायची और सूखे मेवों से बनाया जाता है। हर दिन लगभग 3 लाख से ज्यादा लड्डू तैयार किए जाते हैं। लड्डू बनाने वाले कारीगर शिफ्ट में काम करते हैं और लकड़ी के साथ गैस सिलेंडर का भी उपयोग करते हैं।

लड्डू दो आकार में बनाए जाते हैं - छोटा और बड़ा। छोटा लड्डू करीब 178 ग्राम का होता है और सूखने पर 174 ग्राम रह जाता है, जबकि बड़ा लड्डू गीले में 720 ग्राम और सूखने पर 700 ग्राम का होता है।

लड्डू का 'जीआई टैगिंग' सफर
पिछले कुछ दशकों में तिरुपति लड्डू की मांग में जबरदस्त वृद्धि हुई है। इसके चलते लड्डू का काला बाजार भी शुरू हो गया, जहां यह लड्डू महंगे दामों पर बेचा जाता था। अधिकारियों ने इस पर रोक लगाने के लिए छापेमारी की, लेकिन यह समस्या लगातार बनी रही। बाद में, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ने लड्डू के पेटेंट के लिए आवेदन किया और उसे 'जीआई टैग' हासिल की।

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